छठ पूजा सूर्य देव और छठी मइया की आराधना का चार दिन का व्रत है, जो कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को नहाय-खाय से शुरू होकर सप्तमी की सुबह उषा अर्घ्य पर पूरा होता है। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई इलाके में यह सबसे बड़ा पर्व है, और अब दिल्ली, मुंबई से लेकर विदेशों तक जहाँ पूर्वांचल के परिवार बसे हैं, वहाँ घाट सजते हैं। नीचे हर दिन क्या होता है, किस क्रम में होता है और व्रती किन बातों का ध्यान रखते हैं, यह घर की भाषा में समझाया गया है।
इस साल छठ की तिथियाँ और सूर्योदय-सूर्यास्त का समय छठ पूजा पृष्ठ पर देखें, क्योंकि अर्घ्य का सही समय आपके शहर के सूर्यास्त और सूर्योदय से तय होता है।
छठ के चार दिन एक नज़र में
| दिन | तिथि | नाम | मुख्य काम |
|---|---|---|---|
| पहला | कार्तिक शुक्ल चतुर्थी | नहाय-खाय | स्नान, घर की सफ़ाई, लौकी-भात और चने की दाल का सात्विक भोजन |
| दूसरा | पंचमी | खरना (लोहंडा) | दिन भर निर्जल उपवास, शाम को गुड़ की खीर और रोटी का प्रसाद |
| तीसरा | षष्ठी | संध्या अर्घ्य | घाट पर डूबते सूर्य को अर्घ्य, रात में कोसी भरना (जहाँ मन्नत हो) |
| चौथा | सप्तमी | उषा अर्घ्य | उगते सूर्य को अर्घ्य, प्रसाद बाँटना और पारण |
सामान की पूरी सूची अलग से छठ पूजा सामग्री लिस्ट में दी गई है, उसे पहले से मिला लें ताकि आख़िरी दिन बाज़ार न भागना पड़े।
नहाय-खाय
नहाय-खाय का मतलब ही है "नहाकर खाना"। इस दिन घर की पूरी सफ़ाई होती है, रसोई धोई जाती है और कई घरों में छठ का खाना बनाने के लिए अलग चूल्हा या नया मिट्टी का चूल्हा रखा जाता है। व्रती नदी, तालाब या घर पर स्नान करके नए या धुले कपड़े पहनते हैं।
भोजन में अरवा चावल का भात, चने की दाल और लौकी (कद्दू) की सब्ज़ी बनती है, इसीलिए कई जगह इस दिन को "कद्दू-भात" भी कहते हैं। प्याज़-लहसुन बिल्कुल नहीं डलता और ज़्यादातर घरों में सेंधा नमक या साफ़ नमक अलग से रखा जाता है। पहले व्रती खाते हैं, फिर घर के बाकी लोग वही प्रसाद के रूप में खाते हैं।
खरना: गुड़ की खीर और रोटी
पंचमी को व्रती सुबह से निर्जल रहते हैं। शाम को सूर्यास्त के बाद मिट्टी के चूल्हे पर आम की लकड़ी जलाकर गुड़ और अरवा चावल की खीर (रसियाव) बनती है, साथ में घी लगी गेहूँ की रोटी या पूड़ी। केले के पत्ते पर यह प्रसाद छठी मइया को भोग लगाकर व्रती अकेले, शांत कमरे में ग्रहण करते हैं। उस समय घर में शोर नहीं किया जाता, क्योंकि मान्यता है कि खाते समय कोई आवाज़ सुनाई दे तो व्रती वहीं खाना छोड़ देते हैं।
इसके बाद यही खीर-रोटी परिवार, पड़ोसियों और रिश्तेदारों में बँटती है। खरना का प्रसाद ग्रहण करने के साथ ही व्रती का लगभग 36 घंटे का निर्जल व्रत शुरू हो जाता है, जो सप्तमी की सुबह अर्घ्य के बाद टूटता है।
संध्या अर्घ्य: घाट, सूप और दउरा
षष्ठी का दिन सबसे व्यस्त होता है। सुबह से घर में ठेकुआ, चावल के लड्डू (कसार) और बाकी प्रसाद बनता है। ठेकुआ बनाने का तरीका छठ का ठेकुआ और प्रसाद वाले लेख में विस्तार से है।
- दोपहर बाद बाँस के सूप और दउरा में फल, ठेकुआ, ईख, नारियल, डाभ नींबू, सुथनी, सिंघाड़ा, हल्दी-अदरक का पौधा सजाया जाता है।
- घर के पुरुष या बेटे दउरा सिर पर रखकर घाट की ओर चलते हैं। रास्ते में छठ के गीत गाए जाते हैं, कई व्रती दंडवत करते हुए घाट तक जाते हैं।
