हिंदू धर्म के 16 संस्कार: नाम और अर्थ

हिंदू धर्म के 16 संस्कार हैं: गर्भाधान, पुंसवन, सीमंतोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, मुंडन, कर्णवेध, विद्यारंभ, उपनयन, वेदारंभ, केशांत, समावर्तन, विवाह और अंत्येष्टि। ये जन्म से पहले से लेकर मृत्यु तक जीवन के पड़ावों को चिह्नित करते हैं।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखन: · वेद पण्डित, लेखकअद्यतन · 5 मिनट का पाठ
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हिंदू धर्म में 16 संस्कार (षोडश संस्कार) जीवन के वे पड़ाव हैं जिन्हें विधि-विधान से मनाया जाता है: गर्भाधान, पुंसवन, सीमंतोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म (मुंडन), कर्णवेध, विद्यारंभ, उपनयन, वेदारंभ, केशांत, समावर्तन, विवाह और अंत्येष्टि। इनमें से नामकरण, मुंडन, जनेऊ, विवाह और अंत्येष्टि आज भी लगभग हर उत्तर भारतीय परिवार में निभाए जाते हैं।

संस्कार क्या हैं

"संस्कार" का सीधा अर्थ है परिष्कार करना, यानी किसी चीज़ को निखारना। जैसे सोने को तपाकर गहना बनाया जाता है, वैसे ही मान्यता है कि जीवन के हर बड़े मोड़ पर एक पूजा, एक प्रार्थना और परिवार का आशीर्वाद व्यक्ति को अगले चरण के लिए तैयार करता है।

संस्कारों का वर्णन गृह्यसूत्रों (आश्वलायन, पारस्कर, गोभिल आदि) और मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति जैसे ग्रंथों में मिलता है। एक बात जानना ज़रूरी है: सभी ग्रंथों की सूची एक जैसी नहीं है। गौतम धर्मसूत्र में 40 संस्कारों का ज़िक्र है, कुछ सूत्र 12 या 13 गिनाते हैं। आज जो 16 की सूची सबसे ज़्यादा प्रचलित है, वह व्यास स्मृति की परंपरा से मानी जाती है और उत्तर भारत में आर्य समाज की संस्कार विधि ने भी इसी को लोकप्रिय बनाया। इसलिए कहीं "वेदारंभ" की जगह "उपनयन" के साथ ही विद्या आरंभ गिना जाता है, या "केशांत" की जगह "विवाह अग्नि परिग्रह" मिलता है।

16 संस्कार: एक नज़र में

क्रमसंस्कारकबसरल अर्थ
1गर्भाधानविवाह के बादसंतान की कामना से प्रार्थना
2पुंसवनगर्भ के तीसरे महीने के आसपासगर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य की प्रार्थना
3सीमंतोन्नयनछठे से आठवें महीनेगर्भवती माँ का मन प्रसन्न रखना, गोदभराई इसी से जुड़ी है
4जातकर्मजन्म के तुरंत बादशिशु को शहद-घी चटाना, कान में मंत्र
5नामकरणजन्म के 11वें या 12वें दिननाम रखना
6निष्क्रमणचौथे महीनेपहली बार घर से बाहर, सूर्य दर्शन
7अन्नप्राशनछठे महीने के आसपासपहली बार अन्न (खीर) खिलाना
8चूड़ाकर्म (मुंडन)पहले, तीसरे या पाँचवें सालजन्म के बाल उतारना
9कर्णवेधतीसरे से पाँचवें सालकान छिदवाना
10विद्यारंभपाँचवें साल के आसपासअक्षर ज्ञान की शुरुआत
11उपनयन (जनेऊ)किशोरावस्था से पहलेगुरु के पास जाने का संस्कार, यज्ञोपवीत
12वेदारंभउपनयन के साथ या बादवेद और शास्त्र अध्ययन शुरू
13केशांत (गोदान)लगभग 16 वर्षपहली बार दाढ़ी-मूँछ उतारना
14समावर्तनशिक्षा पूरी होने परगुरुकुल से घर लौटना, दीक्षांत
15विवाहगृहस्थ आश्रम में प्रवेशजीवनसाथी के साथ सात फेरे
16अंत्येष्टिमृत्यु के बादअंतिम संस्कार, शरीर को अग्नि को सौंपना

जन्म से पहले के संस्कार

पहले तीन संस्कार गर्भ से जुड़े हैं। आज गर्भाधान और पुंसवन विधि-विधान से कम ही होते हैं, लेकिन इनका भाव, यानी माँ और शिशु के अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना, बना हुआ है।

सीमंतोन्नयन का लोक रूप हम सब जानते हैं: गोदभराई। उत्तर प्रदेश और बिहार में इसे "सधौरी" या "साध" भी कहते हैं। सातवें-आठवें महीने में गर्भवती बहू को नए कपड़े पहनाए जाते हैं, गोद में फल, मेवा, नारियल रखा जाता है और घर की महिलाएँ सोहर गाती हैं। संस्कार का मूल उद्देश्य भी यही था कि माँ प्रसन्न रहे।

बचपन के संस्कार: नामकरण, अन्नप्राशन, मुंडन

जातकर्म और छठी

जन्म के तुरंत बाद पिता या दादी शिशु को सोने की सलाई से शहद और घी की बूँद चटाते थे और कान में "वेदोऽसि" जैसा आशीर्वाद बोलते थे। इसके बाद छठे दिन छठी पूजी जाती है, जो उत्तर भारत में लगभग हर घर में होती है।

