हिंदू विवाह में वर-वधू अग्नि के चारों ओर सात फेरे लेते हैं और सप्तपदी के सात कदम साथ चलते हैं। हर कदम के साथ एक वचन जुड़ा है: अन्न, बल, धन, सुख, संतान, हर ऋतु में साथ और आजीवन मित्रता। उत्तर भारत में इन्हीं के साथ "सात वचन" भी प्रचलित हैं, जो कन्या वर से माँगती है, और वर के स्वीकार करने पर ही वह उसके वामांग में बैठती है।
हिंदू विवाह की मुख्य रस्में क्रम से
हर क्षेत्र और जाति-बिरादरी की रीति अलग है, फिर भी उत्तर भारतीय शादी का मूल ढाँचा लगभग यही रहता है:
- तिलक/सगाई और लग्न पत्रिका: पंडित जी विवाह मुहूर्त निकालते हैं और लग्न पत्रिका भेजी जाती है।
- हल्दी, मंडप और मातृका पूजन: दोनों घरों में हल्दी लगती है, मंडप गड़ता है और कुलदेवी व पितरों का आह्वान होता है।
- बारात और द्वारचार: वर घोड़ी पर आता है, कन्या पक्ष द्वार पर स्वागत करता है। राजस्थान में वर तोरण मारता है।
- जयमाला: आधुनिक शादियों में यह मंच पर होती है, पर पुरानी रीति में भी वरमाला का स्थान है।
- कन्यादान: पिता कन्या का हाथ वर के हाथ में देते हैं।
- पाणिग्रहण: वर कन्या का हाथ थामकर जीवन भर साथ निभाने का वचन देता है।
- गठबंधन: वर के दुपट्टे और कन्या की चुनरी में गाँठ बाँधी जाती है, जिसमें सिक्का, अक्षत, हल्दी, दूर्वा रखते हैं।
- लाजा होम: कन्या का भाई उसकी अंजुली में लावा (धान की खील) देता है, जिसकी अग्नि में आहुति दी जाती है।
- अग्नि के फेरे और सप्तपदी।
- सात वचन और वामांग में आसन।
- सिंदूरदान और मंगलसूत्र।
- ध्रुव दर्शन, आशीर्वाद और विदाई।
सप्तपदी: सात कदम
गृह्यसूत्रों में सप्तपदी को विवाह का केंद्र माना गया है। वर कन्या के साथ उत्तर दिशा में सात कदम चलता है, और हर कदम पर एक कामना बोली जाती है। आज भी हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 7 में कहा गया है कि जहाँ सप्तपदी की रीति है, वहाँ सातवाँ कदम पूरा होते ही विवाह पूर्ण माना जाता है।
- पहला कदम: अन्न के लिए, कि घर में कभी भोजन की कमी न हो।
- दूसरा कदम: बल और ऊर्जा के लिए, शरीर और मन दोनों का।
- तीसरा कदम: धन और समृद्धि के लिए, जो मेहनत और ईमानदारी से आए।
- चौथा कदम: सुख के लिए, जो एक-दूसरे के सम्मान से मिले।
- पाँचवाँ कदम: संतान और पशुधन, यानी परिवार के बढ़ने के लिए।
- छठा कदम: छहों ऋतुओं में, हर मौसम और हर हाल में साथ के लिए।
- सातवाँ कदम: सखा भाव के लिए, कि पति-पत्नी जीवन भर मित्र बने रहें।
कई घरों में सप्तपदी अलग से होती है: ज़मीन पर चावल की सात ढेरियाँ या सात सुपारियाँ रखी जाती हैं, और वधू अपने दाहिने पैर के अँगूठे से उन्हें छूते हुए आगे बढ़ती है। कहीं-कहीं फेरों के साथ ही सप्तपदी पूरी मान ली जाती है।
फेरों में आगे कौन?
