मौनी अमावस्या माघ महीने की अमावस्या है, जो उत्तर भारत की पूर्णिमांत गणना में माघ कृष्ण पक्ष के आख़िर में आती है और आमतौर पर जनवरी के आख़िर या फ़रवरी में पड़ती है। इस दिन सुबह मौन रहकर गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान, दान और पितरों के लिए तर्पण करने की परंपरा है। प्रयागराज के संगम पर लगने वाले माघ मेले में यह सबसे बड़ा स्नान पर्व माना जाता है।
कब: माघ अमावस्या
2027 में मौनी अमावस्या 6 फ़रवरी (नई दिल्ली पंचांग के अनुसार) को है। हर साल की तिथि, अमावस्या शुरू और समाप्त होने का समय और स्नान का मुहूर्त मौनी अमावस्या पृष्ठ पर देखें। अगर अमावस्या दोपहर बाद शुरू हो रही हो, तो स्नान-दान आमतौर पर अगले दिन सूर्योदय वाली अमावस्या पर होता है; पंचांग में यह स्पष्ट दिया जाता है।
जिन लोगों के घर में अमांत कैलेंडर चलता है (गुजरात, महाराष्ट्र, दक्षिण भारत), उनके यहाँ यही अमावस्या पौष अमावस्या कहलाती है। दिन वही है, सिर्फ़ महीने का नाम अलग है। साल भर की बाकी अमावस्याएँ अमावस्या कैलेंडर में हैं।
मौन क्यों रखते हैं
"मौनी" शब्द मुनि और मौन, दोनों से जुड़ा है। माना जाता है कि मुनि का सबसे बड़ा गुण वाणी पर संयम है, और साल में एक दिन यह अभ्यास पूरे मन से करने का है। लोक-परंपरा में यह भी कहा जाता है कि इसी दिन मनु ऋषि का जन्म हुआ था, इसलिए इसे मौनी या मनु अमावस्या कहते हैं।
मौन रखने के कई स्तर हैं, जो अपनी सामर्थ्य के हिसाब से चुनें:
- स्नान तक मौन: सबसे आम तरीका। सुबह उठने से लेकर स्नान और दान पूरा होने तक कुछ न बोलें, मन में "ॐ नमः शिवाय" या "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जाप करते रहें।
- आधे दिन का मौन: दोपहर तक मौन, फिर सामान्य दिनचर्या।
- पूरे दिन का मौन: सूर्योदय से सूर्यास्त तक या अगले सूर्योदय तक। ज़रूरी बात लिखकर कह सकते हैं।
मौन का अर्थ सिर्फ़ मुँह बंद रखना नहीं, बल्कि कटु बात, शिकायत और फ़ालतू बहस से भी दूर रहना है। फ़ोन और टीवी से दूरी रखेंगे तो मौन का असली अनुभव होगा। बुज़ुर्ग, बीमार या छोटे बच्चों की देखभाल करने वाले लोग ज़रूरत पड़ने पर बोल सकते हैं; व्रत भाव का है, ज़िद का नहीं।
प्रयाग संगम स्नान और माघ मेला
हर साल पौष पूर्णिमा से माघ पूर्णिमा तक प्रयागराज में गंगा, यमुना और (मान्यता में) सरस्वती के संगम पर माघ मेला लगता है। बहुत से परिवार पूरे महीने तंबुओं में रहकर कल्पवास करते हैं: रोज़ स्नान, एक समय सात्विक भोजन, ज़मीन पर सोना और सत्संग। मेले के मुख्य स्नान पर्वों में मकर संक्रांति, मौनी अमावस्या, वसंत पंचमी और माघ पूर्णिमा हैं, और इनमें मौनी अमावस्या पर सबसे ज़्यादा भीड़ होती है। जिस वर्ष कुंभ या अर्धकुंभ होता है, उस साल मौनी अमावस्या का स्नान अमृत स्नान (शाही स्नान) का सबसे बड़ा दिन होता है।
