विक्रम संवत और हिंदू नववर्ष क्या है

विक्रम संवत उत्तर भारत का पारंपरिक हिंदू कैलेंडर वर्ष है, जो ईस्वी सन् से 57 वर्ष आगे चलता है। इसका नया साल चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को शुरू होता है, जिस दिन चैत्र नवरात्रि की घटस्थापना भी होती है।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखन: · वेद पण्डित, लेखकअद्यतन · 5 मिनट का पाठ
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विक्रम संवत वह वर्ष-गणना है जिससे उत्तर भारत के पंचांग, शादी के कार्ड, मंदिरों के शिलालेख और पुराने बही-खाते चलते आए हैं। यह ईस्वी सन् से 57 वर्ष आगे है और इसका नया साल, जिसे हिंदू नववर्ष या नव संवत्सर कहते हैं, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को शुरू होता है। 19 मार्च 2026 को विक्रम संवत 2083 शुरू हुआ था, और 7 अप्रैल 2027 को संवत 2084 शुरू होगा।

शुरुआत और राजा विक्रमादित्य

परंपरा के अनुसार उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने शकों को हराकर इस संवत की शुरुआत की थी, यानी ईसा से 57 वर्ष पहले। विक्रमादित्य उत्तर भारत की लोक-स्मृति में न्याय और दान के प्रतीक हैं; सिंहासन बत्तीसी और बेताल पच्चीसी की कहानियाँ इन्हीं के नाम से चलती हैं।

इतिहासकार इस बारे में एकमत नहीं हैं। पुराने शिलालेखों में यही गणना पहले "कृत संवत" और फिर "मालव संवत" के नाम से मिलती है, और "विक्रम संवत" नाम बाद की सदियों में प्रचलित हुआ। श्रद्धालु के लिए इतना जानना काफ़ी है कि दो हज़ार साल से ज़्यादा समय से यह गणना लगातार चल रही है और आज भी उत्तर भारत का धार्मिक कैलेंडर इसी पर टिका है।

गणना: ईस्वी में 57 जोड़ें

विक्रम संवत निकालने का सीधा सूत्र है: ईस्वी सन् + 57। लेकिन एक बारीकी है। नया संवत जनवरी में नहीं, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (मार्च-अप्रैल) को बदलता है। इसलिए:

  • चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से 31 दिसंबर तक: ईस्वी + 57
  • 1 जनवरी से चैत्र अमावस्या तक: ईस्वी + 56

उदाहरण: अक्टूबर 2026 में चल रहा संवत 2026 + 57 = 2083 है। फरवरी 2027 में भी संवत 2083 ही रहेगा (2027 + 56), और 7 अप्रैल 2027 से 2084 हो जाएगा।

पूर्णिमांत महीनों की वजह से उत्तर भारत में एक दिलचस्प बात होती है। यहाँ चैत्र मास होली के अगले दिन, यानी कृष्ण पक्ष से शुरू हो जाता है, पर नया साल महीने के बीच, शुक्ल प्रतिपदा से बदलता है। यानी चैत्र का पहला पखवाड़ा पुराने संवत में और दूसरा नए संवत में पड़ता है। महीनों के इस हिसाब को समझने के लिए हिंदू कैलेंडर के 12 महीने और पूर्णिमांत और अमांत का अंतर पढ़ें।

नववर्ष: चैत्र शुक्ल प्रतिपदा

ब्रह्म पुराण के हवाले से कहा जाता है कि इसी दिन सूर्योदय के समय ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना शुरू की थी। इसीलिए यह दिन "वर्ष प्रतिपदा" और "युगादि" भी कहलाता है। इसी दिन से चैत्र नवरात्रि शुरू होती है और नौवें दिन राम नवमी आती है। अलग-अलग प्रदेशों में यही दिन अलग नामों से मनाया जाता है:

  • उत्तर भारत: नव संवत्सर, नवरात्रि की घटस्थापना
  • महाराष्ट्र: गुड़ी पड़वा
  • कर्नाटक, आंध्र, तेलंगाना: उगादि
  • कश्मीर: नवरेह
  • सिंधी समाज अगले दिन, चैत्र शुक्ल द्वितीया को, चेटी चंड मनाता है

गुजरात में विक्रम संवत तो चलता है, पर वहाँ नया साल कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को, यानी दिवाली के अगले दिन, बदलता है। इसलिए गुजराती व्यापारी दिवाली पर नए बही-खाते शुरू करते हैं। नेपाल का सरकारी कैलेंडर भी विक्रम संवत है, लेकिन वह सौर है और मध्य अप्रैल में बैसाख से शुरू होता है।

शक संवत से अंतर

बातविक्रम संवतशक संवत
शुरुआतईसा पूर्व 57ईस्वी 78
ईस्वी से अंतर+57 (या +56)−78 (या −79)
नया सालचैत्र शुक्ल प्रतिपदा (चंद्र-सौर)राष्ट्रीय कैलेंडर में 22 मार्च (लीप वर्ष में 21 मार्च)
कहाँ चलता हैउत्तर भारत, गुजरात, नेपाल, धार्मिक कार्यभारत का राष्ट्रीय पंचांग, दक्षिण भारत के कई पंचांग

