27 नक्षत्रों के नाम, स्वामी और स्वभाव

27 नक्षत्र आकाश के 13 अंश 20 कला के बराबर हिस्से हैं जिनसे चंद्रमा गुज़रता है; अश्विनी से रेवती तक हर एक का स्वामी ग्रह विंशोत्तरी क्रम (केतु, शुक्र, सूर्य, चंद्र, मंगल, राहु, गुरु, शनि, बुध) में तय है। इन्हीं से जन्म नक्षत्र, नामाक्षर और मुहूर्त देखे जाते हैं।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखन: · वेद पण्डित, लेखकअद्यतन · 6 मिनट का पाठ
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नक्षत्र आकाश के वे 27 हिस्से हैं जिनसे होकर चंद्रमा हर महीने गुज़रता है। अश्विनी से रेवती तक हर नक्षत्र का एक स्वामी ग्रह, एक देवता और एक स्वभाव माना गया है, और इन्हीं से जन्म नक्षत्र, नाम का पहला अक्षर, मुहूर्त और दशा तय होती है। नीचे पूरी सूची तालिका में है, साथ में अभिजित, गंडमूल और शुभ कामों के नक्षत्रों की जानकारी।

नक्षत्र क्या है

पृथ्वी से देखने पर सूर्य, चंद्रमा और ग्रह आकाश में एक ही पट्टी पर चलते दिखते हैं। इस 360 अंश की पट्टी को बारह राशियों में भी बाँटा गया है और सत्ताईस नक्षत्रों में भी। हर नक्षत्र 13 अंश 20 कला का होता है, और हर नक्षत्र के चार चरण (पाद) होते हैं, यानी कुल 108 चरण। एक राशि में सवा दो नक्षत्र, अर्थात नौ चरण आते हैं।

चंद्रमा लगभग 27.3 दिन में यह पूरी पट्टी घूम लेता है, इसलिए वह लगभग एक दिन एक नक्षत्र में रहता है। पंचांग में "आज का नक्षत्र" का मतलब है कि चंद्रमा इस समय किस नक्षत्र में है। वैदिक काल से नक्षत्रों को चंद्रमा की सत्ताईस पत्नियाँ कहा गया है, जो दक्ष प्रजापति की पुत्रियाँ थीं। रोहिणी उनमें चंद्रमा को सबसे प्रिय थी, और इसी पक्षपात की कथा से चंद्रमा के घटने-बढ़ने की पौराणिक व्याख्या जुड़ी है।

27 नक्षत्र: नाम, स्वामी, राशि

स्वामी ग्रह विंशोत्तरी दशा वाले क्रम में हैं: केतु, शुक्र, सूर्य, चंद्र, मंगल, राहु, गुरु, शनि, बुध — यह क्रम तीन बार दोहराता है। जहाँ दो राशियाँ लिखी हैं, वहाँ नक्षत्र के कुछ चरण एक राशि में और बाकी अगली राशि में पड़ते हैं।

क्रमनक्षत्रस्वामीराशिदेवतागण
1अश्विनीकेतुमेषअश्विनी कुमारदेव
2भरणीशुक्रमेषयममनुष्य
3कृत्तिकासूर्यमेष-वृषभअग्निराक्षस
4रोहिणीचंद्रवृषभब्रह्मा (प्रजापति)मनुष्य
5मृगशिरामंगलवृषभ-मिथुनसोमदेव
6आर्द्राराहुमिथुनरुद्रमनुष्य
7पुनर्वसुगुरुमिथुन-कर्कअदितिदेव
8पुष्यशनिकर्कबृहस्पतिदेव
9आश्लेषाबुधकर्कसर्प (नाग)राक्षस
10मघाकेतुसिंहपितरराक्षस
11पूर्वा फाल्गुनीशुक्रसिंहभगमनुष्य
12उत्तरा फाल्गुनीसूर्यसिंह-कन्याअर्यमामनुष्य
13हस्तचंद्रकन्यासविता (सूर्य)देव
14चित्रामंगलकन्या-तुलाविश्वकर्मा (त्वष्टा)राक्षस
15स्वातीराहुतुलावायुदेव
16विशाखागुरुतुला-वृश्चिकइंद्र-अग्निराक्षस
17अनुराधाशनिवृश्चिकमित्रदेव
18ज्येष्ठाबुधवृश्चिकइंद्रराक्षस
19मूलकेतुधनुनिर्ऋतिराक्षस
20पूर्वाषाढ़ाशुक्रधनुजल (आपः)मनुष्य
21उत्तराषाढ़ासूर्यधनु-मकरविश्वेदेवमनुष्य
22श्रवणचंद्रमकरविष्णुदेव
23धनिष्ठामंगलमकर-कुंभअष्ट वसुराक्षस
24शतभिषाराहुकुंभवरुणराक्षस
25पूर्वा भाद्रपदगुरुकुंभ-मीनअज एकपादमनुष्य
26उत्तरा भाद्रपदशनिमीनअहिर्बुध्न्यमनुष्य
27रेवतीबुधमीनपूषादेव

