संक्रांति क्या है; उत्तरायण और दक्षिणायन

संक्रांति वह क्षण है जब सूर्य एक राशि से अगली राशि में प्रवेश करता है; साल में 12 संक्रांतियाँ होती हैं। मकर संक्रांति से उत्तरायण और कर्क संक्रांति से दक्षिणायन शुरू होता है, और संक्रांति के पुण्य काल में स्नान-दान का विशेष महत्व है।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखन: · वेद पण्डित, लेखकअद्यतन · 6 मिनट का पाठ
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संक्रांति वह क्षण है जब सूर्य एक राशि से निकलकर अगली राशि में प्रवेश करता है। सूर्य हर महीने लगभग एक बार राशि बदलता है, इसलिए साल में 12 संक्रांतियाँ होती हैं। इनमें मकर संक्रांति से सूर्य का उत्तरायण और कर्क संक्रांति से दक्षिणायन शुरू होना माना जाता है, और संक्रांति के आसपास के पुण्य काल में स्नान, दान और जप का विशेष फल बताया गया है।

संक्रांति: सूर्य का राशि बदलना

पृथ्वी से देखने पर सूर्य आकाश में तारों के बीच एक तय रास्ते पर चलता दिखता है, जिसे क्रांतिवृत्त कहते हैं। इस रास्ते को 30-30 अंश के 12 हिस्सों में बाँटा गया है, यही 12 राशियाँ हैं। सूर्य को एक राशि पार करने में करीब 30 दिन लगते हैं। जिस पल वह अगली राशि की सीमा पार करता है, उसे उस राशि की संक्रांति कहते हैं, जैसे मकर में प्रवेश "मकर संक्रांति"।

हिंदू कैलेंडर में दो तरह के महीने चलते हैं: चाँद पर आधारित चांद्र मास (चैत्र, वैशाख...) और सूर्य पर आधारित सौर मास, जो एक संक्रांति से अगली संक्रांति तक चलता है। उत्तर भारत में व्रत-त्योहार ज़्यादातर चांद्र तिथियों से चलते हैं, जबकि पंजाब, हिमाचल, बंगाल, ओडिशा, असम, तमिलनाडु और केरल में सौर मास भी रोज़मर्रा में प्रयोग होते हैं। यही कारण है कि मकर संक्रांति, बैसाखी और लोहड़ी जैसी तिथियाँ अंग्रेज़ी कैलेंडर में लगभग स्थिर रहती हैं, जबकि होली-दिवाली हर साल खिसकती हैं।

पंचांग में सूर्य के इसी गोचर से एक और बात तय होती है: सूर्य जब तक किसी चांद्र महीने में राशि न बदले, वह महीना अधिक मास बन जाता है। यानी संक्रांति पूरे पंचांग की धुरी है। आज की संक्रांति और सूर्य की राशि आज के पंचांग में देख सकते हैं।

12 संक्रांतियाँ

संक्रांतिसूर्य किस राशि में2026 में (नई दिल्ली)प्रकार
मकर संक्रांतिमकर14 जनवरीअयन (उत्तरायण शुरू)
कुंभ संक्रांतिकुंभ13 फ़रवरीविष्णुपदी
मीन संक्रांतिमीन15 मार्चषडशीतिमुखी
मेष संक्रांतिमेष14 अप्रैलविषुव
वृषभ संक्रांतिवृषभ15 मईविष्णुपदी
मिथुन संक्रांतिमिथुन15 जूनषडशीतिमुखी
कर्क संक्रांतिकर्क16 जुलाईअयन (दक्षिणायन शुरू)
सिंह संक्रांतिसिंह17 अगस्तविष्णुपदी
कन्या संक्रांतिकन्या17 सितंबरषडशीतिमुखी
तुला संक्रांतितुला17 अक्टूबरविषुव
वृश्चिक संक्रांतिवृश्चिक16 नवंबरविष्णुपदी
धनु संक्रांतिधनु16 दिसंबरषडशीतिमुखी