भारत सरकार ने 1957 में शक संवत को राष्ट्रीय कैलेंडर माना, इसलिए गज़ट और आकाशवाणी में शक तिथि बोली जाती है। 2026 में शक संवत 1948 चल रहा है। विक्रम संवत और शक संवत के बीच हमेशा 135 वर्ष का अंतर रहता है।

संवत्सर के 60 नाम

हर संवत्सर का एक नाम भी होता है, जो 60 नामों के चक्र से आता है। यह चक्र प्रभव, विभव, शुक्ल, प्रमोद, प्रजापति से शुरू होकर क्रोधन और क्षय पर ख़त्म होता है, फिर दोबारा प्रभव से शुरू होता है। 60 नामों को बीस-बीस के तीन समूहों में बाँटा गया है: पहले बीस ब्रह्मा के, अगले बीस (सर्वजित, सर्वधारी, विरोधी…) विष्णु के, और आख़िरी बीस (प्लवंग, कीलक, सौम्य…) रुद्र के माने जाते हैं।

उत्तर भारतीय पंचांगों में संवत्सर का नाम बृहस्पति की गति से तय होता है, इसलिए यह कई बार दक्षिण भारत के उगादि वाले नाम से अलग होता है। नए पंचांग के पहले पन्ने पर वर्ष का नाम, उस साल के "राजा" और "मंत्री" ग्रह और वर्षफल लिखा रहता है।

नववर्ष कैसे मनाएं

  1. सुबह जल्दी स्नान करके सूर्य को अर्घ्य दें और घर के मुख्य द्वार पर आम या अशोक के पत्तों का बंदनवार लगाएँ।
  2. घर की छत या द्वार पर भगवा ध्वज लगाएँ। मालवा, राजस्थान और मध्य प्रदेश में यह चलन ख़ास है।
  3. नीम की कोमल पत्तियाँ, मिश्री, काली मिर्च और थोड़ा जीरा मिलाकर परिवार में बाँटें। यह मौसम बदलने पर साल की कड़वी-मीठी शुरुआत का प्रतीक है।
  4. नए पंचांग की पूजा करें। गाँवों में पंडित जी चौपाल पर संवत्सर का फल पढ़कर सुनाते हैं, जिसे "पंचांग श्रवण" कहते हैं।
  5. इसी दिन नवरात्रि शुरू होती है, इसलिए शुभ मुहूर्त में घटस्थापना करें। पूरी विधि नवरात्रि कलश स्थापना विधि में दी गई है।
  6. नए साल के व्रत, त्योहार और एकादशी पहले से जान लें, इसके लिए मासिक कैलेंडर और आज का पंचांग देखें।

1 जनवरी को नया साल मनाने में कोई बुराई नहीं, पर परिवार के बच्चों को यह बताना अच्छा है कि घर के व्रत, त्योहार और संस्कार किस कैलेंडर से चलते हैं। शादी का कार्ड छपवाते समय "विक्रम संवत 2083, मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी" लिखना आज भी उतना ही सम्मानजनक माना जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अभी कौन-सा विक्रम संवत चल रहा है?

19 मार्च 2026 से विक्रम संवत 2083 चल रहा है। 7 अप्रैल 2027 को चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से संवत 2084 शुरू होगा।

विक्रम संवत कैसे निकालें?

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के बाद ईस्वी सन् में 57 जोड़ें। जनवरी से हिंदू नववर्ष तक के बीच 56 जोड़ें, क्योंकि संवत चैत्र में बदलता है, जनवरी में नहीं।

हिंदू नववर्ष कब मनाया जाता है?

उत्तर भारत में हिंदू नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाता है, जो मार्च या अप्रैल में आती है। इसी दिन चैत्र नवरात्रि, गुड़ी पड़वा और उगादि भी होते हैं।

विक्रम संवत और शक संवत में क्या अंतर है?

विक्रम संवत ईसा पूर्व 57 से और शक संवत ईस्वी 78 से गिना जाता है, इसलिए दोनों में 135 वर्ष का अंतर है। शक संवत भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर है।

विक्रम संवत किसने शुरू किया?

परंपरा के अनुसार उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने शकों पर विजय के बाद इसे शुरू किया। पुराने शिलालेखों में यही गणना कृत और मालव संवत के नाम से भी मिलती है।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखक के बारे में

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा

वेद पण्डित, लेखक

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा जी वेद पण्डित और लेखक हैं। अनेक वर्षों से वे दुर्गा देवी की आराधना का अध्ययन और आचरण करते आ रहे हैं। पूजा विधि, मंत्रों और स्तोत्रों को सामान्य भक्तों के लिए सरलता से समझाना उनका लक्ष्य है। वे “श्री दुर्गा नित्याराधना” ग्रंथ के लेखक हैं। इस साइट के लेख उनकी रचनाएँ हैं, या उनके ग्रंथों पर आधारित हैं।

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