नामकरण संस्कार: विधि और नाम कैसे चुनें

नामकरण संस्कार सूतक पूरा होने के बाद, आमतौर पर जन्म के 11वें या 12वें दिन किया जाता है। बच्चे के जन्म नक्षत्र के चरण से नाम का पहला अक्षर निकलता है; उसी से राशि नाम रखा जाता है और घर के लोग चाहें तो अलग पुकार का नाम भी रखते हैं।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखन: · वेद पण्डित, लेखकअद्यतन · 5 मिनट का पाठ
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नामकरण संस्कार में नवजात बच्चे को विधि से उसका नाम दिया जाता है। यह सोलह संस्कारों में पाँचवाँ माना जाता है और जन्म के सूतक के दस दिन पूरे होने के बाद, आमतौर पर 11वें या 12वें दिन किया जाता है। नाम का पहला अक्षर बच्चे के जन्म नक्षत्र के चरण से निकलता है, जिसे पंडित जी जन्म के समय से निकालकर बताते हैं। सोलह संस्कारों का पूरा क्रम 16 संस्कार लेख में देखें।

नामकरण कब करें: 11वाँ या 12वाँ दिन

पारस्कर और दूसरे गृह्यसूत्रों में कहा गया है कि जन्म के दस दिन बीतने पर, जब घर सूतक से शुद्ध हो जाए, तब बच्चे का नाम रखा जाए। इसीलिए उत्तर भारत में ज़्यादातर नामकरण 11वें या 12वें दिन होता है, और कई घरों में इसी दिन ‘दसूठन’ या ‘बरही’ की रस्म भी साथ में होती है।

  • अगर उस दिन कोई अड़चन हो (माँ की तबीयत, अमावस्या, ग्रहण) तो 16वें, 20वें या 21वें दिन कर सकते हैं।
  • कई परिवार सवा महीने (लगभग 40 दिन) पर, जब माँ पहली बार मंदिर जाती हैं, तब नामकरण करते हैं।
  • कुछ परिवारों में 101वें दिन या पहले जन्मदिन पर भी नामकरण होता है।

दिन चुनते समय रिक्ता तिथियाँ (चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी) और अमावस्या टालते हैं, और सोमवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार को अच्छा मानते हैं। उस दिन की तिथि और नक्षत्र आज के पंचांग में देख लें।

सूतक और नामकरण

जन्म का सूतक परिवार की परंपरा के अनुसार आमतौर पर दस दिन माना जाता है, कहीं-कहीं इससे अधिक भी। सूतक में घर में पूजा-पाठ, मंदिर जाना और हवन रुका रहता है। ग्यारहवें दिन घर की सफ़ाई होती है, सबके कपड़े धुलते हैं, माँ और बच्चे का स्नान होता है और घर में गंगाजल छिड़का जाता है। इसके बाद ही नामकरण की पूजा होती है। माँ की सेहत पहली प्राथमिकता है; अगर ऑपरेशन से प्रसव हुआ हो और माँ बैठ न पाएँ तो रस्म छोटी रखें या कुछ दिन आगे कर दें।

नक्षत्र से नाम का अक्षर

27 नक्षत्रों में हर नक्षत्र के चार चरण (पाद) होते हैं और हर चरण का एक अक्षर तय है। बच्चे का जन्म जिस नक्षत्र के जिस चरण में हुआ, उसी अक्षर से नाम शुरू करने की परंपरा है। इसे अवकहड़ा चक्र कहते हैं:

नक्षत्रचरण 1चरण 2चरण 3चरण 4
अश्विनीचूचेचोला
भरणीलीलूलेलो
कृत्तिकाअईउए
रोहिणीओवावीवू
मृगशिरावेवोकाकी
आर्द्राकूघङछ
पुनर्वसुकेकोहाही
पुष्यहूहेहोडा
आश्लेषाडीडूडेडो
मघामामीमूमे
पूर्वा फाल्गुनीमोटाटीटू
उत्तरा फाल्गुनीटेटोपापी
हस्तपूषणठ
चित्रापेपोरारी
स्वातिरूरेरोता
विशाखातीतूतेतो
अनुराधानानीनूने
ज्येष्ठानोयायीयू
मूलयेयोभाभी
पूर्वाषाढ़ाभूधाफाढा
उत्तराषाढ़ाभेभोजाजी
श्रवणखीखूखेखो
धनिष्ठागागीगूगे
शतभिषागोसासीसू
पूर्वा भाद्रपदसेसोदादी
उत्तरा भाद्रपददूथझञ
रेवतीदेदोचाची

व्यवहार में अक्षर की मात्रा पर बहुत ज़ोर नहीं दिया जाता: ‘वी’ अक्षर आए तो विवेक, विनीता, विशाल जैसे नाम सब चल जाते हैं। ङ, ञ, ण जैसे अक्षरों से नाम कठिन हों तो पंडित जी उसी नक्षत्र के दूसरे अक्षर या राशि के अक्षर सुझा देते हैं। नक्षत्रों के स्वामी और स्वभाव 27 नक्षत्र लेख में पढ़ें, और अपने नाम से राशि जानने का तरीका नाम से राशि लेख में है।

