मकर संक्रांति: क्या दान करें, खिचड़ी और तिल का महत्व

मकर संक्रांति पर स्नान और सूर्य अर्घ्य के बाद काले तिल, गुड़, कच्ची खिचड़ी, कंबल, घी और अन्न का दान किया जाता है। इसी दिन सूर्य मकर राशि में आता है, खरमास खत्म होता है और यूपी-बिहार में इसे खिचड़ी पर्व के रूप में मनाया जाता है।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखन: · वेद पण्डित, लेखकअद्यतन · 5 मिनट का पाठ
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मकर संक्रांति पर तिल, गुड़, खिचड़ी (चावल-उड़द की दाल), कंबल, घी और अन्न का दान सबसे शुभ माना जाता है। इस दिन सूर्य धनु से मकर राशि में आता है, खरमास खत्म होता है और उत्तरायण का पर्व मनाया जाता है। सुबह पवित्र नदी में स्नान, सूर्य को अर्घ्य, फिर दान और उसके बाद खिचड़ी का भोजन — उत्तर भारत में यही इस दिन का क्रम है।

सूर्य का मकर में प्रवेश और उत्तरायण

सूर्य जिस पल मकर राशि में प्रवेश करता है, वही मकर संक्रांति है। ज़्यादातर सालों में यह 14 जनवरी को पड़ती है, पर संक्रांति का समय शाम या रात में हो तो पुण्य काल अगले दिन माना जाता है। नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार 2026 में यह 14 जनवरी को थी और 2027 में 15 जनवरी को है। हर साल का पुण्य काल और महापुण्य काल मकर संक्रांति पृष्ठ पर देखें।

इसी दिन से उत्तरायण का पर्व मनाया जाता है, यानी सूर्य का उत्तर दिशा की ओर चलना। महाभारत में भीष्म पितामह ने बाणों की शय्या पर उत्तरायण की प्रतीक्षा करके ही प्राण त्यागे थे, इसलिए इस काल को देवताओं का दिन कहा गया। एक बात जानने लायक है: खगोल के हिसाब से सूर्य की उत्तर की ओर यात्रा 21-22 दिसंबर के आसपास ही शुरू हो जाती है। हज़ारों साल में पृथ्वी की धुरी के धीमे खिसकने से मकर संक्रांति और वह दिन अलग हो गए हैं, पर परंपरा में उत्तरायण का उत्सव सूर्य के मकर प्रवेश पर ही मनाया जाता है। संक्रांति और उत्तरायण-दक्षिणायन का पूरा हिसाब संक्रांति क्या है में पढ़ें।

लोक-मान्यता यह भी है कि इस दिन सूर्यदेव अपने पुत्र शनिदेव के घर जाते हैं, क्योंकि मकर राशि के स्वामी शनि हैं। पिता-पुत्र के बीच की पुरानी नाराज़गी इस दिन मिट जाती है और शनि काले तिल से पिता का स्वागत करते हैं। इसी कारण इस दिन तिल का इतना महत्व है।

स्नान: प्रयाग, हरिद्वार, गंगासागर

संक्रांति के दिन सूर्योदय के बाद पुण्य काल में नदी स्नान की परंपरा है। तीन जगहें सबसे प्रसिद्ध हैं:

  • प्रयागराज संगम: पौष पूर्णिमा से माघ मेला शुरू होता है और मकर संक्रांति उसका एक प्रमुख स्नान है। कल्पवासी पूरे माघ संगम तट पर रहते हैं।
  • हरिद्वार: हर की पौड़ी पर पूरे दिन स्नान चलता है, ज़्यादातर पश्चिमी यूपी, हरियाणा और दिल्ली के श्रद्धालु यहाँ आते हैं।
  • गंगासागर: बंगाल में जहाँ गंगा समुद्र से मिलती है, वहाँ कपिल मुनि के आश्रम के पास संक्रांति का बड़ा मेला लगता है। कहावत है: "सारे तीरथ बार-बार, गंगासागर एक बार"।

मेलों की व्यवस्था, स्नान की पारी और रास्ते हर साल बदलते हैं, इसलिए जाने से पहले मेला प्रशासन की ताज़ा सूचना ज़रूर देख लें। जो लोग नदी तक नहीं जा सकते, वे नहाने के पानी में थोड़ा गंगाजल और काले तिल डालकर घर पर ही स्नान करें, फिर सूर्य को जल चढ़ाएँ।

मकर संक्रांति पर क्या दान करें

दान हमेशा स्नान और सूर्य अर्घ्य के बाद किया जाता है। ठंड का मौसम है, इसलिए वही चीज़ें दी जाती हैं जो इस समय काम आएँ:

दान की वस्तुक्योंकिसे दें
काले तिल और तिल के लड्डूतिल को सूर्य और शनि दोनों से जोड़ा जाता हैपुरोहित, मंदिर, ज़रूरतमंद
गुड़मिठास और गर्माहट का प्रतीकबच्चों और बुज़ुर्गों को
कच्ची खिचड़ी (चावल, उड़द दाल, नमक)पूर्वांचल-बिहार की मुख्य परंपरापुरोहित, भिक्षु, मंदिर
कंबल और गर्म कपड़ेसर्दी में सबसे काम का दानफुटपाथ पर रहने वाले, मज़दूर परिवार
घीशुद्धता और पोषणमंदिर या पुरोहित
नए बर्तन, अन्नघर की समृद्धि की कामनानई गृहस्थी वाले ज़रूरतमंद

