Bhaktise – भक्ति से

सोमवार व्रत कथा: साहूकार का बेटा, बारह वर्ष की आयु और शिव कृपा

संक्षेप में:सोमवार व्रत भगवान शिव और माता पार्वती के लिए हर सोमवार रखा जाता है, ख़ासकर सावन और कार्तिक में। इसकी कथा में शिवजी के वरदान से जन्मे साहूकार के बेटे की बारह वर्ष की आयु पूरी होने पर पार्वती जी के आग्रह से उसे फिर जीवन मिलता है।

कोई रेटिंग नहीं
0 व्यूज़

सोमवार का व्रत भगवान शिव और माता पार्वती के लिए रखा जाता है। इसे साल भर के किसी भी सोमवार से शुरू किया जा सकता है, पर ज़्यादातर लोग सावन के पहले सोमवार से या कार्तिक, चैत्र और मार्गशीर्ष के महीने से संकल्प लेते हैं। व्रत में दिन भर उपवास रखकर शिवजी की पूजा होती है, कथा सुनी जाती है और शाम को एक बार भोजन किया जाता है। परंपरा में सोमवार व्रत के तीन रूप बताए गए हैं: साधारण सोमवार, सोलह सोमवार और सौम्य प्रदोष; नीचे साधारण सोमवार की कथा है।

सोमवार व्रत कथा

एक नगर में एक बहुत धनी साहूकार रहता था। उसके घर में किसी चीज़ की कमी न थी, पर उसके कोई बेटा न था, और यह दुख उसे दिन-रात सताता था। बेटे की कामना से वह हर सोमवार को व्रत रखता, शिव मंदिर जाकर पूरी श्रद्धा से शिव-पार्वती की पूजा करता और शाम को दीपक जलाता।

उसकी भक्ति देखकर एक दिन माता पार्वती ने शिवजी से कहा, "स्वामी, यह साहूकार कितने बरसों से आपका व्रत रख रहा है। इसकी इच्छा पूरी कीजिए।" शिवजी बोले, "पार्वती, इस संसार में हर किसी को उसके कर्मों के हिसाब से ही फल मिलता है। इसके भाग्य में पुत्र नहीं है।" पर पार्वती जी बार-बार आग्रह करती रहीं। आख़िर शिवजी ने कहा, "तुम्हारे कहने से मैं इसे पुत्र का वरदान देता हूँ, पर वह बालक केवल बारह वर्ष तक जीवित रहेगा।"

उसी रात साहूकार को सपने में यह बात पता चल गई। उसे पुत्र मिलने की ख़ुशी भी हुई और उसकी छोटी आयु का दुख भी। फिर भी उसने किसी से कुछ नहीं कहा और पहले की तरह सोमवार का व्रत करता रहा। समय आने पर साहूकार की पत्नी ने एक सुंदर बेटे को जन्म दिया। घर में ख़ूब उत्सव हुआ, पर साहूकार के मन में एक चिंता हमेशा बनी रही।

जब बालक ग्यारह साल का हुआ तो साहूकार ने उसके मामा को बुलाया, ढेर सारा धन दिया और कहा, "इसे पढ़ने के लिए काशी ले जाओ। रास्ते में जहाँ भी ठहरो, यज्ञ कराना और ब्राह्मणों को भोजन व दान देते जाना।" मामा-भांजा चल पड़े और रास्ते भर यज्ञ और दान करते गए।

रास्ते में एक नगर आया, जहाँ के राजा की बेटी का विवाह हो रहा था। जिस राजकुमार से विवाह तय हुआ था, वह एक आँख से काना था, और उसके पिता को डर था कि यह बात खुल गई तो राजा विवाह से मना कर देंगे। साहूकार के सुंदर बेटे को देखकर उसने मामा से विनती की कि विवाह की रस्मों में दूल्हा यह लड़का बन जाए; बदले में वह बहुत धन देगा। मामा मान गया और लड़के का विवाह राजकुमारी से हो गया।

लड़का सच्चे मन का था। उसे यह धोखा अच्छा न लगा। विदा से पहले उसने राजकुमारी की चुनरी के पल्ले पर लिख दिया: "तुम्हारा विवाह मेरे साथ हुआ है, पर जिस राजकुमार के साथ तुम्हें भेजा जाएगा, वह एक आँख से काना है। मैं पढ़ने के लिए काशी जा रहा हूँ।" राजकुमारी ने यह पढ़ा और काने राजकुमार के साथ जाने से मना कर दिया। राजा ने बेटी को घर पर ही रखा और बारात लौट गई।

काशी पहुँचकर लड़के ने पढ़ाई शुरू की और मामा यज्ञ कराता रहा। जिस दिन लड़का बारह वर्ष का हुआ, उस दिन भी यज्ञ हो रहा था। लड़के ने मामा से कहा कि उसकी तबीयत ठीक नहीं है और वह भीतर जाकर लेट गया। कुछ ही देर में उसके प्राण निकल गए। मामा ने देखा तो विलाप करने लगा।