- घाट पर पहले से बनाई गई वेदी (सुपली रखने की जगह) पर सूप रखे जाते हैं, दीया जलाया जाता है।
- व्रती पानी में कमर तक खड़े होकर सूर्य की ओर मुँह करते हैं। सूर्यास्त के समय सूप हाथ में लेकर डूबते सूर्य को दूध और जल से अर्घ्य दिया जाता है। परिवार के लोग लोटे से सूप पर दूध या जल की धार डालते हैं।
- हर सूप से अलग-अलग अर्घ्य होता है, फिर व्रती पानी में ही परिक्रमा करके बाहर आते हैं।
- जिन परिवारों ने मन्नत मानी हो, वहाँ रात में आँगन या घाट पर गन्ने के पाँच या सात डंठलों का घेरा बनाकर बीच में मिट्टी के हाथी और दीये रखकर "कोसी भरी" जाती है।
डूबते सूर्य को अर्घ्य देना छठ की सबसे अलग बात है। लोक मान्यता में संध्या अर्घ्य सूर्य की पत्नी प्रत्यूषा को और सुबह का अर्घ्य उषा को माना जाता है, यानी दिन का अंत और शुरुआत, दोनों का सम्मान।
उषा अर्घ्य और पारण
सप्तमी को भोर से पहले, लगभग तीन-चार बजे, परिवार फिर घाट पहुँचता है। नए सूप सजाए जाते हैं और व्रती पानी में खड़े होकर सूर्य उगने का इंतज़ार करते हैं। सूर्य की पहली लालिमा दिखते ही अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद घाट पर ही छठी मइया की पूजा, कथा और आशीर्वाद का क्रम चलता है। राजा प्रियव्रत और षष्ठी देवी की कथा आप छठ पूजा व्रत कथा पर पढ़ सकते हैं।
पारण के लिए व्रती पहले थोड़ा जल, फिर अदरक, गुड़ या प्रसाद का ठेकुआ लेते हैं। घर लौटकर बड़े-बुज़ुर्गों के पैर छूए जाते हैं और प्रसाद पड़ोस में बाँटा जाता है। प्रसाद माँगकर खाना छठ में अच्छा माना जाता है, इसलिए घाट पर लोग हाथ फैलाकर ठेकुआ लेते दिखते हैं।
व्रती के नियम
- चारों दिन घर में प्याज़, लहसुन, मांस-मदिरा नहीं आते। पूरा परिवार सात्विक भोजन करता है।
- प्रसाद बनाने वाले हाथ धोकर, साफ़ कपड़े पहनकर ही रसोई में जाते हैं। प्रसाद चखा नहीं जाता।
- व्रती ज़मीन पर चटाई या कंबल बिछाकर सोते हैं, कई लोग इन दिनों पलंग का उपयोग नहीं करते।
- महिलाएँ बिना सिली साड़ी (अक्सर पीली या केसरिया) और पुरुष धोती पहनते हैं। नाक से माँग तक लंबा नारंगी सिंदूर छठ की पहचान है।
- फल और सामान पूरे और साफ़ हों, कटे-सड़े या चखे हुए नहीं।
- जो व्रती बीमार हैं, बहुत बुज़ुर्ग हैं या गर्भवती हैं, वे डॉक्टर से बात करके ही निर्जल व्रत रखें। परंपरा में परिवार का कोई और सदस्य भी उनकी ओर से व्रत संभाल सकता है।
घर की छत या आँगन में छठ
महानगरों में घाट दूर हों या भीड़ बहुत हो, तो अब बहुत से परिवार छत या आँगन में छोटा कुंड बनाकर छठ करते हैं। इसके लिए ईंटों से घेरकर प्लास्टिक शीट बिछा दें या बड़ा टब रखें, उसमें इतना पानी भरें कि व्रती घुटनों तक खड़े हो सकें। गंगाजल की कुछ बूँदें मिला दें। कुंड के किनारे वेदी बनाकर सूप रखें और पूर्व-पश्चिम दिशा का ध्यान रखें, ताकि संध्या अर्घ्य पश्चिम की ओर और उषा अर्घ्य पूर्व की ओर मुँह करके दिया जा सके।
सोसायटी में सामूहिक छठ हो तो पहले से अपनी जगह तय कर लें। सूर्यास्त और सूर्योदय का सही समय आज का पंचांग में अपने शहर के हिसाब से देख लें, क्योंकि दिल्ली और पटना के समय में आधे घंटे तक का अंतर आ जाता है।
छठ अनुशासन का पर्व है, दिखावे का नहीं। चार दिन की साफ़-सफ़ाई, सादा भोजन, सामूहिक गीत और ठंडे पानी में खड़े होकर सूर्य को धन्यवाद, यही इसकी आत्मा है। घर के बच्चे इस बार साथ बैठकर हर दिन का काम सीखें, तो अगली पीढ़ी तक यह परंपरा अपने आप पहुँचेगी।

