खरमास क्या है, इसमें क्या न करें

खरमास वह समय है जब सूर्य धनु या मीन राशि में रहता है, यानी मध्य दिसंबर से मकर संक्रांति और मध्य मार्च से मेष संक्रांति तक। इसमें विवाह, गृह प्रवेश और मुंडन टाले जाते हैं, पर सूर्य पूजा, गीता पाठ और दान शुभ माने जाते हैं।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखन: · वेद पण्डित, लेखकअद्यतन · 5 मिनट का पाठ
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खरमास वह लगभग एक महीने का समय है जब सूर्य धनु राशि या मीन राशि में रहता है। साल में यह दो बार आता है: दिसंबर के बीच से मकर संक्रांति तक, और मार्च के बीच से मेष संक्रांति तक। इन दिनों में शादी, गृह प्रवेश, मुंडन और जनेऊ जैसे मांगलिक काम नहीं किए जाते, पर पूजा, जप, दान और तीर्थ स्नान का पुण्य बढ़ा हुआ माना जाता है।

खरमास: सूर्य का धनु और मीन राशि में जाना

सूर्य हर महीने एक राशि बदलता है, इसे संक्रांति कहते हैं। जब वह गुरु (बृहस्पति) की राशियों, यानी धनु और मीन, में पहुँचता है तो ज्योतिष में माना जाता है कि सूर्य और गुरु दोनों का शुभ फल पूरा नहीं मिलता। विवाह जैसे संस्कारों में गुरु और सूर्य दोनों का बल चाहिए, इसलिए यह समय मांगलिक कामों के लिए ठीक नहीं गिना गया।

"खर" का अर्थ गधा होता है। लोक-कथा कहती है कि सूर्यदेव सात घोड़ों के रथ पर बिना रुके चलते हैं। एक बार हेमंत ऋतु में घोड़े प्यास और थकान से बेहाल हो गए। सूर्यदेव को उन पर दया आई, पर रथ रोक नहीं सकते थे। तालाब के पास दो खर (गधे) दिखे, तो उन्होंने घोड़ों को पानी पीने और आराम करने छोड़ दिया और गधों को रथ में जोत लिया। गधों की चाल धीमी थी, इसलिए पूरे एक महीने रथ धीरे चला और सूर्य का तेज कुछ मंद रहा। महीना पूरा होने पर घोड़े फिर जुड़ गए। इसी कहानी से इस महीने का नाम खरमास पड़ा। यह लोक-परंपरा की कथा है, जिसे गाँवों में बुज़ुर्ग बच्चों को सुनाते हैं।

साल में दो बार कब

खरमास की शुरुआत धनु संक्रांति और मीन संक्रांति से होती है, और अंत मकर संक्रांति और मेष संक्रांति पर। चूँकि यह सूर्य की चाल पर चलता है, इसकी अंग्रेज़ी तारीखें हर साल लगभग एक जैसी रहती हैं, बस एक दिन आगे-पीछे हो सकती हैं। नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार आने वाले खरमास:

खरमासशुरुआतसमाप्तिहिंदू महीना
धनु खरमास16 दिसंबर 2026 (धनु संक्रांति)15 जनवरी 2027 (मकर संक्रांति)लगभग पौष
मीन खरमास15 मार्च 2027 (मीन संक्रांति)14 अप्रैल 2027 (मेष संक्रांति)फाल्गुन अंत से चैत्र

संक्रांति का ठीक समय दिन में कभी भी हो सकता है, इसलिए किसी काम की तारीख तय करने से पहले उस दिन का पंचांग ज़रूर देख लें।

खरमास में क्या न करें

इस समय जिन कामों को टालने की परंपरा है, वे सब "शुरुआत" वाले काम हैं, जिनमें लंबे समय के लिए शुभ फल चाहिए:

  • विवाह, सगाई और तिलक। इसीलिए दिसंबर के बीच के बाद विवाह मुहूर्त सीधे मकर संक्रांति के बाद ही मिलते हैं।
  • गृह प्रवेश, नए मकान की नींव और भूमि पूजन।
  • मुंडन, कर्णवेध, जनेऊ (उपनयन) जैसे संस्कार।
  • नई दुकान या व्यापार का उद्घाटन।
  • बहू का पहली बार ससुराल आना (गौना), जहाँ यह रिवाज है।

रोज़मर्रा के काम, नौकरी जॉइन करना, पढ़ाई, इलाज, यात्रा, रोज़ की पूजा और व्रत खरमास में बिलकुल बंद नहीं होते। बहुत से परिवार यह सोचकर घबरा जाते हैं कि "खरमास में तो कुछ भी नहीं करना चाहिए", जबकि मनाही सिर्फ मांगलिक संस्कारों की है। नई गाड़ी या गहने जैसी खरीदारी को लेकर अलग-अलग घरों में अलग राय है; कई लोग टालते हैं, कई नहीं।

