एकादशी के व्रत में अन्न नहीं खाया जाता, यानी चावल, गेहूँ और दालें बंद रहती हैं। इनकी जगह फल, दूध, मेवे और व्रत के आटे (कुट्टू, सिंघाड़ा, राजगिरा) से बना फलाहार लिया जाता है, नमक सेंधा होता है। हर महीने दो एकादशी आती हैं; अगली एकादशी कब है और पारण का समय क्या है, यह एकादशी कैलेंडर में देखें।
व्रत के प्रकार: निर्जल, जलाहार, फलाहार
एकादशी व्रत हर व्यक्ति अपनी सेहत और सामर्थ्य के हिसाब से अलग तरह से रखता है। शास्त्रों में भी कई स्तर बताए गए हैं:
- निर्जल: न अन्न, न जल। यह सबसे कठिन है और आम तौर पर सिर्फ़ निर्जला एकादशी पर या बहुत अभ्यस्त लोग रखते हैं।
- जलाहार: सिर्फ़ पानी, कुछ लोग नींबू पानी या नारियल पानी भी लेते हैं।
- क्षीराहार/फलाहार: दूध और फल। उत्तर भारत में ज़्यादातर लोग यही रखते हैं।
- एक समय फलाहारी भोजन: दिन में एक बार कुट्टू या सिंघाड़े के आटे की पूड़ी, आलू की सब्ज़ी, दही। कामकाजी लोगों और बुज़ुर्गों के लिए यह सबसे व्यावहारिक है।
नियम जो भी चुनें, उसका संकल्प सुबह ले लें और पूरे दिन उसी पर टिके रहें। पहली बार व्रत शुरू कर रहे हों तो एकादशी व्रत कैसे शुरू करें पढ़ लें।
क्या खा सकते हैं
| श्रेणी | खा सकते हैं |
|---|---|
| फल | सभी मौसमी फल: केला, सेब, पपीता, अनार, अमरूद, संतरा, अंगूर, नारियल |
| दूध से बनी चीज़ें | दूध, दही, छाछ, पनीर, खोया, घी, मखाने की खीर |
| व्रत के आटे | कुट्टू, सिंघाड़ा, राजगिरा (चौलाई), सामा के चावल (समक/मोरधन) |
| सब्ज़ियाँ | आलू, शकरकंद, अरबी, कच्चा केला, लौकी, कद्दू, खीरा, टमाटर |
| मेवे और बीज | बादाम, काजू, अखरोट, किशमिश, मूँगफली, मखाना |
| मसाले | सेंधा नमक, काली मिर्च, जीरा, हरी मिर्च, अदरक, इलायची |
| अन्य | साबूदाना, गुड़, शहद, चीनी (कुछ घर मिश्री ही लेते हैं) |
सामा के चावल, टमाटर और मूँगफली को लेकर घरों में मतभेद है। कुछ परिवार इन्हें फलाहार में गिनते हैं, कुछ नहीं। अपने घर की परंपरा मानें। हल्दी, हींग, गरम मसाला और धनिया पाउडर भी बहुत से घरों में व्रत में नहीं डाले जाते।
क्या नहीं: चावल, अनाज, दालें, प्याज़-लहसुन
- चावल: किसी भी रूप में नहीं, न भात, न पोहा, न चावल का आटा। एकादशी का सबसे पक्का नियम यही है।
- गेहूँ, जौ, मक्का, बाजरा, ज्वार: सभी अनाज और उनसे बनी रोटी, सूजी, मैदा, बेसन।
- सभी दालें: अरहर, मूँग, उड़द, चना, मसूर, राजमा।
- प्याज़, लहसुन और मांस-मछली-अंडा, शराब।
- साधारण नमक (सेंधा नमक ही लें)।
- बैंगन, गोभी, पालक जैसी पत्तेदार सब्ज़ियाँ कई घरों में नहीं खाई जातीं।
- बाज़ार के पैकेट वाले "व्रत नमकीन" में अक्सर साधारण नमक या मैदा मिला होता है, लेबल पढ़कर ही लें।
एक दिन का सादा फलाहारी मेन्यू
