हिंदू कैलेंडर में 12 महीने होते हैं: चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन। ये महीने चंद्रमा की चाल से बनते हैं, इसलिए अंग्रेज़ी तारीखों से इनका मेल हर साल 10-15 दिन आगे-पीछे होता रहता है। उत्तर भारत में महीना पूर्णिमा के अगले दिन से शुरू होता है, और नया साल (विक्रम संवत) चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से।
गाँव-घरों में इन्हें अपने बोलचाल के नामों से भी पुकारा जाता है: सावन, भादों, क्वार (कुआर), अगहन, पूस, फागुन। नीचे दोनों नाम साथ दिए गए हैं।
12 महीने और अंग्रेज़ी महीनों से मेल
| क्रम | महीना | बोलचाल का नाम | लगभग अंग्रेज़ी महीने |
|---|---|---|---|
| 1 | चैत्र | चैत | मार्च–अप्रैल |
| 2 | वैशाख | बैसाख | अप्रैल–मई |
| 3 | ज्येष्ठ | जेठ | मई–जून |
| 4 | आषाढ़ | असाढ़ | जून–जुलाई |
| 5 | श्रावण | सावन | जुलाई–अगस्त |
| 6 | भाद्रपद | भादों | अगस्त–सितंबर |
| 7 | आश्विन | क्वार / कुआर | सितंबर–अक्टूबर |
| 8 | कार्तिक | कातिक | अक्टूबर–नवंबर |
| 9 | मार्गशीर्ष | अगहन | नवंबर–दिसंबर |
| 10 | पौष | पूस | दिसंबर–जनवरी |
| 11 | माघ | माह | जनवरी–फ़रवरी |
| 12 | फाल्गुन | फागुन | फ़रवरी–मार्च |
यह मेल मोटा-मोटा है। 12 चांद्र महीने लगभग 354 दिन के होते हैं, जबकि सौर वर्ष करीब 365 दिन का। यह 11 दिन का अंतर हर दो-तीन साल में एक अतिरिक्त महीना जोड़कर पाटा जाता है, जिसे पुरुषोत्तम मास या अधिक मास कहते हैं। जिस साल अधिक मास आता है, उसके बाद के त्योहार अंग्रेज़ी कैलेंडर में करीब तीन हफ़्ते आगे खिसक जाते हैं। किसी महीने में कौन सी तारीख किस तिथि की है, यह मासिक कैलेंडर में देखें।
पंजाब, हिमाचल और हरियाणा के कुछ हिस्सों में, और पूर्व में बंगाल-ओडिशा में, इन्हीं नामों वाले सौर महीने भी चलते हैं, जो सूर्य के राशि बदलने (संक्रांति) से शुरू होते हैं। बैसाखी इसी का उदाहरण है: सूर्य के मेष राशि में आने पर सौर वैशाख शुरू होता है, इसलिए बैसाखी हर साल 13-14 अप्रैल के आसपास ही आती है। उत्तर भारत के ज़्यादातर व्रत-त्योहार हालाँकि चंद्र महीनों से ही तय होते हैं।
नाम नक्षत्रों से कैसे पड़े
हर महीने का नाम उस नक्षत्र से पड़ा है जिसके आसपास उस महीने की पूर्णिमा का चंद्रमा होता है। यही वजह है कि महीनों के नाम और नक्षत्रों के नाम इतने मिलते-जुलते हैं:
- चैत्र: चित्रा नक्षत्र
- वैशाख: विशाखा
- ज्येष्ठ: ज्येष्ठा
- आषाढ़: पूर्वाषाढ़ा / उत्तराषाढ़ा
- श्रावण: श्रवण
- भाद्रपद: पूर्व भाद्रपद / उत्तर भाद्रपद
- आश्विन: अश्विनी
- कार्तिक: कृत्तिका
- मार्गशीर्ष: मृगशिरा
- पौष: पुष्य
- माघ: मघा
- फाल्गुन: पूर्वा फाल्गुनी / उत्तरा फाल्गुनी
हर साल पूर्णिमा ठीक इसी नक्षत्र में हो, ऐसा ज़रूरी नहीं; कभी पड़ोसी नक्षत्र में भी होती है। नाम परंपरा से तय हो चुके हैं, इसलिए वे बदलते नहीं।
हर महीने के प्रमुख त्योहार
नीचे उत्तर भारत की पूर्णिमांत गणना के हिसाब से हर महीने के बड़े पर्व दिए गए हैं। साल भर की पूरी सूची त्योहारों के कैलेंडर में है।
- चैत्र: रंग वाली होली (धुलंडी) के दिन से महीना शुरू, चैत्र नवरात्रि, नव संवत्सर, राम नवमी, हनुमान जयंती (चैत्र पूर्णिमा)।
- वैशाख: अक्षय तृतीया, बुद्ध पूर्णिमा।
- ज्येष्ठ: वट सावित्री (ज्येष्ठ अमावस्या), गंगा दशहरा, निर्जला एकादशी, बड़ा मंगल (लखनऊ और अवध में)।
