नवरात्रि की अष्टमी या नवमी की सुबह उत्तर भारत के लगभग हर मोहल्ले में एक सा दृश्य होता है: छोटी-छोटी बच्चियाँ एक घर से दूसरे घर जा रही हैं, हाथ में चुनरी और प्लेट में हलवा-पूरी। यही कन्या पूजन है, जिसे पंजाब और दिल्ली में "कंजक" भी कहते हैं। इसमें छोटी कन्याओं को माँ दुर्गा का रूप मानकर उनकी पूजा की जाती है और भोजन कराया जाता है। इसके बिना कई परिवारों में नवरात्रि का व्रत पूरा नहीं माना जाता।
अष्टमी या नवमी: परिवार की परंपरा
कन्या पूजन किस दिन हो, इसका कोई एक नियम नहीं है; यह कुल की परंपरा से तय होता है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी यूपी में बहुत से परिवार दुर्गा अष्टमी को कन्याएँ जिमाते हैं। पूर्वी यूपी, बिहार और मध्य प्रदेश में महानवमी को हवन के बाद कन्या पूजन का चलन ज़्यादा है। कुछ घर दोनों दिन करते हैं, और कुछ रोज़ एक कन्या का पूजन करते हुए नौ दिन पूरे करते हैं। अगर घर में पहले से कोई रीत चली आ रही है, तो उसी को मानें। नई शुरुआत कर रहे हों तो जिस दिन व्रत का पारण करना है, उसी दिन कन्या पूजन रखें।
कितनी कन्याएं और लांगुर
परंपरा में नौ कन्याएँ आदर्श मानी जाती हैं, नवदुर्गा के नौ रूपों के प्रतीक के रूप में। नौ न मिलें तो दो, पाँच या सात भी ठीक हैं; एक कन्या का पूजन भी पूरी श्रद्धा से हो तो अधूरा नहीं है। कन्याओं की उम्र आम तौर पर 2 से 10 वर्ष के बीच रखी जाती है। देवी भागवत पुराण में हर उम्र की कन्या को देवी का एक नाम दिया गया है:
| आयु | देवी रूप |
|---|---|
| 2 वर्ष | कुमारी |
| 3 वर्ष | त्रिमूर्ति |
| 4 वर्ष | कल्याणी |
| 5 वर्ष | रोहिणी |
| 6 वर्ष | कालिका |
| 7 वर्ष | चंडिका |
| 8 वर्ष | शांभवी |
| 9 वर्ष | दुर्गा |
| 10 वर्ष | सुभद्रा |
कन्याओं के साथ एक छोटे लड़के को भी बिठाया जाता है, जिसे "लांगुर" या "लंगूर" कहते हैं। उसे भैरव बाबा या हनुमान जी का रूप माना जाता है, जो देवी के पहरेदार हैं। ब्रज और राजस्थान में देवी के लोकगीतों में "लांगुरिया" का ज़िक्र बार-बार आता है। लांगुर को भी कन्याओं जैसा ही सम्मान, भोजन और दक्षिणा दी जाती है।
कन्या पूजन की विधि
- एक-दो दिन पहले आस-पड़ोस और रिश्तेदारों में बच्चियों के माता-पिता से समय तय कर लें। सुबह घर साफ़ करें और भोग तैयार कर लें।
- कन्याओं के आने पर दरवाज़े पर उनका स्वागत करें। कई घरों में "जय माता दी" बोलकर उन पर फूल बरसाए जाते हैं।
- उन्हें साफ़ आसन या चटाई पर एक पंक्ति में बिठाएँ, लांगुर को सबसे आख़िर में या पहले।
- एक परात में उनके पैर रखवाकर साफ़ पानी या दूध मिले पानी से धोएँ और साफ़ कपड़े से पोंछें। कुछ परिवार पैरों में आलता या महावर लगाते हैं।
- माथे पर रोली या कुमकुम का तिलक लगाएँ, अक्षत लगाएँ और कलाई पर मौली बाँधें।
- हर कन्या को लाल चुनरी ओढ़ाएँ या उनके सिर पर रखें।