गण का उपयोग विवाह के गुण मिलान में होता है: देव गण को सौम्य, मनुष्य गण को संतुलित और राक्षस गण को तेज़-तर्रार स्वभाव का माना जाता है। "राक्षस गण" सुनकर घबराने की बात नहीं; यह सिर्फ स्वभाव का वर्गीकरण है।

नक्षत्रों का स्वभाव

मुहूर्त ग्रंथ नक्षत्रों को उनके स्वभाव के अनुसार सात समूहों में रखते हैं, और यही तय करता है कि किस काम के लिए कौन-सा नक्षत्र ठीक है:

  • ध्रुव (स्थिर): रोहिणी, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तरा भाद्रपद — नींव, गृह प्रवेश, स्थायी काम।
  • चर (चल): स्वाती, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा — यात्रा, वाहन, नई गाड़ी।
  • उग्र: भरणी, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वा भाद्रपद — कठोर या साहस वाले काम।
  • मिश्र: कृत्तिका, विशाखा — मिले-जुले काम।
  • क्षिप्र (लघु): अश्विनी, पुष्य, हस्त — व्यापार, पढ़ाई शुरू करना, दवा।
  • मृदु (कोमल): मृगशिरा, चित्रा, अनुराधा, रेवती — कला, संगीत, वस्त्र-आभूषण, मित्रता।
  • तीक्ष्ण: आर्द्रा, आश्लेषा, ज्येष्ठा, मूल — तंत्र-साधना या शत्रु शमन जैसे काम।

अभिजित: 28वाँ नक्षत्र

कुछ गणनाओं में 28 नक्षत्र गिने जाते हैं। अट्ठाईसवाँ अभिजित है, जो उत्तराषाढ़ा के आखिरी चरण और श्रवण के शुरुआती हिस्से के बीच की छोटी-सी पट्टी है। इसका कोई अलग चरण या दशा नहीं होती, इसलिए जन्म नक्षत्र और दशा में 27 ही गिने जाते हैं, पर मुहूर्त विचार में अभिजित को बहुत शुभ माना गया है। इसी नाम से दिन के बीच का "अभिजित मुहूर्त" भी है, जो एक अलग चीज़ है और रोज़ के पंचांग में अलग से दिया रहता है।

गंडमूल नक्षत्र

अश्विनी, आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल और रेवती — ये छह गंडमूल नक्षत्र कहलाते हैं। ये वहाँ पड़ते हैं जहाँ जल तत्व वाली राशि खत्म होकर अग्नि तत्व वाली राशि शुरू होती है (कर्क से सिंह, वृश्चिक से धनु, मीन से मेष)। ध्यान दें कि इनके स्वामी केतु और बुध ही हैं।

इन नक्षत्रों में जन्मे बच्चे के लिए परंपरा में मूल शांति करवाई जाती है। आम तौर पर जन्म के 27वें दिन, जब चंद्रमा फिर उसी नक्षत्र में आता है, पूजा, हवन और दान होता है। गंडमूल को डर की बात न बनाएँ; यह एक शांति कर्म है जो हर परिवार अपने पुरोहित की सलाह से करता है। ये बच्चे भी उतने ही भाग्यवान होते हैं जितने कोई और।