बहुत लोग व्रत में तली-भुनी चीज़ें इतनी खा लेते हैं कि फलाहार भी भारी हो जाता है। एक संतुलित दिन कुछ ऐसा हो सकता है:
| समय | क्या लें |
|---|---|
| सुबह पूजा के बाद | भीगे बादाम, एक फल, गुनगुना पानी या दूध |
| दोपहर | सामा के चावल की खिचड़ी या कुट्टू की रोटी, आलू-लौकी की सब्ज़ी, दही |
| शाम | भुने मखाने, नारियल पानी या छाछ |
| रात | साबूदाने की खीर या दूध और फल, हल्का ही |
दशमी की रात भी हल्का, बिना प्याज़-लहसुन का खाना लें, ताकि अगला दिन आसान रहे।
चावल न खाने के पीछे की मान्यता
एकादशी पर चावल न खाने की बात इतनी गहरी है कि जो लोग व्रत नहीं रखते, वे भी इस दिन चावल से बचते हैं। एक लोक कथा कहती है कि महर्षि मेधा ने माँ शक्ति के क्रोध से बचने के लिए शरीर त्याग दिया और उनका अंश धरती में समाकर चावल और जौ के रूप में उगा। जिस दिन यह हुआ, वह एकादशी थी, इसलिए इस दिन चावल खाना ऋषि के शरीर का अंश खाने जैसा माना गया।
वैष्णव परंपरा की एक और मान्यता है कि एकादशी के दिन सारे पाप अन्न में आकर बस जाते हैं, इसलिए जो इस दिन अन्न खाता है वह पाप ग्रहण करता है। व्यावहारिक नज़र से देखें तो महीने में दो दिन भारी अनाज छोड़कर हल्का फलाहार करना पाचन को आराम भी देता है। एकादशी व्रत की मूल कथा, यानी एकादशी देवी के जन्म का प्रसंग, एकादशी व्रत कथा में पढ़ें।
घर के जो सदस्य व्रत न रखें, उनके नियम
ज़रूरी नहीं कि घर में सभी व्रत रखें। पर एकादशी के दिन पूरे घर में कुछ नियम सामान्य रूप से माने जाते हैं:
- घर में चावल न पकाएँ। बाकी लोग रोटी, दाल, सब्ज़ी खा सकते हैं।
- प्याज़-लहसुन और मांसाहार न बनाएँ, ताकि व्रती का खाना और बर्तन अलग रखना आसान हो।
- व्रती के लिए फलाहारी खाना पहले बनाएँ, अलग बर्तन में।
- तुलसी के पत्ते इस दिन न तोड़ें; भोग के लिए एक दिन पहले तोड़कर रखें।
बुज़ुर्ग, गर्भवती और बीमार व्रती
शास्त्र भी कहते हैं कि व्रत शरीर को कष्ट देने के लिए नहीं, मन को साधने के लिए है। बच्चे, बहुत बुज़ुर्ग, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाएँ, और डायबिटीज़, ब्लड प्रेशर या किसी लंबी बीमारी वाले लोग निर्जल व्रत न रखें। ऐसे लोग:
- फलाहार या एक समय फलाहारी भोजन रखें, पानी भरपूर पिएँ।
- दवा समय पर लें; दवा लेने से व्रत नहीं टूटता।
- सिर्फ़ चावल और अनाज छोड़कर, बाकी सामान्य हल्का भोजन लेते हुए भी एकादशी का नियम निभा सकते हैं।
- कोई भी नया नियम शुरू करने से पहले अपने डॉक्टर से बात कर लें।
अगले दिन द्वादशी को पारण का समय और तरीका भी उतना ही ज़रूरी है जितना व्रत। हरि वासर में पारण नहीं होता और द्वादशी बीतने से पहले व्रत खोल लेना चाहिए; इसके नियम एकादशी व्रत पारण में और साल की सभी चौबीस एकादशियों के नाम साल की 24 एकादशी में दिए गए हैं।