- दीपक जलाकर उनकी आरती उतारें। देवी का ध्यान करते हुए जय अम्बे गौरी गाई जा सकती है।
- पहले भोग देवी को अर्पित करें, फिर कन्याओं को प्रेम से भोजन परोसें। ज़बरदस्ती न खिलाएँ; बच्चियों को कई घरों में जाना होता है।
- भोजन के बाद हाथ धुलवाएँ, उपहार और दक्षिणा दें।
- हर कन्या के पैर छूकर आशीर्वाद लें और विदा करते समय दरवाज़े तक छोड़ने जाएँ।
भोग: हलवा, पूरी, काले चने
उत्तर भारत में कन्या पूजन का भोग लगभग तय है:
- सूजी का हलवा: देसी घी में भुनी सूजी, चीनी और इलायची से बना।
- पूरी: गेहूँ के आटे की, घी या तेल में तली हुई। (कन्या भोज व्रत का भोजन नहीं है, इसलिए यहाँ अनाज चलता है।)
- काले चने: रात भर भिगोकर सूखे मसालेदार बनाए गए, बिना प्याज़-लहसुन के।
- साथ में नारियल का टुकड़ा, केला या कोई मौसमी फल।
हलवा-पूरी-चना ही भोग क्यों है, इसका कोई शास्त्रीय नियम नहीं, यह लोक परंपरा है जो पीढ़ियों से चली आ रही है। कई परिवार खीर भी बनाते हैं। हर दिन की देवी का अलग भोग जानना हो तो नवदुर्गा के नौ रूप और भोग देखें।
उपहार
दक्षिणा के साथ कोई छोटा, काम आने वाला उपहार देना अच्छा रहता है:
- चुनरी, चूड़ियाँ, बिंदी, हेयर क्लिप या रिबन
- कॉपी, पेंसिल बॉक्स, रंग, कहानी की किताब
- स्टील की छोटी कटोरी, गिलास या टिफ़िन
- फल, मिठाई का छोटा डिब्बा
प्लास्टिक के खिलौनों से बेहतर है कि ऐसी चीज़ दें जो बच्ची सचमुच इस्तेमाल करे। दक्षिणा की राशि सबके लिए बराबर रखें।
आज के समय में कुछ व्यावहारिक बातें
- शहरों में अष्टमी-नवमी की सुबह बच्चियों को कई घरों से बुलावा आता है। अगर वे थोड़ा-सा ही खाएँ, तो बाकी भोग डिब्बे में पैक करके साथ भेज दें।
- भोजन परोसने से पहले माता-पिता से पूछ लें कि किसी बच्ची को किसी चीज़ से परहेज़ तो नहीं।
- पूरी और हलवा ताज़ा बनाएँ, और बहुत ज़्यादा घी-तेल वाला भारी भोजन न रखें। ये छोटे बच्चे हैं, मेहमान नहीं जिन्हें मनाकर खिलाया जाए।
- मोहल्ले की जो भी बच्चियाँ आएँ, उन्हें बराबर प्रेम से बिठाएँ। देवी का भाव हर कन्या में एक सा है।
- अगर कन्याएँ न मिल सकें, तो कई परिवार किसी अनाथालय या स्कूल में बच्चियों के लिए भोजन और कॉपी-किताबें भेजते हैं। यह भी कन्या पूजन का ही सुंदर रूप है।
व्रत का पारण
जो लोग नौ दिन का व्रत रखते हैं, वे आम तौर पर नवमी को कन्या पूजन और हवन के बाद पारण करते हैं; कुछ परिवार दशमी की सुबह पारण करते हैं। केवल पहला और आख़िरी व्रत रखने वाले या अष्टमी तक व्रत रखने वाले अष्टमी को कन्या पूजन के बाद पारण कर लेते हैं। पारण में वही प्रसाद, यानी हलवा-पूरी-चना, सबसे पहले ग्रहण किया जाता है। व्रत के दिनों के भोजन के बारे में नवरात्रि व्रत में क्या खाएं लेख पढ़ें। कलश का विसर्जन इसके बाद होता है, जिसकी विधि कलश स्थापना विधि में दी गई है।

