कलश स्थापना, जिसे घटस्थापना भी कहते हैं, नवरात्रि की पहली और सबसे ज़रूरी पूजा है। प्रतिपदा की सुबह मिट्टी के पात्र में जौ बोए जाते हैं, उस पर जल से भरा कलश रखकर देवी का आवाहन किया जाता है, और नौ दिनों की सारी पूजा इसी कलश के सामने होती है। यह विधि चैत्र और शारदीय, दोनों नवरात्रि में एक जैसी है।
कलश स्थापना का मुहूर्त
घटस्थापना के शास्त्रीय नियम सीधे हैं:
- प्रतिपदा तिथि चल रही हो। अमावस्या मिली हुई प्रतिपदा को टाला जाता है।
- दिन का पहला हिस्सा, यानी सूर्योदय के बाद के शुरुआती घंटे, सबसे अच्छे माने जाते हैं।
- चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग में स्थापना से बचा जाता है। अगर ये पूरे दिन रहें तो अभिजित मुहूर्त (दोपहर के आसपास का लगभग 48 मिनट का समय) में स्थापना करें।
- रात में या दोपहर बाद घटस्थापना नहीं की जाती।
हर साल का सही समय नई दिल्ली के हिसाब से चैत्र नवरात्रि घटस्थापना और शारदीय नवरात्रि पृष्ठों पर दिया जाता है। नौ दिनों का पूरा कैलेंडर नवरात्रि पृष्ठ पर है।
सामग्री
| सामग्री | किस काम की | न मिले तो |
|---|---|---|
| ताँबे, पीतल या मिट्टी का कलश | घट, जिसमें जल भरा जाएगा | स्टील का लोटा भी चलेगा |
| चौड़ा मिट्टी का पात्र (कुंडा या परात) | जौ बोने के लिए | मिट्टी का गमला या पुराना तसला |
| साफ़ मिट्टी या बालू, जौ | जवारे उगाने के लिए | बगीचे की छनी हुई मिट्टी; जौ न मिलें तो गेहूँ |
| गंगाजल, साफ़ पानी | कलश में भरने के लिए | सादे पानी में तुलसी दल डाल दें |
| सुपारी, सिक्का, हल्दी की गाँठ, दूब, अक्षत | कलश के अंदर | जो मिले वही, कम से कम सुपारी और सिक्का |
| आम के 5 पत्ते (पंच पल्लव) | कलश के मुँह पर | अशोक या पीपल के पत्ते |
| जटा वाला नारियल, लाल चुनरी, मौली | कलश के ऊपर देवी का प्रतीक | बिना जटा का नारियल, लाल कपड़ा |
| मिट्टी का सकोरा, चावल | कलश का ढक्कन, जिस पर नारियल रखेंगे | छोटी कटोरी |
| चौकी, लाल कपड़ा, देवी की तस्वीर | पूजा का आसन | साफ़ पटरा |
| रोली, चंदन, कुमकुम, फूल (गुड़हल) | तिलक और पूजन | कोई भी लाल फूल |
| पीतल का बड़ा दीपक, घी, लंबी बाती | अखंड ज्योति | तिल के तेल का दीपक |
| श्रृंगार सामग्री, धूप, कपूर, फल, मिठाई | देवी को अर्पण | जितना हो सके |
जौ बोना
जौ एक दिन पहले बाज़ार से ले आएँ और साफ़ कर लें। कुछ घर इन्हें रात भर हल्का भिगोते हैं ताकि अंकुर जल्दी निकलें। मिट्टी के पात्र में पहले मिट्टी की एक परत बिछाएँ, उस पर जौ फैलाएँ, फिर ऊपर से पतली परत मिट्टी डालें और हल्का पानी छिड़कें। पानी इतना ही दें कि मिट्टी नम रहे; ज़्यादा पानी से जौ सड़ जाते हैं। तीसरे-चौथे दिन तक हरे अंकुर निकल आते हैं और नवमी तक जवारे कुछ इंच ऊँचे हो जाते हैं। पंजाब, हरियाणा और हिमाचल में इन्हें "खेतरी" कहते हैं।
कलश स्थापना विधि
