एकादशी व्रत पारण: समय, हरि वासर और नियम

एकादशी का पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद, द्वादशी तिथि खत्म होने से पहले किया जाता है, लेकिन द्वादशी के पहले चौथाई हिस्से यानी हरि वासर में नहीं। सबसे अच्छा समय सुबह का होता है; तुलसी दल वाला जल लेकर सात्विक भोजन से व्रत खोलें।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखन: · वेद पण्डित, लेखकअद्यतन · 5 मिनट का पाठ
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एकादशी व्रत का पारण यानी व्रत खोलना अगले दिन, द्वादशी तिथि में, सूर्योदय के बाद किया जाता है। ध्यान रखने की दो बातें हैं: पारण द्वादशी खत्म होने से पहले हो जाए, और द्वादशी के पहले चौथाई हिस्से, जिसे हरि वासर कहते हैं, में न हो। व्रत जितना ज़रूरी है, सही समय पर पारण उतना ही ज़रूरी माना गया है।

पारण क्या है

पारण का शाब्दिक अर्थ है किसी काम को पार लगाना, पूरा करना। एकादशी के उपवास को द्वादशी के दिन विधि से तोड़ना ही पारण है। पुराणों में कहा गया है कि द्वादशी में पारण न करना व्रत को अधूरा छोड़ने जैसा है। इसीलिए पुराने लोग कहते हैं, “एकादशी रखना जितना पुण्य, द्वादशी साधना उतना ही ज़रूरी।”

राजा अम्बरीष की कथा इसी से जुड़ी है। वे द्वादशी के पारण की तैयारी कर रहे थे, तभी दुर्वासा ऋषि आ गए और स्नान को चले गए। द्वादशी निकलने वाली थी, तो राजा ने ब्राह्मणों की सलाह पर सिर्फ़ जल पीकर पारण किया, ताकि अतिथि का अपमान भी न हो और व्रत भी न टूटे। यह प्रसंग भागवत पुराण के नवम स्कंध में आता है और बताता है कि पारण का समय कितना गंभीरता से लिया जाता था।

पारण का सही समय

पारण का समय हर एकादशी पर बदलता है, क्योंकि तिथि का शुरू और खत्म होना चंद्रमा की गति पर निर्भर है। इसलिए हर बार पंचांग देखें। एकादशी कैलेंडर में हर व्रत के साथ पारण का समय दिया जाता है, और उस दिन की तिथि का समाप्ति समय आज का पंचांग में मिल जाएगा।

सामान्य नियम यह है:

  1. द्वादशी के दिन सूर्योदय के बाद ही पारण करें, उससे पहले नहीं।
  2. हरि वासर बीत जाने दें।
  3. सबसे उत्तम समय प्रातःकाल है, यानी सूर्योदय के बाद सुबह का पहला हिस्सा।
  4. दोपहर (मध्याह्न) में पारण से बचने की सलाह दी जाती है। अगर किसी वजह से सुबह न हो पाए, तो मध्याह्न बीतने के बाद करें।
  5. हर हाल में द्वादशी खत्म होने से पहले पारण हो जाना चाहिए।

हरि वासर में पारण क्यों नहीं

द्वादशी तिथि की कुल अवधि का पहला एक-चौथाई भाग हरि वासर कहलाता है। माना जाता है कि इस समय भी एकादशी का प्रभाव बना रहता है और यह भगवान हरि का ही समय है, इसलिए इसमें भोजन करके व्रत तोड़ना ठीक नहीं समझा जाता।

एक आसान उदाहरण लें। मान लीजिए द्वादशी सुबह 6 बजे शुरू होकर अगली सुबह 6 बजे खत्म हो रही है, यानी 24 घंटे की है। तो उसका पहला चौथाई, सुबह 6 से दोपहर 12 बजे तक, हरि वासर होगा। ऐसे में पारण दोपहर के बाद करना होगा। ज़्यादातर बार ऐसा नहीं होता, क्योंकि द्वादशी अक्सर रात में ही शुरू हो चुकी होती है और सुबह तक हरि वासर बीत जाता है। फिर भी हर बार पंचांग देखना ही सुरक्षित तरीका है।

पारण में पहले क्या खाएं

लंबे उपवास के बाद पेट पर एकदम भारी खाना डालना ठीक नहीं, और परंपरा भी हल्की शुरुआत की बात कहती है।

  1. सुबह स्नान करके विष्णु जी की छोटी पूजा करें और जो भोजन बनाया है उसका भोग लगाएँ।
  2. सबसे पहले तुलसी दल डला जल या चरणामृत लें।
  3. कई घरों में आँवला, मिश्री या भीगे चने-मूँग के कुछ दाने लेकर व्रत खोला जाता है।
  4. फिर सात्विक भोजन करें: दाल, चावल, रोटी, हल्की सब्ज़ी। एकादशी को जो चावल वर्जित था, वह द्वादशी के भोजन में कई परिवार ज़रूर बनाते हैं।
  5. प्याज़, लहसुन, मांस-मदिरा द्वादशी को भी नहीं। कई परिवार इस दिन बैंगन, मसूर और शहद से भी बचते हैं।

फलाहार में क्या लिया जा सकता है, इसकी विस्तृत सूची एकादशी में क्या खाएं, क्या नहीं में है।

द्वादशी न मिले तो

कभी-कभी द्वादशी तिथि बहुत छोटी होती है और अगले दिन सूर्योदय से पहले ही खत्म हो जाती है। ऐसे में क्या करें?