- आषाढ़: जगन्नाथ रथयात्रा, देवशयनी एकादशी से चातुर्मास की शुरुआत, गुरु पूर्णिमा।
- श्रावण (सावन): सावन सोमवार, कांवड़ यात्रा, हरियाली तीज, नाग पंचमी, रक्षाबंधन।
- भाद्रपद (भादों): कजरी तीज, कृष्ण जन्माष्टमी, हरतालिका तीज, गणेश चतुर्थी, अनंत चतुर्दशी।
- आश्विन (क्वार): पितृ पक्ष, शारदीय नवरात्रि, दशहरा, शरद पूर्णिमा।
- कार्तिक: करवा चौथ, अहोई अष्टमी, धनतेरस, दिवाली, गोवर्धन, भाई दूज, छठ, देवउठनी एकादशी, कार्तिक पूर्णिमा।
- मार्गशीर्ष (अगहन): विवाह पंचमी, गीता जयंती; शादियों का मौसम।
- पौष (पूस): खरमास का बड़ा हिस्सा, पौष पुत्रदा एकादशी, पौष पूर्णिमा से माघ मेले में कल्पवास शुरू।
- माघ: सकट चौथ, षटतिला एकादशी, मौनी अमावस्या, वसंत पंचमी, माघ पूर्णिमा।
- फाल्गुन (फागुन): महाशिवरात्रि, फुलेरा दूज, आमलकी एकादशी और फाल्गुन पूर्णिमा पर होलिका दहन; रंग अगले दिन खेला जाता है, जो चैत्र का पहला दिन है।
मकर संक्रांति और लोहड़ी जैसे पर्व सूर्य की राशि से तय होते हैं, चंद्र महीने से नहीं, इसलिए ये अंग्रेज़ी कैलेंडर में लगभग एक ही तारीख के आसपास रहते हैं।
छह ऋतुएँ
भारतीय परंपरा में साल को छह ऋतुओं में बाँटा गया है, हर ऋतु में दो महीने:
| ऋतु | महीने | पहचान |
|---|---|---|
| वसंत | चैत्र, वैशाख | नई पत्तियाँ, फूल, हल्की गर्मी |
| ग्रीष्म | ज्येष्ठ, आषाढ़ | तेज़ गर्मी, लू |
| वर्षा | श्रावण, भाद्रपद | बरसात, झूले, तीज |
| शरद | आश्विन, कार्तिक | साफ़ आसमान, उजली चाँदनी |
| हेमंत | मार्गशीर्ष, पौष | गुलाबी ठंड, धुंध |
| शिशिर | माघ, फाल्गुन | कड़ाके की सर्दी, फिर पतझड़ |
दिलचस्प बात यह है कि वसंत पंचमी माघ में आती है, जो शिशिर ऋतु का महीना है। माना जाता है कि यह पर्व आने वाले वसंत का स्वागत है, इसीलिए पीला रंग और सरसों के फूल इससे जुड़े हैं।
पूर्णिमांत गणना से महीना कैसे बदलता है
उत्तर भारत (उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल, उत्तराखंड, झारखंड, छत्तीसगढ़) में पूर्णिमांत पद्धति चलती है: महीना पूर्णिमा पर खत्म होता है और अगले दिन से कृष्ण पक्ष के साथ नया महीना शुरू होता है। गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र-तेलंगाना में अमांत पद्धति है, जहाँ महीना अमावस्या पर खत्म होता है।
दोनों में शुक्ल पक्ष का नाम एक ही रहता है, पर कृष्ण पक्ष एक महीना आगे चला जाता है। उदाहरण के लिए, जन्माष्टमी उत्तर भारत में "भाद्रपद कृष्ण अष्टमी" है और अमांत कैलेंडर में "श्रावण कृष्ण अष्टमी"। दिन वही है, सिर्फ़ महीने का नाम बदला। इसी तरह महाशिवरात्रि यहाँ फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी कहलाती है और अमांत में माघ कृष्ण चतुर्दशी। विस्तार से समझने के लिए पूर्णिमांत और अमांत मास का अंतर पढ़ें।
एक और बात जो अक्सर उलझाती है: उत्तर भारत में चैत्र महीना होलिका दहन के अगले दिन, यानी रंग वाली होली से ही शुरू हो जाता है, पर नया विक्रम संवत पंद्रह दिन बाद चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को, यानी नवरात्रि के पहले दिन बदलता है। इसलिए चैत्र का कृष्ण पक्ष पुराने संवत में और शुक्ल पक्ष नए संवत में गिना जाता है। आज कौन सा महीना और पक्ष चल रहा है, यह आज के पंचांग में सबसे ऊपर लिखा रहता है।

