जनेऊ संस्कार, जिसे उपनयन या यज्ञोपवीत संस्कार भी कहते हैं, हिंदू परंपरा के सोलह संस्कारों में दसवाँ है। "उपनयन" का अर्थ है "पास ले जाना", यानी बालक को गुरु के पास, विद्या और साधना के रास्ते पर ले जाना। इस दिन बालक को तीन धागों वाला पवित्र सूत्र (यज्ञोपवीत) पहनाया जाता है और गायत्री मंत्र की दीक्षा दी जाती है। हर परिवार इसकी उम्र, विधि और नियम अपनी कुल परंपरा के अनुसार मानता है; नीचे वह सामान्य क्रम है जो उत्तर भारत में ज़्यादातर घरों में देखा जाता है।
उपनयन का अर्थ
पुराने समय में उपनयन के बाद बच्चा गुरुकुल जाता था और वेद पढ़ना शुरू करता था। इसलिए इसे "दूसरा जन्म" भी कहा गया: पहला जन्म माता-पिता से, दूसरा ज्ञान से। आज गुरुकुल की जगह स्कूल है, पर संस्कार का भाव वही है: बच्चा अब ज़िम्मेदारी, अनुशासन और रोज़ की संध्या-उपासना का जीवन शुरू कर रहा है।
जनेऊ के तीन धागे कई अर्थों में समझाए जाते हैं: तीन ऋण (देव ऋण, ऋषि ऋण, पितृ ऋण), तीन गुण (सत्व, रज, तम), या ब्रह्मा, विष्णु, महेश। हर धागा भी तीन पतले धागों से बना होता है और सब मिलकर एक गाँठ में बँधते हैं, जिसे ब्रह्म ग्रंथि कहते हैं। विवाह के बाद कई परिवारों में दो जनेऊ (छह धागे) पहने जाते हैं, एक अपनी ओर से और एक पत्नी की ओर से।
प्राचीन ग्रंथों में ब्रह्मवादिनी स्त्रियों के उपनयन का भी उल्लेख मिलता है, और आज आर्य समाज सहित कई परिवार और संस्थाएँ बेटियों का भी उपनयन या गायत्री दीक्षा संस्कार कराते हैं। यह पूरी तरह परिवार की आस्था और परंपरा पर निर्भर है। सभी 16 संस्कारों का क्रम हिंदू धर्म के 16 संस्कार में देखें।
उम्र और मुहूर्त
गृह्यसूत्रों में उपनयन के लिए बचपन से किशोरावस्था तक की अलग-अलग उम्र बताई गई है। आज उत्तर भारत में ज़्यादातर परिवार 7 से 12 साल की उम्र के बीच यह संस्कार करते हैं, और कई घरों में यह विवाह से कुछ दिन पहले होता है, अगर बचपन में न हो पाया हो। सही उम्र वही है जो आपकी कुल परंपरा में चली आ रही है।
मुहूर्त निकालते समय आम तौर पर ये बातें देखी जाती हैं:
- उत्तरायण का समय, ख़ासकर माघ से ज्येष्ठ के महीने; वसंत पंचमी और अक्षय तृतीया लोकप्रिय दिन हैं।
- शुक्ल पक्ष, और द्वितीया, तृतीया, पंचमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी जैसी तिथियाँ।
- खरमास, चातुर्मास, होलाष्टक और गुरु-शुक्र के अस्त होने के दिन टाले जाते हैं।
- बालक की कुंडली के अनुसार चंद्र बल और गुरु बल।
तिथि, नक्षत्र और शुभ समय देखने के लिए आज का पंचांग देखें और अंतिम मुहूर्त कुल पुरोहित से तय कराएँ।
जनेऊ संस्कार की विधि
पूरा संस्कार आम तौर पर एक या दो दिन में होता है। अलग-अलग क्षेत्रों में क्रम थोड़ा बदल सकता है:
- पूर्व तैयारी: एक दिन पहले गणेश पूजन, मातृका पूजन और कुल देवता की पूजा। कई परिवारों में हल्दी की रस्म भी होती है।
- मुंडन: अगर पहले न हुआ हो तो इसी दिन मुंडन करके शिखा (चोटी) छोड़ी जाती है। मुंडन के नियम मुंडन संस्कार में देखें।
- स्नान और वस्त्र: बालक को स्नान कराकर कौपीन (लंगोट) और पीले या सफ़ेद वस्त्र पहनाए जाते हैं।
- अंतिम सह-भोज: कई घरों में इससे पहले बालक माँ के साथ एक थाली में आख़िरी बार भोजन करता है, जिसे बचपन की विदाई माना जाता है।