उसी समय शिव-पार्वती वहाँ से जा रहे थे। रोने की आवाज़ सुनकर पार्वती जी ने पूछा कि यह कौन है। शिवजी ने बताया कि यह वही साहूकार का बेटा है, जिसे बारह वर्ष की आयु मिली थी। पार्वती जी बोलीं, "इसके पिता ने इतने बरसों तक आपका व्रत किया है। इसके माता-पिता यह दुख सह नहीं पाएँगे। इसे जीवन दीजिए।" पार्वती जी के आग्रह पर शिवजी ने लड़के को जीवनदान दिया और वह उठकर बैठ गया।

पढ़ाई पूरी करके मामा-भांजा घर की ओर लौटे। रास्ते में वही नगर आया। राजा ने लड़के को पहचान लिया, आदर से महल में ठहराया और ढेर सारे धन-धान्य के साथ अपनी बेटी को उसके साथ विदा किया।

उधर साहूकार और उसकी पत्नी ने ठान रखा था कि अगर बेटा जीवित न लौटा तो वे भी प्राण दे देंगे। वे छत पर बैठे राह देख रहे थे कि ख़बर आई, बेटा बहू के साथ लौट रहा है। दोनों की ख़ुशी का ठिकाना न रहा। उसी रात शिवजी ने साहूकार को सपने में कहा, "तुम्हारे सोमवार व्रत और कथा सुनने से प्रसन्न होकर मैंने तुम्हारे बेटे को लंबी आयु दी है।" तभी से माना जाता है कि जो सोमवार का व्रत करके यह कथा सुनता या पढ़ता है, उसकी मनोकामनाएँ शिवजी पूरी करते हैं।

सोमवार व्रत पूजा विधि

  1. सोमवार की सुबह स्नान करके शिवजी के सामने व्रत का संकल्प लें कि कितने सोमवार और किस कामना से व्रत रखेंगे।
  2. शिव मंदिर जाएँ या घर में शिवलिंग पर जल, कच्चा दूध और गंगाजल चढ़ाएँ। बेलपत्र, धतूरा, सफ़ेद फूल, चंदन और अक्षत अर्पित करें।
  3. माता पार्वती को रोली, सिंदूर और सुहाग की वस्तुएँ चढ़ाएँ; नंदी और गणेश जी की भी पूजा करें।
  4. घी का दीपक जलाकर "ॐ नमः शिवाय" का जप करें और सोमवार व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
  5. शिवजी की आरती करें और प्रसाद बाँटें।
  6. दिन भर फलाहार रखें और शाम को पूजा के बाद एक बार सादा भोजन करें। बहुत से लोग इस दिन नमक नहीं खाते या सेंधा नमक लेते हैं।

नियम और उद्यापन

  • शिवलिंग पर तुलसी, हल्दी, सिंदूर और केतकी का फूल न चढ़ाएँ; सिंदूर माता पार्वती को चढ़ता है।
  • सावन के सोमवार और कार्तिक के सोमवार को इस व्रत का विशेष महत्व है।
  • प्रायः 16 सोमवार या एक साल का संकल्प लिया जाता है, और पूरा होने पर उद्यापन में शिव-पार्वती की पूजा, हवन और दान होता है।
  • बीमारी या किसी मजबूरी में व्रत छूट जाए तो अगले सोमवार से नियम आगे बढ़ा दें, घबराने की बात नहीं।

पूजा के बाद ॐ जय शिव ओंकारा आरती और शिव चालीसा का पाठ करें। शिवजी के दूसरे व्रतों के लिए प्रदोष व्रत कथा और मासिक शिवरात्रि की तिथियाँ देखें, और आज कौन-सा वार और तिथि है, यह पंचांग पर।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सोमवार का व्रत कब से शुरू करें?

किसी भी शुक्ल पक्ष के पहले सोमवार से, पर सावन, कार्तिक, चैत्र या मार्गशीर्ष का पहला सोमवार सबसे शुभ माना जाता है।

सोमवार व्रत में क्या खाएँ?

दिन में फल, दूध, साबूदाना या मखाना जैसे फलाहार लें और शाम को पूजा के बाद एक बार सादा भोजन करें। कई लोग नमक नहीं खाते।

सोमवार व्रत कितने रखने चाहिए?

आमतौर पर 16 सोमवार या एक वर्ष का संकल्प लिया जाता है। सावन के सभी सोमवार रखने की भी परंपरा है।

सोमवार व्रत कथा में साहूकार का बेटा कैसे बचा?

बारह वर्ष की आयु पूरी होने पर काशी में उसके प्राण चले गए, पर पार्वती जी के आग्रह पर शिवजी ने उसे जीवनदान दिया।

क्या अविवाहित लड़कियाँ सोमवार व्रत रख सकती हैं?

हाँ, अच्छे जीवनसाथी की कामना से कुँवारी लड़कियाँ भी यह व्रत रखती हैं, विशेषकर सावन के सोमवार।