गायत्री मंत्र का अर्थ है: "हम उस प्रेरणा देने वाले सविता देव के श्रेष्ठ, दिव्य तेज का ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धि को सही मार्ग पर प्रेरित करे।" यह ऋग्वेद के तीसरे मंडल का मंत्र है, जिसके ऋषि विश्वामित्र और देवता सविता (सूर्य का प्रेरक रूप) हैं। इसमें धन या सुख नहीं, सिर्फ अच्छी बुद्धि माँगी गई है, और इसीलिए इसे वेदों का सार कहा जाता है।
मंत्र और स्रोत: ऋग्वेद 3.62.10
ॐ भूर्भुवः स्वः।
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्॥
मूल मंत्र ऋग्वेद के तीसरे मंडल के 62वें सूक्त का दसवाँ मंत्र है: "तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्॥" यह गायत्री छंद में है, जिसमें आठ-आठ अक्षरों के तीन चरण, कुल 24 अक्षर होते हैं। इसी छंद के नाम पर मंत्र को गायत्री कहा गया। सविता देवता से जुड़ा होने के कारण इसे सावित्री मंत्र भी कहते हैं।
शुरुआत का "ॐ भूर्भुवः स्वः" मूल ऋचा का हिस्सा नहीं है। यह प्रणव (ॐ) और तीन महाव्याहृतियाँ हैं, जिन्हें यजुर्वेद की परंपरा में मंत्र के पहले जोड़ा गया। आज जप इसी पूरे रूप में होता है। यही मंत्र जनेऊ (उपनयन) संस्कार में गुरु शिष्य को दीक्षा के रूप में देता है, इसलिए इसे गुरु मंत्र भी कहा गया है।
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| ॐ | परमात्मा का मूल नाम, प्रणव |
| भूः | पृथ्वी लोक; अस्तित्व |
| भुवः | अंतरिक्ष लोक; प्राण |
| स्वः | स्वर्ग लोक; प्रकाश और आनंद |
| तत् | उस (परम) |
| सवितुः | सविता देव का — सबको जन्म और प्रेरणा देने वाला सूर्य रूप |
| वरेण्यम् | वरण करने योग्य, सबसे श्रेष्ठ |
| भर्गः | तेज, जो दोषों को जला दे |
| देवस्य | देवता का, दिव्य का |
| धीमहि | हम ध्यान करते हैं, धारण करते हैं |
| धियः | बुद्धियों को |
| यः | जो |
| नः | हमारी |
| प्रचोदयात् | प्रेरित करे, आगे बढ़ाए |
भावार्थ
मंत्र के दो हिस्से हैं। पहले हिस्से में साधक कहता है कि हम उस सविता के तेज का ध्यान करते हैं। सविता सिर्फ आकाश का सूर्य नहीं है, बल्कि वह शक्ति है जो सुबह हर जीव को जगाती है और काम में लगाती है। दूसरे हिस्से में प्रार्थना है: वह हमारी बुद्धि को प्रेरित करे।
ध्यान देने वाली बात है कि यहाँ "मेरी" नहीं, "हमारी" बुद्धि कहा गया है — "नः"। यह प्रार्थना अपने लिए अकेले नहीं, सबके लिए है। और माँगा क्या गया है? न धन, न विजय, न लंबी उम्र — केवल सही सोच। पुराने आचार्य यही समझाते थे कि बुद्धि ठीक हो जाए तो बाकी सब अपने आप ठीक होने लगता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते हैं "छंदों में मैं गायत्री हूँ" (गीता 10.35), जो इस मंत्र की महिमा बताता है।
गायत्री को देवी रूप में भी पूजा जाता है — पंचमुखी, कमल पर विराजमान गायत्री माता, जिन्हें वेदमाता कहा गया है। गायत्री जयंती की तिथि पर परंपराएँ अलग हैं: कई जगह इसे ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी के आसपास और कई जगह श्रावण पूर्णिमा को मनाया जाता है। नई दिल्ली के पंचांग में 2027 की गायत्री जयंती 17 अगस्त (श्रावण पूर्णिमा, रक्षाबंधन के दिन) को दी गई है।