दान अपनी हैसियत के हिसाब से करें। एक मुट्ठी तिल और एक कटोरी खिचड़ी भी श्रद्धा से दी जाए तो पूरा दान है। राजस्थान में कई सुहागिनें इस दिन चौदह की गिनती में सुहाग का सामान या मिठाई बाँटती हैं, और कई घरों में बहू अपनी सास को कपड़े देकर पैर छूती है।

यूपी-बिहार की खिचड़ी और दही-चूड़ा

पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में यह त्योहार इतना खिचड़ी से जुड़ा है कि लोग इसे सीधे "खिचड़ी" ही कहते हैं: "खिचड़ी कब है?" सुबह स्नान के बाद पहले कच्ची खिचड़ी छूकर दान के लिए अलग रखी जाती है, फिर दिन में दही-चूड़ा, गुड़ और तिलकुट खाया जाता है। रात में उड़द दाल और चावल की खिचड़ी बनती है। एक पुरानी कहावत हर घर में सुनाई देती है: "खिचड़ी के चार यार — दही, पापड़, घी, अचार"।

बिहार के गया का तिलकुट इस मौसम में खास तौर पर मशहूर है। मिथिला में इस दिन को तिला संक्रांति भी कहते हैं, और कई घरों में माँ बच्चों को तिल-चावल खिलाकर उनसे वचन लेती है कि वे जीवन भर माता-पिता का साथ निभाएँगे।

पतंग और तिल-गुड़

राजस्थान (खास तौर पर जयपुर) और गुजरात में मकर संक्रांति का मतलब है छतों पर पतंगबाज़ी। सुबह से "वो काटा" की आवाज़ें आने लगती हैं। पंजाब और हरियाणा में ठीक पहले की रात लोहड़ी जलती है, और अगले दिन माघी मनाई जाती है। महाराष्ट्र में "तिळगुळ घ्या, गोड गोड बोला" कहकर तिल-गुड़ बाँटा जाता है।

पतंग उड़ाते समय चीनी या काँच वाले माँझे का इस्तेमाल न करें; इससे हर साल पक्षी और राहगीर घायल होते हैं। सूती धागे वाला माँझा ही लें।

गोरखपुर का खिचड़ी मेला

गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर में मकर संक्रांति पर बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा सदियों पुरानी है। पूर्वांचल, बिहार और नेपाल से लोग चावल-दाल की पोटली लेकर आते हैं और भोर से ही कतारें लग जाती हैं। मंदिर परिसर के आसपास लगभग एक महीने तक खिचड़ी मेला चलता है, जिसमें झूले, खिलौने और देहात की दुकानें सजती हैं। मेले और दर्शन की व्यवस्था का समय मंदिर प्रशासन हर साल अलग से बताता है।

मकर संक्रांति के साथ ही खरमास खत्म होता है और विवाह के मुहूर्त फिर शुरू होते हैं। इसके कुछ दिन बाद माघ की मौनी अमावस्या का स्नान आता है, जो माघ मेले का सबसे बड़ा दिन माना जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मकर संक्रांति 2027 में कब है?

नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार मकर संक्रांति 2027 में 15 जनवरी, शुक्रवार को है। पुण्य काल का समय त्योहार पृष्ठ पर देखें।

मकर संक्रांति पर खिचड़ी क्यों खाते हैं?

चावल और उड़द दाल की खिचड़ी नए अन्न और सर्दी के मौसम से जुड़ी है। पूर्वांचल और बिहार में इसे दान करना और खाना इस पर्व की मुख्य परंपरा है, इसलिए त्योहार को ही खिचड़ी कहते हैं।

मकर संक्रांति पर तिल का दान क्यों करते हैं?

लोक-मान्यता है कि सूर्य इस दिन अपने पुत्र शनि के घर जाते हैं और शनि तिल से उनका स्वागत करते हैं। तिल को सूर्य और शनि दोनों की प्रसन्नता से जोड़ा जाता है।

घर पर मकर संक्रांति का स्नान कैसे करें?

नहाने के पानी में थोड़ा गंगाजल और काले तिल डालकर स्नान करें, फिर ताँबे के लोटे से सूर्य को अर्घ्य दें और उसके बाद दान करें।

मकर संक्रांति पर दान कब करना चाहिए?

दान स्नान और सूर्य अर्घ्य के बाद पुण्य काल में करना सबसे अच्छा माना जाता है, जो आम तौर पर संक्रांति वाले दिन सुबह से दोपहर तक रहता है।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखक के बारे में

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा

वेद पण्डित, लेखक

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा जी वेद पण्डित और लेखक हैं। अनेक वर्षों से वे दुर्गा देवी की आराधना का अध्ययन और आचरण करते आ रहे हैं। पूजा विधि, मंत्रों और स्तोत्रों को सामान्य भक्तों के लिए सरलता से समझाना उनका लक्ष्य है। वे “श्री दुर्गा नित्याराधना” ग्रंथ के लेखक हैं। इस साइट के लेख उनकी रचनाएँ हैं, या उनके ग्रंथों पर आधारित हैं।

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