महामृत्युंजय मंत्र भगवान शिव का वह मंत्र है जिसे रोग, भय और संकट के समय सबसे ज़्यादा जपा जाता है। यह ऋग्वेद के सातवें मंडल का मंत्र है, जिसमें तीन नेत्रों वाले शिव से प्रार्थना है कि जैसे पका फल बेल से सहज रूप से अलग हो जाता है, वैसे ही हम मृत्यु के बंधन से मुक्त हों और अमृत से दूर न हों। नीचे मंत्र, उसका शब्द-दर-शब्द अर्थ, घर पर जाप का तरीका और नियम दिए गए हैं।
मूल मंत्र और उसका स्रोत
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
यह मंत्र ऋग्वेद के मंडल 7, सूक्त 59 का बारहवाँ मंत्र (7.59.12) है, जिसके ऋषि वसिष्ठ माने जाते हैं। यही मंत्र शुक्ल यजुर्वेद (वाजसनेयी संहिता 3.60) में भी आता है। वेद में मंत्र "त्र्यम्बकं" से शुरू होता है; जप करते समय आगे "ॐ" लगाने की परंपरा है। इसे "त्र्यम्बक मंत्र", "रुद्र मंत्र" और "मृत संजीवनी मंत्र" भी कहा जाता है। पुराणों में कथा आती है कि मार्कण्डेय ऋषि ने इसी मंत्र और शिव भक्ति से यमराज के पाश से रक्षा पाई थी, इसलिए शिव को "मृत्युंजय", यानी मृत्यु को जीतने वाला कहा गया।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| त्र्यम्बकम् | तीन नेत्रों वाले (शिव), जिनके नेत्र सूर्य, चंद्र और अग्नि माने जाते हैं |
| यजामहे | हम पूजा करते हैं, उपासना करते हैं |
| सुगन्धिम् | सुगंध से भरे, जिनकी कीर्ति हर ओर फैली है |
| पुष्टिवर्धनम् | पोषण और शक्ति बढ़ाने वाले, जो सबका पालन करते हैं |
| उर्वारुकम् इव | ककड़ी या खरबूजे की तरह |
| बन्धनात् | बंधन से (यहाँ बेल के डंठल से) |
| मृत्योः मुक्षीय | मृत्यु से मुक्त हो जाऊँ |
| मा अमृतात् | अमृत (अमरता, मोक्ष) से नहीं |
पूरा भाव यह है: "हम तीन नेत्रों वाले, सुगंधित और पोषण देने वाले भगवान शिव की उपासना करते हैं। जैसे पका हुआ खरबूजा बिना किसी खिंचाव के अपनी बेल से अलग हो जाता है, वैसे ही हे प्रभु, हमें मृत्यु के बंधन से छुड़ाइए, पर अमृत से अलग मत कीजिए।" यह मंत्र मौत को टालने की नहीं, बल्कि मोह और भय के बंधन से सहज रूप से छूटने की प्रार्थना है।
जाप विधि: समय, आसन, रुद्राक्ष माला
- समय: सुबह स्नान के बाद, ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय के आसपास सबसे अच्छा माना जाता है। प्रदोष काल (सूर्यास्त के आसपास) में भी जप किया जाता है।
- स्थान और दिशा: घर के मंदिर में या शिवलिंग के सामने, पूर्व या उत्तर की ओर मुँह करके बैठें।
- आसन: कुश, ऊन या साफ़ कपड़े का आसन बिछाएँ; सीधे ज़मीन पर न बैठें।
- पूजा: शिवलिंग या शिव की तस्वीर पर जल, बेलपत्र, सफ़ेद फूल और अक्षत चढ़ाएँ, घी का दीया जलाएँ।
- संकल्प: हाथ में जल लेकर अपना नाम, गोत्र और जिस उद्देश्य से जाप कर रहे हैं (किसी की सेहत, घर की शांति) मन में बोलें, और तय करें कि रोज़ कितनी माला करेंगे।
