लोहड़ी मकर संक्रांति से पहली रात मनाया जाने वाला पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल और जम्मू का प्रमुख त्योहार है। आम तौर पर यह 13 जनवरी की शाम को पड़ता है, और जिस साल संक्रांति 15 जनवरी को हो, उस साल 14 जनवरी को। शाम को आँगन या गली में लकड़ियों और उपलों का अलाव जलाया जाता है, परिवार उसकी परिक्रमा करके अग्नि में तिल, गुड़, रेवड़ी, मूँगफली और मक्के के फुल्ले डालता है, और ढोल पर दुल्ला भट्टी के गीत गाए जाते हैं।
कब: मकर संक्रांति से पहली रात
पंजाबी सौर कैलेंडर में लोहड़ी पोह (पौष) महीने की आख़िरी रात है। अगले दिन माघ का पहला दिन होता है, जिसे पंजाब में माघी कहते हैं और बाकी उत्तर भारत में मकर संक्रांति। इसका मतलब है कि लोहड़ी की तारीख़ चाँद से नहीं, सूर्य के मकर राशि में जाने से तय होती है, इसलिए यह हर साल लगभग एक ही अंग्रेज़ी तारीख़ पर आती है। सूर्य के राशि बदलने का पूरा गणित संक्रांति क्या है में समझाया गया है।
किसानों के लिए यह रबी की फ़सल, खासकर गेहूँ और सरसों के लहलहाने और गन्ने की कटाई का समय है। सबसे ठंडी रातें इसी के आसपास होती हैं, और लोहड़ी की आग को सर्दी विदा होने का संकेत माना जाता है। नाम की उत्पत्ति पर कई लोक मत हैं: कोई इसे "तिल" और "रोड़ी" (गुड़) से बने "तिलोड़ी" का बदला रूप मानता है, कोई "लोह" यानी आग और तपिश से जोड़ता है।
अग्नि पूजा और परिक्रमा
लोहड़ी की असल पूजा अग्नि की है। इसमें पंडित या लंबे विधान की ज़रूरत नहीं, पूरा मोहल्ला या परिवार मिलकर करता है।
- अलाव तैयार करें: दिन में बच्चे घर-घर जाकर लकड़ियाँ और उपले इकट्ठा करते हैं। सूर्यास्त के बाद खुले आँगन, छत या गली में इन्हें सजाकर ढेर बनाया जाता है।
- थाली सजाएं: एक थाली में तिल, गुड़, रेवड़ी, मूँगफली, मक्के के फुल्ले (पॉपकॉर्न), गजक और चिड़वे रखें। कई घरों में थोड़ा कच्चा दूध या पानी भी रखा जाता है।
- अग्नि प्रज्वलित करें: घर का कोई बड़ा, अक्सर दादा या पिता, अलाव जलाता है। सब हाथ जोड़कर अग्नि देव को प्रणाम करते हैं।
- परिक्रमा और आहुति: परिवार के लोग अलाव की परिक्रमा करते हुए मुट्ठी भर तिल-गुड़ और फुल्ले आग में डालते हैं। तिल डालते समय पंजाब में बोला जाता है: "ईशर आए, दलिद्दर जाए", यानी घर में ईश्वर की कृपा आए और गरीबी दूर हो।
- प्रसाद: बची हुई रेवड़ी-मूँगफली सबको बाँटी जाती है, जिसे "लोहड़ी" कहते हैं।
- गीत-संगीत: फिर ढोल बजता है, पुरुष भंगड़ा और महिलाएँ गिद्धा करती हैं, और देर रात तक लोकगीत चलते हैं।
सुरक्षा का ध्यान रखें: अलाव बिजली के तारों, गाड़ियों और सूखी घास से दूर हो, बच्चों के कपड़े ढीले न हों और पास में पानी की बाल्टी रखें। आग को अपने आप बुझने दें या सुबह राख ठंडी होने पर हटाएं।
रेवड़ी, मूँगफली, गजक
लोहड़ी का खाना सर्दी के हिसाब से गरम तासीर वाला होता है:
- तिल और गुड़: रेवड़ी, गजक, तिल के लड्डू और तिलकुट।
- मूँगफली और फुल्ले: भुनी मूँगफली और मक्के के फुल्ले हर थाली में होते हैं।
- सरसों का साग और मक्की की रोटी: रात के खाने में यही खास है, ऊपर से सफ़ेद मक्खन और गुड़।
