अमावस्या के नियम: क्या करें, क्या न करें

अमावस्या कृष्ण पक्ष की आख़िरी तिथि है और पितरों का दिन मानी जाती है; इस दिन स्नान, तर्पण, दान और पीपल पूजा की जाती है। विवाह, गृह प्रवेश जैसे नए शुभ काम और तामसिक भोजन आमतौर पर टाले जाते हैं।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखन: · वेद पण्डित, लेखकअद्यतन · 5 मिनट का पाठ
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अमावस्या कृष्ण पक्ष की आख़िरी तिथि है, जिस रात चंद्रमा दिखाई नहीं देता। यह दिन मुख्य रूप से पितरों का माना जाता है: इस दिन स्नान, तर्पण, दान और दीपदान किए जाते हैं, और विवाह, गृह प्रवेश जैसे नए शुभ काम आमतौर पर टाले जाते हैं। हर महीने एक अमावस्या आती है, यानी साल में बारह (अधिक मास वाले साल में तेरह)।

अमावस्या क्या है

पंचांग में पंद्रह तिथियाँ शुक्ल पक्ष की और पंद्रह कृष्ण पक्ष की होती हैं। कृष्ण पक्ष की पंद्रहवीं तिथि अमावस्या है, जब सूर्य और चंद्रमा आकाश में एक ही राशि-अंश पर आ जाते हैं और चाँद की रोशन सतह पृथ्वी की ओर नहीं रहती। "अमा" का अर्थ है साथ और "वस्या" यानी रहना, यानी सूर्य-चंद्र का साथ रहना।

उत्तर भारत के पूर्णिमांत कैलेंडर में महीना पूर्णिमा पर ख़त्म होता है, इसलिए अमावस्या महीने के बीच में आती है। दक्षिण और पश्चिम भारत के अमांत कैलेंडर में महीना अमावस्या पर ख़त्म होता है। इसी कारण एक ही अमावस्या को उत्तर में "श्रावण अमावस्या" और महाराष्ट्र-गुजरात में "आषाढ़ अमावस्या" कहा जा सकता है। दिन वही रहता है, केवल महीने का नाम बदलता है। इस साल की सारी तिथियाँ अमावस्या कैलेंडर में देखें, और आज की तिथि आज के पंचांग में।

पितरों के लिए तर्पण

गरुड़ पुराण और दूसरे ग्रंथों में अमावस्या को पितरों की तिथि कहा गया है। मान्यता है कि इस दिन पितर अपने वंशजों से जल और अन्न की आशा रखते हैं। घर पर सादा तर्पण इस तरह किया जाता है:

  1. सुबह स्नान करके साफ़ कपड़े पहनें। हो सके तो नदी में स्नान करें, नहीं तो नहाने के पानी में थोड़ा गंगाजल मिला लें।
  2. एक लोटे में जल, काले तिल, थोड़ा कच्चा दूध और कुशा या फूल लें।
  3. दक्षिण की ओर मुँह करके बैठें या खड़े हों और पितरों का नाम लेकर अंजलि से धीरे-धीरे जल छोड़ें। नाम याद न हों तो "सभी पितरों को" कहकर जल दें।
  4. इसके बाद गाय, कौवे, कुत्ते और चींटियों के लिए थोड़ा भोजन निकालें। यह पंचबलि का सरल रूप है।
  5. किसी ज़रूरतमंद को अन्न, कपड़ा या दक्षिणा दें।

पूरा श्राद्ध और पिंडदान पितृ पक्ष में किया जाता है, जिसकी विधि पितृ पक्ष श्राद्ध विधि में है।

क्या करें

  • स्नान और सूर्य को अर्घ्य: सुबह स्नान के बाद तांबे के लोटे से सूर्य को जल दें।
  • पीपल की पूजा: पीपल की जड़ में जल चढ़ाएँ और शाम को उसके नीचे सरसों के तेल का दीया जलाएँ। शनिवार को पड़ने वाली अमावस्या पर यह खास तौर पर किया जाता है।
  • दक्षिण दिशा में दीपक: शाम को घर के दक्षिण की ओर पितरों के नाम का एक दीया जलाने की परंपरा कई परिवारों में है।
  • दान: अनाज, काले तिल, गुड़, कंबल या कपड़े का दान अमावस्या पर पुण्य माना जाता है।
  • जप और पाठ: भगवान विष्णु, शिव या हनुमान जी का नाम जप, गीता या विष्णु सहस्रनाम का पाठ।
  • मौन या उपवास: कई लोग इस दिन एक समय भोजन करते हैं या कुछ घंटे मौन रखते हैं।

अमावस्या पर घर का भोजन

पूर्वांचल और अवध के कई घरों में अमावस्या पर खीर-पूरी या दाल-चावल जैसा सादा सात्विक भोजन बनता है और पहली थाली पितरों के नाम निकालकर गाय या किसी ज़रूरतमंद को दी जाती है। राजस्थान और हरियाणा में कई परिवार इस दिन रसोई में तली चीज़ें कम बनाते हैं और पहली रोटी गाय की निकालते हैं।