अगर कोई काम टाला न जा सके

कभी किराए का मकान खाली करना पड़ता है या नौकरी के कारण नए शहर के घर में जाना ज़रूरी हो जाता है। ऐसे में ज़्यादातर पुरोहित यही सलाह देते हैं कि सामान ले जाकर रहना शुरू कर दें, घर में दीपक जलाएँ और गणेश जी का नाम लें, पर विधिवत गृह प्रवेश पूजा और हवन खरमास के बाद किसी शुभ मुहूर्त में करवा लें। दक्षिण भारत के वैष्णव मंदिरों में यही समय धनुर्मास कहलाता है और वहाँ सुबह-सुबह विशेष पूजा होती है, यानी यह महीना भक्ति के लिए उत्तम ही माना गया है।

खरमास में क्या करें: दान, सूर्य पूजा, गीता पाठ

खरमास को खाली समय नहीं, साधना का समय समझा जाता है। धनु वाला खरमास ज़्यादातर पौष महीने में पड़ता है, और पौष को सूर्य उपासना का महीना कहा गया है।

  1. सूर्य को अर्घ्य: सुबह स्नान के बाद ताँबे के लोटे में जल, रोली और लाल फूल डालकर सूर्य को जल दें और "ॐ घृणि सूर्याय नमः" बोलें। तरीका विस्तार से सूर्य को जल कैसे चढ़ाएं में दिया है।
  2. विष्णु पूजा: खरमास के स्वामी भगवान विष्णु माने जाते हैं। तुलसी दल चढ़ाकर विष्णु सहस्रनाम या "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जप करें।
  3. गीता और भागवत पाठ: रोज़ गीता का एक अध्याय पढ़ने का संकल्प बहुत से घरों में इसी महीने लिया जाता है।
  4. दान: कड़ाके की ठंड का समय है, इसलिए कंबल, गर्म कपड़े, तिल, गुड़ और अन्न का दान सबसे उचित है।
  5. तीर्थ स्नान: गंगा, यमुना या पास की किसी पवित्र नदी में स्नान। प्रयाग में माघ मेले की तैयारी इसी समय शुरू हो जाती है।

खरमास और अधिक मास (मलमास) में अंतर

दोनों को कई जगह "मलमास" कह दिया जाता है, इसलिए भ्रम होता है। पर ये अलग चीज़ें हैं:

बातखरमासअधिक मास
किस पर आधारितसूर्य की राशि (धनु, मीन)चंद्र मास जिसमें कोई संक्रांति न हो
कितनी बारहर साल दो बारलगभग हर ढाई-तीन साल में एक बार
दूसरा नामधनुर्मास, मीन मासपुरुषोत्तम मास, मलमास
मांगलिक कामवर्जितवर्जित

अधिक मास पूरा एक अतिरिक्त चंद्र महीना होता है, जबकि खरमास साल के बारह महीनों के भीतर ही आता है।

खरमास का अंत: मकर संक्रांति

जिस दिन सूर्य धनु से निकलकर मकर राशि में आता है, उसी दिन खरमास खत्म होता है और उत्तरायण का उत्सव मनाया जाता है। पूर्वांचल और बिहार में इसी दिन खिचड़ी चढ़ती है, और अगले दिनों से फिर शहनाइयाँ बजने लगती हैं। इस पर्व के दान और खिचड़ी की परंपरा मकर संक्रांति पर क्या दान करें में पढ़ सकते हैं। मीन वाला खरमास मेष संक्रांति पर खत्म होता है, जिसे पंजाब-हरियाणा में बैसाखी और कई जगह सतुआन के रूप में मनाते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

खरमास कब से कब तक रहता है?

धनु वाला खरमास धनु संक्रांति (लगभग 15-16 दिसंबर) से मकर संक्रांति (14-15 जनवरी) तक और मीन वाला खरमास मीन संक्रांति (लगभग 14-15 मार्च) से मेष संक्रांति (13-14 अप्रैल) तक रहता है।

खरमास में शादी क्यों नहीं होती?

इस समय सूर्य गुरु की राशियों धनु या मीन में होता है और परंपरा में माना जाता है कि विवाह के लिए ज़रूरी सूर्य और गुरु का शुभ बल पूरा नहीं मिलता।

क्या खरमास में नई नौकरी या पढ़ाई शुरू कर सकते हैं?

हाँ। खरमास में मनाही मांगलिक संस्कारों जैसे विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और जनेऊ की है। नौकरी, पढ़ाई, इलाज और यात्रा सामान्य रूप से चलते रहते हैं।

खरमास और मलमास एक ही हैं क्या?

नहीं। खरमास सूर्य के धनु या मीन में रहने का समय है जो हर साल आता है, जबकि मलमास या अधिक मास एक अतिरिक्त चंद्र महीना है जो लगभग हर तीन साल में आता है।

खरमास में क्या दान करें?

ठंड के मौसम के अनुसार कंबल, गर्म कपड़े, तिल, गुड़, अन्न और घी का दान उत्तम माना जाता है।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखक के बारे में

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा

वेद पण्डित, लेखक

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा जी वेद पण्डित और लेखक हैं। अनेक वर्षों से वे दुर्गा देवी की आराधना का अध्ययन और आचरण करते आ रहे हैं। पूजा विधि, मंत्रों और स्तोत्रों को सामान्य भक्तों के लिए सरलता से समझाना उनका लक्ष्य है। वे “श्री दुर्गा नित्याराधना” ग्रंथ के लेखक हैं। इस साइट के लेख उनकी रचनाएँ हैं, या उनके ग्रंथों पर आधारित हैं।

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