संगम जाने की योजना हो तो ध्यान रखें:
- स्नान घाट, पार्किंग, ट्रेनों और बसों के इंतज़ाम हर साल मेला प्रशासन बदलता है। यात्रा से पहले मेला प्रशासन और रेलवे की आधिकारिक सूचना ज़रूर देखें।
- बुज़ुर्ग और बच्चों के साथ हों तो भीड़ वाले मुख्य घाट की बजाय पास के दूसरे घाट चुनें, और पहचान पत्र व घर का फ़ोन नंबर उनकी जेब में रखें।
- गहरे पानी में न जाएँ; बैरिकेड के भीतर ही डुबकी लगाएँ।
- हरिद्वार, वाराणसी, गढ़मुक्तेश्वर और नासिक जैसे तीर्थों में भी इस दिन बड़ा स्नान होता है।
क्या दान करें
माघ ठंड का महीना है, इसलिए इस दिन का दान भी ठंड से जुड़ा है। जो चीज़ ज़रूरतमंद के सच में काम आए, वही सबसे अच्छा दान है:
| दान | क्यों |
|---|---|
| काले तिल, तिल के लड्डू, गुड़ | माघ में तिल का दान सबसे प्रमुख माना गया है |
| कंबल, ऊनी कपड़े, शॉल | कड़ाके की ठंड में सबसे काम की चीज़ |
| अन्न: आटा, चावल, दाल, खिचड़ी का सामान | अन्नदान को सबसे बड़ा दान कहा गया है |
| घी, दूध | पारंपरिक दान, खासकर ब्राह्मण और गौशाला को |
| जूते-चप्पल, जुराबें | मेले और सड़क पर रहने वालों के लिए उपयोगी |
| गाय को चारा, पक्षियों को दाना | जीव-सेवा भी दान का हिस्सा है |
दान स्नान के बाद, मौन रहते हुए ही करें तो परंपरा पूरी मानी जाती है। दान का दिखावा न करें, और लेने वाले का सम्मान बनाए रखें।
घर पर स्नान-पूजा
हर कोई तीर्थ नहीं जा सकता, और शास्त्र भी मानते हैं कि भाव से किया घर का स्नान भी फलदायी है। घर पर ऐसे करें:
- सुबह जल्दी उठें और उठते ही मौन का संकल्प लें।
- नहाने के पानी में थोड़ा गंगाजल और कुछ काले तिल मिलाएँ। स्नान करते समय मन में गंगा, यमुना, सरस्वती का स्मरण करें।
- साफ़ कपड़े पहनकर सूर्य को अर्घ्य दें; जल में तिल डालें। अर्घ्य की विधि सूर्य को जल कैसे चढ़ाएं में है।
- घर के मंदिर में दीपक जलाएँ, भगवान विष्णु या शिव की पूजा करें, तुलसी या पीपल को जल दें।
- दान की चीज़ें पहले से अलग रख लें और स्नान-पूजा के बाद दान करें।
- मौन खोलें तो पहले भगवान का नाम लें। दिन में सात्विक भोजन करें; कई लोग इस दिन एक समय ही खाते हैं।
अमावस्या पर क्या करें और क्या न करें, इसकी पूरी सूची अमावस्या के नियम में है।
पितरों के लिए
हर अमावस्या पितरों की तिथि मानी जाती है, और माघ की अमावस्या पर किया तर्पण विशेष माना गया है। स्नान के बाद दक्षिण की ओर मुख करके, हाथ में जल, काले तिल और कुश लेकर अपने पूर्वजों का नाम लेते हुए तीन बार जल छोड़ें। घर में बने सात्विक भोजन में से एक हिस्सा गाय, कुत्ते, कौए और किसी ज़रूरतमंद के लिए निकालें। जिन्हें तर्पण की पूरी विधि नहीं आती, वे बस श्रद्धा से पूर्वजों को याद करके अन्न-दान करें, यह भी पितृ-सेवा ही है। विस्तृत विधि श्राद्ध और तर्पण विधि में दी गई है।