घर पर नामकरण की विधि

  1. सुबह घर की सफ़ाई करके माँ और बच्चे को स्नान कराएँ, बच्चे को नए कपड़े पहनाएँ। घर के लोग भी नहाकर साफ़ कपड़े पहनें।
  2. पूजा की चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर गणेश जी, कलश और कुल देवता का स्थान बनाएँ। दीपक जलाएँ।
  3. पंडित जी पिता से संकल्प कराते हैं, फिर गणेश पूजन, कलश पूजन और नवग्रह पूजन होता है। कई घरों में छोटा हवन भी होता है।
  4. एक थाली में चावल या गेहूँ फैलाकर उस पर सोने या चाँदी की सलाई, या पान के डंठल से बच्चे का नाम लिखा जाता है। कई घरों में पहले भगवान का नाम, फिर कुल देवता, फिर बच्चे का नाम लिखते हैं।
  5. पिता बच्चे के दाहिने कान में धीरे से उसका नाम तीन बार कहते हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार के बहुत से घरों में यह हक बुआ का होता है, और बुआ को इसके लिए नेग मिलता है।
  6. घर के बड़े बच्चे को आशीर्वाद देते हुए उसका नाम लेकर पुकारते हैं; बच्चे के माथे पर तिलक लगाया जाता है।
  7. आरती होती है, प्रसाद बँटता है, और ब्राह्मण, बहन-बेटियों और ज़रूरतमंदों को दान दिया जाता है।

कुछ न मिले तो: सोने-चाँदी की सलाई न हो तो साफ़ हल्दी लगी लकड़ी की तीली चलेगी। पंडित न मिल पाएँ तो घर के बड़े गणेश पूजा और आरती करके, भगवान को साक्षी मानकर नाम रख सकते हैं।

घर का नाम और राशि का नाम

पुराने समय में बच्चे के कई नाम होते थे। आज भी ज़्यादातर परिवारों में दो नाम चलते हैं:

  • राशि या जन्म नाम: जन्म नक्षत्र के अक्षर से रखा गया नाम। कुंडली, संकल्प और पूजा-पाठ में यही लिया जाता है। कई परिवार इसे बाहर कम बताते हैं।
  • पुकार या व्यवहार का नाम: स्कूल, कागज़ों और रोज़ के लिए रखा गया नाम, जो अक्षर से शुरू होना ज़रूरी नहीं।
  • दुलार का नाम: मुन्ना, गुड़िया, लड्डू जैसे नाम, जो प्यार से अपने आप पड़ जाते हैं।

गृह्यसूत्रों में यह भी कहा गया है कि बेटे का नाम सम अक्षरों वाला और बेटी का नाम आसानी से बोला जाने वाला, मधुर और दीर्घ स्वर पर खत्म होने वाला हो। आज इसे सलाह की तरह लें, नियम की तरह नहीं। नाम ऐसा चुनें जिसका अर्थ अच्छा हो, जो बोलने में आसान हो और जिसका मज़ाक न बने।

नामकरण के बाद अगला बड़ा संस्कार अन्नप्राशन और फिर मुंडन संस्कार होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नामकरण संस्कार कितने दिन बाद करना चाहिए?

आमतौर पर जन्म के सूतक के दस दिन पूरे होने के बाद 11वें या 12वें दिन। किसी कारण से न हो पाए तो 21वें दिन, सवा महीने पर या 101वें दिन भी कर सकते हैं।

बच्चे के नाम का अक्षर कैसे निकालें?

जन्म के समय से बच्चे का नक्षत्र और उसका चरण निकाला जाता है। हर नक्षत्र-चरण का एक अक्षर तय है, उसी से नाम शुरू करते हैं।

नामकरण में बच्चे का नाम कौन रखता है?

शास्त्र के अनुसार पिता बच्चे के कान में नाम कहते हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार के बहुत से घरों में यह हक बुआ का होता है।

क्या राशि नाम और पुकार नाम अलग हो सकते हैं?

हाँ। राशि नाम कुंडली और पूजा में काम आता है, जबकि पुकार या स्कूल का नाम परिवार अपनी पसंद से रख सकता है।

क्या सूतक में नामकरण कर सकते हैं?

नहीं, नामकरण सूतक खत्म होने और घर की शुद्धि के बाद ही होता है।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखक के बारे में

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा

वेद पण्डित, लेखक

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा जी वेद पण्डित और लेखक हैं। अनेक वर्षों से वे दुर्गा देवी की आराधना का अध्ययन और आचरण करते आ रहे हैं। पूजा विधि, मंत्रों और स्तोत्रों को सामान्य भक्तों के लिए सरलता से समझाना उनका लक्ष्य है। वे “श्री दुर्गा नित्याराधना” ग्रंथ के लेखक हैं। इस साइट के लेख उनकी रचनाएँ हैं, या उनके ग्रंथों पर आधारित हैं।

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