- रौह दी खीर: गन्ने के रस में चावल पकाकर बनाई गई खीर। पंजाब में इसे लोहड़ी की रात पकाकर माघी की सुबह ठंडा खाया जाता है। कहावत है "पोह रिद्धी, माघ खाधी", यानी पोह में पकी, माघ में खाई।
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दुल्ला भट्टी की कहानी
लोहड़ी के गीतों का नायक दुल्ला भट्टी है। लोक कथाओं के अनुसार राय अब्दुल्ला भट्टी, जिसे सब दुल्ला कहते थे, अकबर के समय पंजाब के पिंडी भट्टियाँ इलाके का एक विद्रोही था। मुग़ल अधिकारियों और ज़मींदारों के लिए वह डाकू था, पर गाँव वालों के लिए रॉबिनहुड जैसा रखवाला। वह अमीरों से लूटकर गरीबों में बाँटता था।
कहानी है कि एक गरीब ब्राह्मण की दो बेटियाँ थीं, सुंदरी और मुंदरी। उनकी सगाई हो चुकी थी, लेकिन इलाके का एक ताक़तवर अधिकारी उन्हें ज़बरदस्ती उठा ले जाना चाहता था। डरा हुआ पिता दुल्ला के पास गया। दुल्ला ने लड़कियों को छुड़ाया, लड़कों के परिवार को रातों-रात शादी के लिए राज़ी किया, और जंगल में आग जलाकर उसके फेरे करवा दिए। लड़कियों का पिता बनकर उसने कन्यादान किया, और देने को कुछ न था तो शगुन में एक सेर शक्कर उनकी झोली में डाल दी।
इसी घटना की याद में आज भी बच्चे और औरतें गाते हैं:
सुंदर मुंदरिये हो, तेरा कौन विचारा हो,
दुल्ला भट्टी वाला हो, दुल्ले दी धी व्याही हो,
सेर शक्कर पाई हो...
यानी सुंदरी-मुंदरी का कौन सहारा? दुल्ला भट्टी वाला, जिसने अपनी बेटी मानकर ब्याह किया और सेर भर शक्कर दी। यह कहानी इतिहास और लोककथा का मेल है, और इसीलिए लोहड़ी को बेटियों की रक्षा और सम्मान से भी जोड़ा जाता है।
नई बहू और बच्चे की पहली लोहड़ी
जिस घर में साल भर के अंदर शादी हुई हो या बच्चा जन्मा हो, वहाँ लोहड़ी किसी उत्सव से कम नहीं होती।
- पहली लोहड़ी (बहू की): नई बहू को नए कपड़े और गहने पहनाए जाते हैं, उसके मायके से "लोहड़ी" यानी कपड़े, मिठाई, रेवड़ी-गजक और शगुन आता है। बहू और दूल्हा मिलकर अग्नि में पहली आहुति डालते हैं।
- बच्चे की पहली लोहड़ी: माँ बच्चे को गोद में लेकर परिक्रमा करती है, रिश्तेदार शगुन देते हैं और मोहल्ले में रेवड़ी-मूँगफली बाँटी जाती है।
- धीयाँ दी लोहड़ी: पहले यह उत्सव मुख्य रूप से बेटे के जन्म पर होता था। पिछले कुछ वर्षों में पंजाब और हरियाणा में बेटी की पहली लोहड़ी भी उतनी ही धूम से मनाने का चलन बढ़ा है, और यह स्वागत योग्य बदलाव है।
पंजाब, हरियाणा, दिल्ली में
पंजाब
गाँवों में बच्चे टोलियाँ बनाकर घर-घर "लोहड़ी" माँगने जाते हैं और "सुंदर मुंदरिये" गाते हैं। जो घर कंजूसी करे, उसके लिए मज़ाकिया ताने वाले गीत भी तैयार रहते हैं। अगले दिन माघी पर गुरुद्वारों और तीर्थों में स्नान होता है।
हरियाणा और दिल्ली
हरियाणा में भी लोहड़ी पर अलाव, रेवड़ी और नई बहू-बच्चे के लिए शगुन की परंपरा है। दिल्ली में यह त्योहार विभाजन के बाद बसे पंजाबी परिवारों के साथ फैला और आज राजौरी गार्डन, लाजपत नगर जैसी कॉलोनियों से लेकर सोसाइटियों के सामूहिक आयोजनों तक हर जगह दिखता है।
हिमाचल और जम्मू
हिमाचल के निचले इलाकों में लोहड़ी और अगले दिन माघी साजा मनाई जाती है। जम्मू में बच्चे बाँस और कागज़ से मोर जैसा "छज्जा" बनाकर नाचते हुए घर-घर जाते हैं, जो वहाँ की लोहड़ी की खास पहचान है।
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