- हवन: वेदी पर अग्नि स्थापित कर हवन होता है। आचार्य और पिता बालक को अग्नि के सामने बिठाते हैं।
- मेखला और दंड: कमर में मूँज घास की मेखला (करधनी) बाँधी जाती है और हाथ में पलाश या बेल का दंड दिया जाता है, जो ब्रह्मचारी जीवन के अनुशासन का प्रतीक है।
- यज्ञोपवीत धारण: मंत्रोच्चार के साथ जनेऊ को बाएँ कंधे से दाईं कमर की ओर पहनाया जाता है। इस समय पारंपरिक मंत्र "यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं..." पढ़ा जाता है।
- गायत्री दीक्षा: इसके बाद गुरु या पिता एक वस्त्र ओढ़कर बालक के दाहिने कान में गायत्री मंत्र देते हैं (नीचे देखें)।
- सूर्य दर्शन और समिधा: बालक सूर्य को प्रणाम करता है और अग्नि में समिधा (लकड़ी) की आहुति देता है।
- भिक्षा: बालक झोली लेकर सबसे पहले माँ से भिक्षा माँगता है: "भवति भिक्षां देहि।" माँ, फिर बाकी परिजन अनाज, मिठाई और उपहार देते हैं। यह विनम्रता का पहला पाठ माना जाता है।
- आशीर्वाद: अंत में बड़े-बुज़ुर्ग आशीर्वाद देते हैं और सबको भोजन कराया जाता है।
कुछ क्षेत्रों में इसी दिन "काशी यात्रा" की रस्म भी होती है, जिसमें बालक पढ़ने के लिए काशी जाने का नाटक करता है और मामा या पिता उसे मनाकर वापस लाते हैं।
गायत्री दीक्षा
उपनयन का सबसे महत्वपूर्ण क्षण गायत्री दीक्षा है। गुरु या पिता बालक के साथ एक ही वस्त्र के नीचे बैठकर उसे धीरे-धीरे गायत्री मंत्र सिखाते हैं, पहले एक-एक पद, फिर आधा, फिर पूरा मंत्र। इसके बाद बालक से रोज़ सुबह-शाम संध्या में गायत्री जपने की अपेक्षा की जाती है, कम से कम 10 बार और हो सके तो 108 बार। मंत्र का अर्थ और सही उच्चारण गायत्री मंत्र का अर्थ लेख में विस्तार से है।
जनेऊ पहनने के नियम
जनेऊ पहनने के बाद कुछ रोज़ के नियम माने जाते हैं। ये परिवार और क्षेत्र के हिसाब से थोड़े अलग हो सकते हैं:
- पहनने का तरीका: सामान्य रूप से बाएँ कंधे पर से दाईं कमर तक (सव्य या उपवीत)। पितृ कर्म और तर्पण में दाएँ कंधे पर (अपसव्य), और ऋषि तर्पण में माला की तरह गले में (निवीत)।
- शौच के समय: जनेऊ को दाहिने कान पर दो बार लपेट लिया जाता है, ताकि वह अशुद्ध न हो। फिर हाथ-पैर धोकर ही उतारा जाता है।
- जनेऊ हमेशा पहने रहें; नहाते समय भी उतारा नहीं जाता।
- जनेऊ बदलने के अवसर: धागा टूट जाए, बहुत मैला हो जाए, घर में जन्म या मृत्यु का सूतक बीतने पर, ग्रहण के बाद, और हर साल श्रावणी पर।
- पुराना जनेऊ फेंका नहीं जाता; उसे किसी पेड़ की जड़ में या बहते पानी में सम्मान से विसर्जित किया जाता है।
- रोज़ सुबह-शाम संध्या और गायत्री जप की अपेक्षा रहती है, चाहे कुछ मिनट का ही हो।
जनेऊ बदलना: श्रावणी उपाकर्म
श्रावण पूर्णिमा, यानी रक्षाबंधन वाले दिन, श्रावणी उपाकर्म होता है। इस दिन जनेऊ धारण करने वाले लोग नदी या घर पर विशेष स्नान (हेमाद्रि स्नान) करते हैं, पिछले साल की भूलों के लिए प्रायश्चित संकल्प लेते हैं, ऋषि तर्पण करते हैं और नया जनेऊ पहनते हैं। पुराने समय में इसी दिन से वेद पाठ का नया सत्र शुरू होता था। इस साल की तिथि श्रावण पूर्णिमा पृष्ठ पर देखें।
उपनयन के दिन हवन घर पर भी किया जा सकता है; विधि और सामग्री के लिए हवन विधि देखें।