नामकरण

जन्म के 11वें दिन (कई परिवारों में 12वें दिन या बरही के दिन) सूतक समाप्ति के बाद नामकरण होता है। पंडित जी जन्म नक्षत्र के चरण से नाम का पहला अक्षर बताते हैं। पूरी विधि और नाम चुनने के तरीके नामकरण संस्कार लेख में हैं।

निष्क्रमण और अन्नप्राशन

चौथे महीने बच्चे को पहली बार घर के बाहर लाकर सूर्य दर्शन कराया जाता है। छठे महीने (लड़के के लिए सम महीनों में, लड़की के लिए विषम महीनों में, ऐसी भी परंपरा है) चाँदी की कटोरी-चम्मच से खीर चटाकर अन्नप्राशन होता है। बिहार और पूर्वांचल में इसे "मुँहजुठी" या "पेहनी" भी कहते हैं।

मुंडन और कर्णवेध

पहले, तीसरे या पाँचवें साल (विषम वर्ष में) मुंडन किया जाता है। बहुत से परिवार इसे कुलदेवी के मंदिर, गंगा किनारे या विंध्याचल, मैहर जैसे शक्तिपीठों पर करवाते हैं। उम्र, मुहूर्त और विधि के लिए मुंडन संस्कार पढ़ें। कर्णवेध अक्सर मुंडन के साथ या उसके कुछ समय बाद होता है।

विद्या और विवाह

विद्यारंभ

आज यह संस्कार अक्सर वसंत पंचमी को होता है, जब बच्चे से सरस्वती पूजा के साथ पहली बार "ॐ" या "श्री गणेशाय नमः" लिखवाया जाता है। इसे अक्षरारंभ भी कहते हैं।

उपनयन, वेदारंभ, केशांत, समावर्तन

उपनयन यानी जनेऊ संस्कार प्राचीन काल में गुरुकुल जाने की शुरुआत था। इसमें गायत्री मंत्र की दीक्षा दी जाती है। आज कई परिवार विवाह से कुछ दिन पहले ही जनेऊ करा देते हैं। विधि और नियम जनेऊ संस्कार में देखें। वेदारंभ, केशांत और समावर्तन अब अलग से बहुत कम होते हैं; विवाह से पहले की कुछ रस्में (जैसे "काशी यात्रा" का नाटकीय रूप) समावर्तन की ही याद हैं।

विवाह

विवाह को सबसे बड़ा संस्कार माना गया है क्योंकि इससे गृहस्थ आश्रम शुरू होता है, जिस पर बाकी तीनों आश्रम टिके हैं। इसमें कन्यादान, पाणिग्रहण, अग्नि के सात फेरे और सप्तपदी मुख्य हैं। हर फेरे और वचन का अर्थ सात फेरे और सात वचन में विस्तार से है, और तिथि कैसे तय होती है यह विवाह मुहूर्त में।

अंत्येष्टि

जीवन का अंतिम संस्कार अंत्येष्टि है। इसमें दाह संस्कार, अस्थि विसर्जन, दसवाँ, तेरहवीं और फिर वार्षिक श्राद्ध आते हैं। यह संस्कार परिवार निभाता है, व्यक्ति स्वयं नहीं।

आज कौन-से संस्कार प्रचलित हैं

  • लगभग हर घर में: छठी, नामकरण, मुंडन, विवाह, अंत्येष्टि।
  • बहुत से घरों में: गोदभराई (सीमंतोन्नयन), अन्नप्राशन, कर्णवेध, वसंत पंचमी पर विद्यारंभ।
  • कुछ परिवारों और परंपराओं में: जनेऊ, पुंसवन, निष्क्रमण।
  • अब बहुत कम: गर्भाधान, वेदारंभ, केशांत और समावर्तन अलग संस्कार के रूप में।

हर संस्कार के लिए शुभ तिथि, नक्षत्र और लग्न देखा जाता है। किसी दिन का मुहूर्त जाँचने के लिए आज का पंचांग देखें और अंतिम निर्णय अपने कुल पुरोहित से करवाएं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हिंदू धर्म में कितने संस्कार होते हैं?

सबसे प्रचलित सूची 16 संस्कारों की है, जिसे षोडश संस्कार कहते हैं। अलग-अलग ग्रंथों में यह संख्या 12 से 40 तक मिलती है।

पहला और अंतिम संस्कार कौन-सा है?

पहला संस्कार गर्भाधान और अंतिम संस्कार अंत्येष्टि है।

सबसे महत्वपूर्ण संस्कार कौन-सा माना जाता है?

विवाह को सबसे बड़ा संस्कार माना गया है, क्योंकि इससे गृहस्थ आश्रम शुरू होता है।

गोदभराई कौन-सा संस्कार है?

गोदभराई सीमंतोन्नयन संस्कार का लोक रूप है, जो गर्भ के छठे से आठवें महीने में होता है।

मुंडन किस उम्र में करना चाहिए?

परंपरा से मुंडन पहले, तीसरे या पाँचवें वर्ष, यानी विषम वर्ष में किया जाता है। कुछ परिवारों की अपनी कुल रीति भी होती है।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखक के बारे में

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा

वेद पण्डित, लेखक

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा जी वेद पण्डित और लेखक हैं। अनेक वर्षों से वे दुर्गा देवी की आराधना का अध्ययन और आचरण करते आ रहे हैं। पूजा विधि, मंत्रों और स्तोत्रों को सामान्य भक्तों के लिए सरलता से समझाना उनका लक्ष्य है। वे “श्री दुर्गा नित्याराधना” ग्रंथ के लेखक हैं। इस साइट के लेख उनकी रचनाएँ हैं, या उनके ग्रंथों पर आधारित हैं।

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