सूर्य को जल कैसे चढ़ाएं: अर्घ्य विधि और मंत्र

सूर्य को जल सुबह सूर्योदय के बाद पहले एक घंटे के भीतर, पूर्व की ओर मुख करके, ताँबे के लोटे से दोनों हाथ ऊपर उठाकर पतली धार में चढ़ाया जाता है। जल में रोली या लाल चंदन, अक्षत और लाल फूल डालते हैं और 'ॐ सूर्याय नमः' या अर्घ्य मंत्र बोलते हैं।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखन: · वेद पण्डित, लेखकअद्यतन · 5 मिनट का पाठ
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सूर्य को जल चढ़ाना यानी सूर्य अर्घ्य उत्तर भारत के घरों की सबसे पुरानी रोज़ की पूजाओं में है। नहाकर, पूर्व की ओर मुख करके, ताँबे के लोटे से उगते सूर्य को पतली धार में जल अर्पित किया जाता है और साथ में मंत्र बोला जाता है। इसमें दो मिनट लगते हैं, पर दिन की शुरुआत का यह सबसे सीधा तरीका माना जाता है।

सही समय

  • सबसे अच्छा: सूर्योदय के बाद पहले घंटे के भीतर, जब सूरज की रोशनी लालिमा लिए हो और आँखों को चुभे नहीं।
  • आपके शहर का सूर्योदय समय आज के पंचांग में सबसे ऊपर लिखा रहता है; मौसम के साथ यह करीब डेढ़ घंटे तक आगे-पीछे होता है।
  • बादल या धुंध हो तब भी पूर्व दिशा की ओर मुख करके उसी समय अर्घ्य दें; सूर्य दिखे या न दिखे, नियम वही रहता है।
  • किसी दिन देर हो जाए तो दोपहर से पहले दे दें। शाम का अर्घ्य सामान्य दिनों में नहीं दिया जाता, सिवाय छठ के।

ताँबे का लोटा और जल में क्या मिलाएं

ताँबे का लोटा परंपरा से सूर्य पूजा का पात्र माना गया है। न हो तो पीतल या स्टील का साफ़ लोटा भी चलेगा; भाव ज़्यादा ज़रूरी है। जल ताज़ा और साफ़ हो। उसमें ये चीज़ें थोड़ी-थोड़ी मिलाई जाती हैं:

  • रोली (कुमकुम) या लाल चंदन, एक चुटकी
  • अक्षत, यानी साबुत चावल के कुछ दाने
  • लाल फूल, जैसे गुड़हल (जवाकुसुम) या कनेर की पंखुड़ियाँ; न मिलें तो कोई भी ताज़ा फूल
  • इच्छा हो तो थोड़ा गुड़ या मिश्री
  • मकर संक्रांति और माघ में कई लोग काले तिल भी डालते हैं

एक पुरानी सलाह यह भी है कि ताँबे के बर्तन में दूध न मिलाएँ। कुछ न हो तो सिर्फ़ सादा जल भी पूरा अर्घ्य है।

विधि और मंत्र

  1. स्नान करके साफ़ कपड़े पहनें। जहाँ से सूरज दिखे, जैसे छत, आँगन या बालकनी, वहाँ पूर्व की ओर मुख करके खड़े हों।
  2. लोटे को दोनों हाथों से पकड़ें और इतना ऊपर उठाएँ कि लोटा लगभग सिर के ऊपर या छाती की ऊँचाई पर रहे।
  3. जल को धीरे-धीरे पतली धार में गिराएँ। सीधे सूरज को न घूरें; जल की धार के बीच से सूर्य की ओर देखें।
  4. जल गिराते समय मंत्र बोलें। सबसे सरल है "ॐ सूर्याय नमः" या "ॐ घृणि सूर्याय नमः"। पूरा पारंपरिक अर्घ्य मंत्र यह है: "ॐ एहि सूर्य सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते। अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर॥" (हे हज़ार किरणों वाले, तेज के भंडार, जगत के स्वामी सूर्य, मुझ पर कृपा करें और भक्ति से दिया यह अर्घ्य स्वीकार करें।)
  5. जल ऐसी जगह गिरे कि उसके छींटे पैरों पर न पड़ें। नीचे कोई बर्तन या गमला रख लें; बर्तन का जल बाद में किसी पौधे में डाल दें।
  6. अर्घ्य के बाद अपनी जगह पर ही घड़ी की सुई की दिशा में तीन बार घूमकर परिक्रमा करें और हाथ जोड़कर प्रणाम करें।
  7. चाहें तो गायत्री मंत्र की एक माला या कम से कम तीन बार जाप करें। गायत्री मंत्र सविता यानी सूर्य की ही उपासना है; उसका अर्थ गायत्री मंत्र का अर्थ में पढ़ें।

आम गलतियाँ जिनसे बचें

  • बिना नहाए या रात के कपड़ों में अर्घ्य न दें; जल्दी हो तो कम से कम हाथ-मुँह धोकर साफ़ कपड़े पहन लें।
  • लोटा एक हाथ से न पकड़ें, और जल को एक झटके में न उड़ेलें। धीमी, लगातार धार ही अर्घ्य है।
  • सूरज को नंगी आँखों से देर तक न देखें। तेज़ धूप हो तो नज़र जल की धार पर रखें।
  • अर्घ्य का जल ऐसी जगह न गिराएँ जहाँ लोग उस पर चलें; गमला या क्यारी सबसे अच्छी जगह है।
  • अर्घ्य देकर तुरंत फ़ोन या काम में न लगें; एक-दो मिनट शांत खड़े होकर प्रणाम करें। यही इस पूजा का असली हिस्सा है।