- सुबह स्नान करके पूजा स्थान साफ़ करें, गंगाजल छिड़कें। चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर देवी की तस्वीर रखें। आपका मुँह पूर्व या उत्तर की ओर रहे।
- दीपक जलाकर गणेश जी का ध्यान करें और हाथ में जल, अक्षत, फूल लेकर संकल्प लें: अपना नाम, गोत्र, स्थान और यह कि नौ दिन माँ दुर्गा की पूजा करेंगे।
- चौकी के पास जौ वाला पात्र रखें।
- कलश पर रोली से स्वस्तिक बनाएँ और गले में मौली बाँधें।
- कलश में गंगाजल मिला पानी भरें, फिर सुपारी, सिक्का, हल्दी की गाँठ, दूब और अक्षत डालें।
- कलश के मुँह पर आम के पाँच पत्ते इस तरह रखें कि डंठल अंदर और पत्ते बाहर फैले रहें।
- मिट्टी के सकोरे में चावल भरकर कलश के मुँह पर रखें।
- नारियल पर लाल चुनरी लपेटें, मौली से बाँधें और उसे सकोरे पर इस तरह रखें कि उसका मुँह (जटा) आपकी ओर रहे।
- कलश को जौ वाले पात्र के बीच में या उसके पास स्थापित करें।
- कलश में वरुण देव और तीर्थों का, और नारियल में माँ दुर्गा का आवाहन करें। रोली, अक्षत, फूल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें।
- अखंड ज्योति जलाएँ, पहले दिन की देवी शैलपुत्री की पूजा करें और जय अम्बे गौरी आरती गाएँ।
अखंड ज्योति
अखंड ज्योति वह दीपक है जो घटस्थापना से लेकर नवरात्रि पूरी होने तक लगातार जलता है। यह संकल्प का हिस्सा है, अनिवार्य नहीं, इसलिए तभी लें जब घर में कोई न कोई हमेशा रहे।
- बड़ा पीतल का दीपक और लंबी रुई की बाती लें, ताकि बार-बार बाती न बदलनी पड़े।
- घी का दीपक देवी के दाहिनी ओर और तेल का दीपक बाईं ओर रखने की परंपरा है।
- हवा से बचाने के लिए काँच की चिमनी लगाएँ, और पास में पर्दा या कागज़ न रखें।
- घी डालते समय ज्योति न बुझे, इसके लिए पहले एक छोटा दीपक उसी ज्योति से जला लें।
- अगर किसी कारण ज्योति बुझ जाए, तो घबराएँ नहीं। माँ से क्षमा माँगकर दोबारा जला दें।
नौ दिन के नियम और विसर्जन
नौ दिनों में सुबह-शाम कलश के सामने आरती करें, रोज़ उस दिन की देवी का ध्यान करें और जौ में हल्का पानी दें। घर में सात्विक भोजन बने, प्याज़-लहसुन से परहेज़ रखें। रोज़ दुर्गा चालीसा या दुर्गा सप्तशती का पाठ करें। व्रत रखने वालों के लिए नवरात्रि व्रत में क्या खाएं और रोज़ की देवी व भोग के लिए नवदुर्गा के नौ रूप देखें।
अष्टमी या नवमी को हवन और कन्या पूजन के बाद विसर्जन की तैयारी होती है। ज़्यादातर घरों में नवमी की शाम या दशमी की सुबह कलश उठाया जाता है:
- देवी को अंतिम आरती और भोग अर्पित करें, पूजा में हुई भूल के लिए क्षमा माँगें।
- कलश को हल्का सा हिलाएँ, फिर आम के पत्तों से कलश का जल पूरे घर में छिड़कें। बचा जल पौधों में डाल दें।
- नारियल को प्रसाद के रूप में परिवार में बाँटें। सिक्का और सुपारी तिजोरी या पूजा घर में रखें।
- जवारे के कुछ तिनके घर के बड़े सिर या कान पर रखते हैं, कुछ अपनी तिजोरी में। बाकी जवारे बहते जल में या किसी पेड़ की जड़ में सम्मान से रख दें।