हर महीने की संक्रांति की तिथि और समय मासिक संक्रांति पृष्ठ पर मिलता है। शास्त्रों में संक्रांतियों को चार वर्गों में रखा गया है: दो अयन संक्रांतियाँ (मकर, कर्क), दो विषुव संक्रांतियाँ (मेष, तुला), चार विष्णुपदी (वृषभ, सिंह, वृश्चिक, कुंभ) और चार षडशीतिमुखी (मिथुन, कन्या, धनु, मीन)। अयन और विषुव संक्रांतियाँ सबसे पुण्यदायी मानी जाती हैं।

उत्तरायण और दक्षिणायन

पंचांग की परंपरा में मकर संक्रांति से कर्क संक्रांति तक के छह महीने उत्तरायण और कर्क से मकर तक के छह महीने दक्षिणायन कहलाते हैं। उत्तरायण में सूर्य हर दिन थोड़ा उत्तर की ओर उगता दिखता है और दिन लंबे होते जाते हैं।

  • देवताओं का दिन-रात: शास्त्रों में कहा गया है कि मनुष्यों का एक वर्ष देवताओं का एक दिन-रात है; उत्तरायण देवताओं का दिन और दक्षिणायन उनकी रात।
  • शुभ कार्य: इसी कारण गृह प्रवेश, जनेऊ, देव प्रतिष्ठा जैसे कई शुभ काम उत्तरायण में करना बेहतर माना जाता है।
  • भीष्म पितामह: महाभारत के अनुसार इच्छा-मृत्यु का वरदान पाए भीष्म बाणों की शय्या पर उत्तरायण की प्रतीक्षा करते रहे और माघ शुक्ल अष्टमी को देह त्यागी। गीता के आठवें अध्याय में भी उत्तरायण में देह त्याग की महिमा कही गई है।
  • दक्षिणायन: इसमें चातुर्मास, पितृ पक्ष और नवरात्रि जैसे साधना और व्रत के पर्व आते हैं। इसे अशुभ नहीं, बल्कि तप और भक्ति का समय समझना चाहिए।

खगोल और पंचांग का अंतर

एक बात ईमानदारी से समझनी चाहिए। खगोल विज्ञान में सूर्य की उत्तर की ओर यात्रा 21-22 दिसंबर (शीत अयनांत) से शुरू हो जाती है। लेकिन भारतीय पंचांग निरयन, यानी तारों पर आधारित राशि-गणना से चलते हैं, और पृथ्वी की धुरी के धीमे घूमने (अयन चलन) के कारण दोनों में अब लगभग 23-24 दिन का अंतर आ गया है। करीब डेढ़ हज़ार साल पहले मकर संक्रांति और अयनांत लगभग एक साथ पड़ते थे। इसीलिए धार्मिक कार्यों के लिए उत्तरायण मकर संक्रांति से ही गिना जाता है, जबकि मौसम का बदलाव उससे पहले शुरू हो चुका होता है। कर्क संक्रांति और जून के ग्रीष्म अयनांत के बीच भी यही अंतर है।

पुण्य काल

संक्रांति का ठीक क्षण दिन में कभी भी, रात में भी, आ सकता है। उस क्षण के आसपास के समय को पुण्य काल कहा जाता है, और इसी में स्नान, दान, तर्पण और जप करने का विधान है।