जाप का समय: तीनों संध्या
परंपरा में गायत्री का जप दिन की तीन संध्याओं में किया जाता है:
- प्रातः संध्या: सूर्योदय के समय, या उससे पहले ब्रह्म मुहूर्त में। यह सबसे उत्तम समय माना गया है।
- मध्याह्न संध्या: दोपहर में, सूर्य के सिर के ऊपर आने के आसपास।
- सायं संध्या: सूर्यास्त के समय।
जो रोज़ तीनों समय न कर सकें, वे सुबह स्नान के बाद ही 11 या 108 बार जप करें। सूर्योदय-सूर्यास्त का सही समय आज के पंचांग में देख लें। कई लोग सुबह सूर्य को जल चढ़ाते समय ही तीन बार गायत्री मंत्र बोलते हैं; यह भी अच्छी शुरुआत है। रात में सोने से पहले मन ही मन जप करने पर कोई रोक नहीं है।
गायत्री मंत्र जाप विधि
- स्नान करके साफ कपड़े पहनें और कुश, ऊन या सूती आसन पर बैठें।
- सुबह पूर्व दिशा की ओर मुँह करें। शाम को कई परंपराएँ पश्चिम या उत्तर की ओर बैठने को कहती हैं।
- तीन बार आचमन (हथेली में थोड़ा जल लेकर पीना) करें और कुछ लंबी साँसें लेकर मन स्थिर करें।
- सविता देव का ध्यान करें: उगते सूर्य के सुनहरे प्रकाश की कल्पना।
- रुद्राक्ष, तुलसी या स्फटिक की 108 मनकों की माला लें। माला मध्यमा उंगली पर रखकर अंगूठे से मनके आगे बढ़ाएँ; तर्जनी (पहली उंगली) माला को न छुए।
- सुमेरु (माला का बड़ा मनका) पर पहुँचकर उसे लाँघें नहीं, माला पलटकर फिर से शुरू करें।
- जप होंठ हिलाकर धीमी आवाज़ में (उपांशु) या मन में (मानसिक) करें। ज़ोर से बोलने की बजाय ध्यान अर्थ पर रखें।
- जप पूरा होने पर हाथ जोड़कर जप सविता देव को अर्पित करें।
नियम छोटा रखें पर रोज़ निभाएँ। रोज़ 11 बार जप, कभी-कभार 1100 बार से कहीं अधिक फल देता है — यह हर अनुभवी साधक की सलाह है। अगर आप शिव उपासना भी करते हैं तो महामृत्युंजय मंत्र की जाप विधि भी लगभग ऐसी ही है।
उच्चारण में आम गलतियाँ
- "भूर्भुवः स्वः" को "भूरभुवा स्वाहा" न बोलें। भुवः और स्वः के विसर्ग को हल्के "ह" की तरह बोलें: भुवह, स्वह।
- "सवितुर्" — "सवित्र" या "सवितूर" नहीं; छोटा "तु" और आधा "र्" अगले शब्द से जुड़ता है।
- "वरेण्यं" — "ण्य" संयुक्ताक्षर है। वैदिक पाठ करने वाले कई आचार्य छंद के 24 अक्षर पूरे करने के लिए इसे "वरेणियम्" भी बोलते हैं; दोनों अपनी-अपनी परंपरा में मान्य हैं, बस "वरेन्यम" न बनाएँ।
- "भर्गो" — "भार्गो" नहीं, पहला अक्षर छोटा है।
- "धीमहि" — "धी" लंबा है, "धिमहि" नहीं।
- "धियो यो नः" — ये तीन अलग शब्द हैं; "धियोयोनः" एक साथ न बोलें।
- "प्रचोदयात्" — आखिर में आधा "त्" है, "प्रचोदयाता" नहीं।
शुरुआत में किसी जानकार से एक बार सुनकर सीखें या घर के बड़े से उच्चारण ठीक करवा लें। उच्चारण में थोड़ी कमी रह जाए तो भी भाव सच्चा हो, यह सबसे ज़रूरी बात मानी गई है।