- माला: रुद्राक्ष की 108 मनकों की माला लें। जप दाहिने हाथ से करें, माला को मध्यमा उँगली पर रखकर अँगूठे से मनके आगे बढ़ाएँ; तर्जनी से माला न छुएँ। सुमेरु (बड़े मनके) को लाँघें नहीं, वहाँ पहुँचकर माला पलट लें।
- उच्चारण: धीमे स्वर में या होंठ हिलाकर (उपांशु) जप करें। हर शब्द साफ़ हो, जल्दबाज़ी न हो।
- समापन: जप पूरा होने पर हाथ जोड़कर शिव से भूल-चूक की क्षमा माँगें और ॐ जय शिव ओंकारा आरती या शिव चालीसा का पाठ करें।
रोज़ एक माला (108 बार) से शुरुआत करना सबसे व्यावहारिक है। किसी विशेष संकल्प के लिए 11, 21 या 51 माला, और बड़े अनुष्ठान में सवा लाख जप किए जाते हैं; सवा लाख का अनुष्ठान आम तौर पर कई दिनों में, पंडितों की मदद से होता है।
लघु मंत्र और संपुटित रूप
जो लोग पूरा मंत्र शुद्ध नहीं बोल पाते या चलते-फिरते स्मरण करना चाहते हैं, उनके लिए लघु मृत्युंजय मंत्र है:
ॐ जूं सः
कई परंपराओं में इसका रूप "ॐ हौं जूं सः" भी चलता है। विशेष अनुष्ठान में मंत्र को बीज मंत्रों और गायत्री की व्याहृतियों से आगे-पीछे घेरकर (संपुटित करके) जपा जाता है:
ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्। ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ॥
संपुटित मंत्र का अनुष्ठान किसी जानकार गुरु या पंडित के मार्गदर्शन में ही करें। रोज़ के जप के लिए मूल मंत्र ही पर्याप्त और सबसे सरल है।
कब जपते हैं: रोग, संकट, सावन
- बीमारी या ऑपरेशन के समय: परिवार के लोग रोगी के लिए संकल्प लेकर जप करते हैं। ध्यान रहे, यह इलाज की जगह नहीं है; डॉक्टर का इलाज साथ-साथ चलता रहे। मंत्र मन को धीरज और भरोसा देता है।
- भय, दुर्घटना या संकट के बाद: मन की शांति के लिए।
- सावन का महीना और सोमवार: शिव उपासना का सबसे लोकप्रिय समय।
- प्रदोष व्रत: त्रयोदशी की शाम, देखें प्रदोष व्रत की तिथियाँ।
- मासिक शिवरात्रि और महाशिवरात्रि: रात भर के जागरण में; तिथियाँ मासिक शिवरात्रि और महाशिवरात्रि पृष्ठ पर।
- जन्मदिन पर: कई परिवारों में लंबी आयु की कामना से इस दिन 108 बार जप की परंपरा है।
जाप के नियम
- जप के दिनों में सात्विक भोजन करें; मांस, मदिरा और नशे से दूर रहें।
- संकल्प की संख्या रोज़ पूरी करें; एक दिन ज़्यादा, दूसरे दिन कम न करें।
- हो सके तो रोज़ एक ही समय और एक ही जगह बैठकर जप करें।
- माला को गोमुखी (माला की थैली) में रखें, ज़मीन पर न रखें और किसी और को अपनी जप माला न दें।
- उच्चारण सीखने के लिए किसी जानकार से एक बार सुन लें; "त्र्यम्बकं" और "मुक्षीय" जैसे शब्द अक्सर ग़लत बोले जाते हैं।
- महिलाएँ भी यह मंत्र जप सकती हैं; मासिक धर्म के दिनों में बहुत से परिवार माला से जप रोककर मन में स्मरण करते हैं, यह घर की परंपरा पर निर्भर है।
- जप को डर से नहीं, श्रद्धा से जोड़ें। मंत्र का भाव ही यह है कि भय छूटे।