उत्तर भारत के कई परिवारों में शुरू के तीन या चार फेरों में वधू आगे चलती है और बाकी फेरों में वर। इसके पीछे मान्यता है कि गृहस्थी की कुछ ज़िम्मेदारियों में पत्नी अगुआई करती है और कुछ में पति। यह क्रम हर बिरादरी में एक-सा नहीं है, इसलिए अपने कुल पुरोहित की रीति ही मानें।
सात वचन और उनका अर्थ
लोक परंपरा में फेरों के बाद कन्या वर से सात वचन माँगती है। ये संस्कृत श्लोकों के रूप में पंडित जी पढ़ते हैं, और हर वचन के आख़िर में कहा जाता है कि "यदि आप यह स्वीकार करें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ।" भाषा जगह-जगह थोड़ी बदलती है, पर भाव यही है:
| वचन | कन्या क्या माँगती है | आज के जीवन में अर्थ |
|---|---|---|
| पहला | तीर्थ, व्रत, यज्ञ, दान में मुझे साथ रखेंगे | धर्म-कर्म और बड़े फ़ैसलों में बराबर की भागीदारी |
| दूसरा | मेरे माता-पिता का अपने माता-पिता जैसा सम्मान करेंगे | दोनों परिवारों का एक-सा आदर |
| तीसरा | जवानी, अधेड़ उम्र और बुढ़ापे, तीनों में साथ देंगे | हर उम्र और हर हाल में साथ |
| चौथा | परिवार की ज़रूरतें पूरी करने का दायित्व उठाएँगे | घर की ज़िम्मेदारी साथ मिलकर |
| पाँचवाँ | घर के काम, लेन-देन और खर्च में मेरी सलाह लेंगे | पैसों के मामलों में पारदर्शिता |
| छठा | सखियों या किसी के सामने मेरा अपमान नहीं करेंगे, जुआ जैसी बुरी आदतों से दूर रहेंगे | सम्मान और मर्यादा |
| सातवाँ | पराई स्त्रियों को माता-बहन समान मानेंगे, हमारे बीच तीसरा नहीं आएगा | निष्ठा और भरोसा |
ध्यान दें कि गृह्यसूत्रों की सप्तपदी में वर कामनाएँ बोलता है, जबकि लोक प्रचलित सात वचन कन्या की ओर से हैं। दोनों परंपराएँ आज साथ-साथ चलती हैं, और यही इस रस्म की ख़ूबसूरती है: दोनों पक्ष एक-दूसरे से कुछ माँगते हैं और कुछ देते हैं।
कन्यादान और पाणिग्रहण
कन्यादान को सबसे पुण्य का दान माना गया है। माता-पिता कन्या का दाहिना हाथ, उस पर कुश, जल, फूल और सिक्का रखकर, वर के हाथ में देते हैं। पंडित जी संकल्प पढ़ते हैं जिसमें दोनों कुलों और गोत्रों के नाम लिए जाते हैं। कई जगह कन्यादान तक माता-पिता व्रत रखते हैं।
पाणिग्रहण में वर कन्या का हाथ थामता है। ऋग्वेद के विवाह सूक्त की भावना है कि वर कहता है: "मैं सौभाग्य के लिए तुम्हारा हाथ थामता हूँ, ताकि हम साथ-साथ वृद्ध हों।"
सिंदूरदान और मंगलसूत्र
फेरों और वचनों के बाद वर कन्या की माँग में सिंदूर भरता है। उत्तर भारत में यह विवाह की सबसे भावुक रस्म है, और बिहार-पूर्वांचल में तो सिंदूरदान को ही विवाह का निर्णायक क्षण माना जाता है। इसके बाद मंगलसूत्र पहनाया जाता है। मंगलसूत्र की परंपरा मूल रूप से दक्षिण और पश्चिम भारत से आई है, पर अब उत्तर भारत में भी आम है। विवाह के बाद के श्रृंगार के बारे में सोलह श्रृंगार पढ़ें।
क्षेत्रीय रीति: मिथिला, राजस्थान, पंजाब
मिथिला (उत्तर बिहार)
मिथिला की शादी कई दिनों चलती है। कोहबर घर की दीवारों पर मधुबनी चित्र बनते हैं, सिंदूरदान रात में होता है और विवाह के चौथे दिन "चतुर्थी" की रस्म होती है। मिथिला सीता जी की भूमि है, इसलिए यहाँ के गीतों में राम-सीता विवाह बार-बार आता है। दिलचस्प बात यह है कि इसी कारण मिथिला में विवाह पंचमी के दिन शादियाँ टाली जाती हैं।
राजस्थान
यहाँ वर द्वार पर लगे तोरण को तलवार या छड़ी से छूता है, फिर अंदर जाता है। फेरे अक्सर देर रात के लग्न में होते हैं, और कई बिरादरियों में चार फेरे वधू आगे और तीन वर आगे लेता है। विदाई से पहले "पहरावनी" में दोनों परिवार कपड़ों का लेन-देन करते हैं।
पंजाब (हिंदू पंजाबी परिवार)
शादी से पहले मामा की ओर से लाल-सफ़ेद चूड़ा पहनाया जाता है और सहेलियाँ कलीरे बाँधती हैं। फेरे सामान्य वैदिक विधि से होते हैं; सिख परंपरा के आनंद कारज में चार लावाँ होती हैं, जो अलग रीति है। पूरे संस्कार-क्रम में विवाह का स्थान समझने के लिए 16 संस्कार देखें।