घर के बच्चों को साथ खड़ा करके यह आदत डालें तो उनके लिए भी सुबह जल्दी उठना और दिन की शुरुआत ईश्वर के नाम से करना सहज बन जाता है। बहुत से परिवारों में दादा-दादी यही काम पोते-पोतियों से करवाते हैं।

आदित्य हृदय और सूर्य के 12 नाम

आदित्य हृदय स्तोत्र वाल्मीकि रामायण के युद्ध कांड में आता है। कथा के अनुसार रावण से युद्ध के बीच थके हुए श्रीराम को अगस्त्य ऋषि ने यह स्तोत्र सुनाया था। रविवार को या रोज़ अर्घ्य के बाद इसका पाठ बहुत से परिवार करते हैं।

जिनके पास समय कम है, वे सूर्य के 12 नामों से प्रणाम करते हैं। यही नाम सूर्य नमस्कार के बारह मंत्रों में आते हैं:

  1. ॐ मित्राय नमः
  2. ॐ रवये नमः
  3. ॐ सूर्याय नमः
  4. ॐ भानवे नमः
  5. ॐ खगाय नमः
  6. ॐ पूष्णे नमः
  7. ॐ हिरण्यगर्भाय नमः
  8. ॐ मरीचये नमः
  9. ॐ आदित्याय नमः
  10. ॐ सवित्रे नमः
  11. ॐ अर्काय नमः
  12. ॐ भास्कराय नमः

रविवार व्रत

रविवार सूर्य देव का दिन है। जो लोग रविवार का व्रत रखते हैं, वे सुबह अर्घ्य देकर दिन में एक बार, सूर्यास्त से पहले, बिना नमक का भोजन करते हैं, जैसे गेहूँ की रोटी-गुड़ या दलिया। व्रत आमतौर पर किसी शुक्ल पक्ष के पहले रविवार से शुरू होकर एक साल या 12 रविवार तक रखा जाता है। इसकी कथा, जिसमें एक बुढ़िया के नियम से रविवार मनाने और पड़ोसन की ईर्ष्या का प्रसंग है, रविवार व्रत कथा पृष्ठ पर पूरी दी गई है।

छठ, रथ सप्तमी और मकर संक्रांति

छठ: बिहार और पूर्वांचल का यह पर्व पूरी तरह सूर्य अर्घ्य पर टिका है। कार्तिक शुक्ल षष्ठी की शाम डूबते सूर्य को और सप्तमी की सुबह उगते सूर्य को, घाट पर पानी में खड़े होकर, सूप में ठेकुआ-फल सजाकर दूध और जल का अर्घ्य दिया जाता है। साल में यही एक मौका है जब डूबते सूर्य को भी अर्घ्य देते हैं। पूरी विधि छठ पूजा विधि में है।

रथ सप्तमी: माघ शुक्ल सप्तमी को सूर्य जयंती मानी जाती है। इस दिन सुबह स्नान और विशेष अर्घ्य का महत्व है; इस साल की तिथि रथ सप्तमी पृष्ठ पर देखें।

मकर संक्रांति: जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं, उस दिन तिल-गुड़ मिले जल से अर्घ्य, गंगा स्नान और खिचड़ी-तिल का दान होता है। इसके बारे में मकर संक्रांति पर दान और खिचड़ी में विस्तार से पढ़ें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सूर्य को जल किस समय चढ़ाना चाहिए?

सूर्योदय के बाद पहले एक घंटे के भीतर सबसे अच्छा माना जाता है। देर हो जाए तो दोपहर से पहले दे सकते हैं।

सूर्य को जल देते समय कौन सा मंत्र बोलें?

सरल मंत्र 'ॐ सूर्याय नमः' या 'ॐ घृणि सूर्याय नमः' है। पूरा अर्घ्य मंत्र 'ॐ एहि सूर्य सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते, अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर' है।

सूर्य के जल में क्या डालें?

थोड़ी रोली या लाल चंदन, अक्षत और लाल फूल डालना परंपरा है; चाहें तो गुड़ या मिश्री भी। कुछ न हो तो सादा साफ़ जल भी पर्याप्त है।

क्या बादल होने पर भी सूर्य को जल दे सकते हैं?

हाँ, पूर्व दिशा की ओर मुख करके सूर्योदय के समय अर्घ्य दें। सूर्य दिखाई न दे तब भी नियम वही रहता है।

सूर्य को चढ़ाया जल कहाँ गिरना चाहिए?

जल पैरों पर न गिरे, इसके लिए नीचे बर्तन या गमला रखें और बाद में वह जल किसी पौधे में डाल दें।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखक के बारे में

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा

वेद पण्डित, लेखक

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा जी वेद पण्डित और लेखक हैं। अनेक वर्षों से वे दुर्गा देवी की आराधना का अध्ययन और आचरण करते आ रहे हैं। पूजा विधि, मंत्रों और स्तोत्रों को सामान्य भक्तों के लिए सरलता से समझाना उनका लक्ष्य है। वे “श्री दुर्गा नित्याराधना” ग्रंथ के लेखक हैं। इस साइट के लेख उनकी रचनाएँ हैं, या उनके ग्रंथों पर आधारित हैं।

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