  • पुण्य काल और महापुण्य काल: पंचांग दो समय देते हैं। महापुण्य काल संक्रांति के क्षण के सबसे पास का छोटा हिस्सा है, जिसे सबसे उत्तम माना जाता है।
  • अवधि हर संक्रांति के लिए अलग: धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु जैसे ग्रंथ अलग-अलग संक्रांतियों के लिए क्षण से पहले या बाद की अलग घड़ियाँ बताते हैं।
  • रात की संक्रांति: सूर्यास्त के बाद संक्रांति हो तो सामान्य नियम यह है कि पुण्य काल अगले दिन सुबह माना जाता है। इसीलिए कभी-कभी मकर संक्रांति 14 की जगह 15 जनवरी को मनाई जाती है।
  • क्या करें: नदी या घर पर स्नान, सूर्य को अर्घ्य, तिल-गुड़, अन्न, कंबल का दान और पितरों के लिए तर्पण।

सटीक पुण्य काल के लिए अपने शहर का पंचांग ही देखें, क्योंकि सूर्योदय के समय से यह बदलता है।

प्रमुख संक्रांतियाँ

मकर संक्रांति

सबसे बड़ी संक्रांति। उत्तर प्रदेश-बिहार में खिचड़ी, पंजाब में माघी (उससे पहली रात लोहड़ी), गुजरात में उत्तरायण की पतंगें, असम में भोगाली बिहू और तमिलनाडु में पोंगल। प्रयागराज के माघ मेले का पहला बड़ा स्नान भी इसी दिन होता है। दान की पूरी सूची मकर संक्रांति पर क्या दान करें में है, और तिथि मकर संक्रांति पृष्ठ पर।

मेष संक्रांति

सौर नववर्ष। पंजाब-हरियाणा में बैसाखी, बिहार में सतुआन (सत्तू और आम के टिकोरे का दान), बंगाल में पोइला बोइशाख, ओडिशा में पणा संक्रांति और तमिलनाडु में पुथांडु।

कर्क संक्रांति

दक्षिणायन की शुरुआत। इसके आसपास देवशयनी एकादशी और चातुर्मास शुरू होता है।

धनु और मीन संक्रांति

सूर्य जब धनु या मीन राशि में होता है, वह समय खरमास कहलाता है, और इसमें विवाह, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक काम नहीं होते। विस्तार से खरमास क्या है में पढ़ें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

साल में कितनी संक्रांति होती हैं?

साल में 12 संक्रांतियाँ होती हैं, क्योंकि सूर्य हर महीने लगभग एक बार राशि बदलता है।

उत्तरायण कब से कब तक होता है?

पंचांग के अनुसार उत्तरायण मकर संक्रांति से कर्क संक्रांति तक, यानी जनवरी के मध्य से जुलाई के मध्य तक, रहता है।

मकर संक्रांति कभी 14 और कभी 15 जनवरी को क्यों होती है?

अगर सूर्य का मकर राशि में प्रवेश सूर्यास्त के बाद हो, तो पुण्य काल अगले दिन माना जाता है। इसलिए कुछ वर्षों में संक्रांति 15 जनवरी को मनाई जाती है।

संक्रांति का पुण्य काल क्या है?

संक्रांति के क्षण के आसपास का वह समय जिसमें स्नान, दान और जप का विशेष फल माना जाता है। सटीक समय अपने शहर के पंचांग में देखें।

क्या दक्षिणायन अशुभ होता है?

नहीं, दक्षिणायन को देवताओं की रात कहा गया है, पर इसमें चातुर्मास, पितृ पक्ष और नवरात्रि जैसे तप और व्रत के पर्व आते हैं। कुछ मांगलिक कार्य उत्तरायण में करना बेहतर माना जाता है।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखक के बारे में

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा

वेद पण्डित, लेखक

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा जी वेद पण्डित और लेखक हैं। अनेक वर्षों से वे दुर्गा देवी की आराधना का अध्ययन और आचरण करते आ रहे हैं। पूजा विधि, मंत्रों और स्तोत्रों को सामान्य भक्तों के लिए सरलता से समझाना उनका लक्ष्य है। वे “श्री दुर्गा नित्याराधना” ग्रंथ के लेखक हैं। इस साइट के लेख उनकी रचनाएँ हैं, या उनके ग्रंथों पर आधारित हैं।

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