शुभ कार्यों के नक्षत्र

  • विवाह: रोहिणी, मृगशिरा, मघा, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, स्वाती, अनुराधा, मूल, उत्तराषाढ़ा, उत्तरा भाद्रपद, रेवती। पूरा तरीका विवाह मुहूर्त कैसे निकाला जाता है में है।
  • सोना-चाँदी, नया सामान: पुष्य, खास तौर पर गुरुवार (गुरु पुष्य) या रविवार (रवि पुष्य) को। दिवाली से पहले का पुष्य नक्षत्र खरीदारी के लिए प्रसिद्ध है।
  • गृह प्रवेश: ध्रुव और मृदु नक्षत्र।
  • नामकरण, अन्नप्राशन: क्षिप्र, मृदु, चर और ध्रुव नक्षत्र।
  • सावधानी: धनिष्ठा के उत्तरार्ध से रेवती तक पंचक रहता है, जिसमें कुछ खास काम टाले जाते हैं।

अपना जन्म नक्षत्र कैसे जानें

जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में था, वही आपका जन्म नक्षत्र है। इसके लिए जन्म की तारीख, सही समय और जन्म स्थान चाहिए। जन्मपत्री में यह "जन्म नक्षत्र" या "नक्षत्र-चरण" के रूप में लिखा होता है। पत्री न हो तो जन्म की तारीख वाले दिन का पंचांग देखिए, पर ध्यान रखें कि उस दिन नक्षत्र बीच में बदल भी सकता है, इसलिए जन्म का समय मिलाकर ही पक्का करें। पंचांग कैसे पढ़ें में नक्षत्र के खत्म होने का समय पढ़ने का तरीका दिया है।

हर नक्षत्र-चरण का एक अक्षर तय है, जैसे अश्विनी के चार चरणों के अक्षर चू, चे, चो, ला हैं। बच्चे का नाम अक्सर इसी अक्षर से रखा जाता है। पूरी सूची के लिए नाम से राशि कैसे जानें देखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

27 नक्षत्रों के स्वामी ग्रह किस क्रम में हैं?

स्वामी ग्रह केतु, शुक्र, सूर्य, चंद्र, मंगल, राहु, गुरु, शनि, बुध के क्रम में तीन बार दोहराते हैं। अश्विनी का स्वामी केतु और रेवती का स्वामी बुध है।

गंडमूल नक्षत्र कौन-से हैं?

अश्विनी, आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल और रेवती। इनमें जन्म होने पर परंपरा में 27वें दिन मूल शांति करवाई जाती है।

28वाँ नक्षत्र कौन-सा है?

अभिजित को 28वाँ नक्षत्र माना जाता है, जो उत्तराषाढ़ा और श्रवण के बीच है। जन्म नक्षत्र और दशा में इसे नहीं गिना जाता, पर मुहूर्त में यह शुभ है।

एक नक्षत्र कितने समय का होता है?

आकाश में हर नक्षत्र 13 अंश 20 कला का है। चंद्रमा एक नक्षत्र लगभग एक दिन में पार करता है, पर यह समय 20 से 27 घंटे के बीच बदलता रहता है।

खरीदारी के लिए सबसे शुभ नक्षत्र कौन-सा है?

पुष्य नक्षत्र को खरीदारी के लिए सबसे शुभ माना जाता है, खास तौर पर जब यह गुरुवार या रविवार को पड़े।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखक के बारे में

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा

वेद पण्डित, लेखक

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा जी वेद पण्डित और लेखक हैं। अनेक वर्षों से वे दुर्गा देवी की आराधना का अध्ययन और आचरण करते आ रहे हैं। पूजा विधि, मंत्रों और स्तोत्रों को सामान्य भक्तों के लिए सरलता से समझाना उनका लक्ष्य है। वे “श्री दुर्गा नित्याराधना” ग्रंथ के लेखक हैं। इस साइट के लेख उनकी रचनाएँ हैं, या उनके ग्रंथों पर आधारित हैं।

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