क्या न करें

ये परंपरागत नियम हैं जो ज़्यादातर उत्तर भारतीय घरों में माने जाते हैं। इन्हें डर से नहीं, अनुशासन के भाव से देखें:

  • विवाह, सगाई, मुंडन, गृह प्रवेश या नया काम शुरू करना आमतौर पर अमावस्या पर नहीं किया जाता। (दिवाली की अमावस्या इसका बड़ा अपवाद है, जब लक्ष्मी पूजन होता है।)
  • मांस, मदिरा और तामसिक भोजन से परहेज़ रखें।
  • बाल और नाखून काटने से बहुत से परिवार बचते हैं।
  • तुलसी के पत्ते इस दिन नहीं तोड़े जाते; पूजा के लिए एक दिन पहले तोड़ लें।
  • घर में झगड़ा, कड़वी बात और बुज़ुर्गों का अनादर न करें। पितरों के दिन घर का माहौल शांत रखना ही सबसे बड़ा नियम है।

सोमवती और शनिश्चरी अमावस्या

जब अमावस्या सोमवार को पड़े तो उसे सोमवती अमावस्या कहते हैं। इस दिन सुहागिन महिलाएँ पीपल के पेड़ की पूजा करती हैं, उसकी 108 परिक्रमा करके कच्चा सूत लपेटती हैं और पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं। गंगा स्नान का भी बहुत महत्व है, इसलिए हरिद्वार, प्रयागराज और काशी में भीड़ रहती है।

जब अमावस्या शनिवार को पड़े तो वह शनिश्चरी या शनि अमावस्या कहलाती है। इस दिन शनि देव को सरसों का तेल, काले तिल और काली उड़द चढ़ाई जाती है, पीपल के नीचे दीपक जलता है और हनुमान चालीसा पढ़ी जाती है। मंगलवार की अमावस्या को भौमवती अमावस्या कहते हैं, जिस दिन हनुमान पूजा की जाती है।

साल की प्रमुख अमावस्या

नीचे महीनों के नाम पूर्णिमांत (उत्तर भारतीय) गणना से दिए गए हैं:

महीनाअमावस्या का नामक्या खास है
माघमौनी अमावस्यामौन रखकर संगम या गंगा स्नान, तिल और कंबल का दान
ज्येष्ठशनि जयंती, वट सावित्री अमावस्याशनि पूजा; सुहागिनें बरगद की पूजा करती हैं
श्रावणहरियाली अमावस्यापौधे लगाना, शिव पूजा, मेले
भाद्रपदकुशग्रहणी (पिठोरी) अमावस्यासाल भर की पूजा के लिए कुशा इकट्ठा करना
आश्विनसर्वपितृ (महालया) अमावस्यापितृ पक्ष का आख़िरी दिन; जिन पितरों की तिथि याद न हो उनका श्राद्ध
कार्तिकदिवालीलक्ष्मी-गणेश पूजन, दीपदान

इनमें से कोई अमावस्या सोमवार या शनिवार को पड़ जाए तो उसका महत्व और बढ़ जाता है। हर साल की सही तारीख़ और तिथि के शुरू-ख़त्म होने का समय पंचांग से देखकर ही नियम तय करें, क्योंकि कई बार अमावस्या दोपहर में शुरू होती है और स्नान-दान अगले दिन सुबह किया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अमावस्या के दिन क्या करना चाहिए?

सुबह स्नान, सूर्य को अर्घ्य, पितरों के लिए तिल-जल से तर्पण, दान और शाम को पीपल के नीचे दीपक जलाना अमावस्या के मुख्य काम हैं।

अमावस्या को क्या नहीं करना चाहिए?

परंपरा में इस दिन विवाह, गृह प्रवेश जैसे नए शुभ काम, मांस-मदिरा, बाल-नाखून काटना और तुलसी तोड़ना टाला जाता है।

सोमवती अमावस्या क्या है?

जो अमावस्या सोमवार को पड़े उसे सोमवती अमावस्या कहते हैं। इस दिन सुहागिनें पीपल की 108 परिक्रमा करके सूत लपेटती हैं और गंगा स्नान करती हैं।

क्या अमावस्या पर व्रत रखना ज़रूरी है?

ज़रूरी नहीं है। बहुत से लोग एक समय भोजन करते हैं, पर अमावस्या का मुख्य काम तर्पण, दान और पूजा है।

क्या अमावस्या पर नई चीज़ खरीदना अशुभ है?

बहुत से परिवार अमावस्या पर बड़ी खरीदारी या नया काम टालते हैं, पर दिवाली की अमावस्या पर खरीदारी और लक्ष्मी पूजन शुभ माना जाता है।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखक के बारे में

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा

वेद पण्डित, लेखक

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा जी वेद पण्डित और लेखक हैं। अनेक वर्षों से वे दुर्गा देवी की आराधना का अध्ययन और आचरण करते आ रहे हैं। पूजा विधि, मंत्रों और स्तोत्रों को सामान्य भक्तों के लिए सरलता से समझाना उनका लक्ष्य है। वे “श्री दुर्गा नित्याराधना” ग्रंथ के लेखक हैं। इस साइट के लेख उनकी रचनाएँ हैं, या उनके ग्रंथों पर आधारित हैं।

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