  • द्वादशी सूर्योदय से पहले खत्म हो जाए: तब सूर्योदय के बाद पारण कर लें। उस समय तिथि बदल चुकी होगी, फिर भी यही नियम है।
  • द्वादशी बहुत जल्दी खत्म हो रही हो: सूर्योदय के तुरंत बाद, हरि वासर बीत गया हो तो, पारण कर लें। भोजन तैयार न हो तो राजा अम्बरीष की तरह जल या तुलसी जल से पारण करके बाद में भोजन करें।
  • दो दिन एकादशी: जब पंचांग में एकादशी दो दिन लिखी हो, तो गृहस्थ (स्मार्त) पहले दिन व्रत रखते हैं और वैष्णव संप्रदाय अगले दिन, जिसे कभी-कभी गौण एकादशी भी कहा जाता है। जिस दिन आपने व्रत रखा, उसके अगले दिन का पारण समय देखें।

दान और ब्राह्मण भोजन

पारण के दिन दान का बड़ा महत्व है। पुराने समय में व्रती पहले किसी ब्राह्मण या अतिथि को भोजन कराकर ही खुद खाते थे। आज के हिसाब से इसे ऐसे निभा सकते हैं:

  • भोजन का पहला हिस्सा गाय के लिए निकालें।
  • किसी ज़रूरतमंद को भोजन, फल या अनाज दें।
  • मंदिर में अन्न या दक्षिणा चढ़ाएँ।
  • निर्जला जैसी बड़ी एकादशी के बाद जल से भरा घड़ा, पंखा या छाता दान करने की रीत है।

पारण में होने वाली आम गलतियाँ

  • रात 12 बजे के बाद खा लेना: कई लोग सोचते हैं कि तारीख बदलते ही व्रत पूरा हो गया। हिंदू तिथि सूर्योदय से गिनी जाती है, इसलिए पारण सूर्योदय के बाद ही होगा।
  • दोपहर तक टालते रहना: दफ़्तर या भागदौड़ में पारण भूल जाना और द्वादशी निकल जाना। सुबह निकलने से पहले कम से कम तुलसी जल और फल से पारण कर लें।
  • हर बार एक ही समय मान लेना: पिछली बार 7 बजे पारण था, तो इस बार भी होगा, ऐसा नहीं है। हर एकादशी पर समय नया देखें।
  • भारी तला-भुना खाना: पूड़ी-पकौड़ी से व्रत खोलने पर पेट खराब होता है, खासकर निर्जल व्रत के बाद। पहले पानी, फिर हल्का भोजन।

निर्जला एकादशी के बाद पारण में खास ध्यान रखें: गर्मी के मौसम में चौबीस घंटे से ज़्यादा बिना पानी रहने के बाद पहले थोड़ा-थोड़ा पानी, नींबू पानी या छाछ लें, फिर भोजन करें।

पहली बार व्रत रख रहे हैं तो पूरी विधि एकादशी व्रत कैसे शुरू करें में पढ़ें, और व्रत की मूल कथा एकादशी व्रत कथा में।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एकादशी व्रत का पारण कब करना चाहिए?

अगले दिन द्वादशी तिथि में सूर्योदय के बाद, हरि वासर बीतने पर और द्वादशी खत्म होने से पहले। सुबह का समय सबसे अच्छा माना जाता है।

हरि वासर क्या होता है?

द्वादशी तिथि की कुल अवधि का पहला एक-चौथाई हिस्सा हरि वासर कहलाता है। इस समय पारण नहीं किया जाता।

एकादशी का व्रत किस चीज से खोलें?

पूजा के बाद तुलसी दल डला जल या चरणामृत लें, फिर आँवला या मिश्री और उसके बाद हल्का सात्विक भोजन करें।

अगर द्वादशी सूर्योदय से पहले खत्म हो जाए तो पारण कब करें?

ऐसी स्थिति में अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण कर लें। पारण कभी सूर्योदय से पहले नहीं किया जाता।

क्या पारण में चावल खा सकते हैं?

हाँ, चावल का निषेध एकादशी के दिन का है। द्वादशी के पारण भोजन में कई परिवार चावल ज़रूर बनाते हैं।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखक के बारे में

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा

वेद पण्डित, लेखक

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा जी वेद पण्डित और लेखक हैं। अनेक वर्षों से वे दुर्गा देवी की आराधना का अध्ययन और आचरण करते आ रहे हैं। पूजा विधि, मंत्रों और स्तोत्रों को सामान्य भक्तों के लिए सरलता से समझाना उनका लक्ष्य है। वे “श्री दुर्गा नित्याराधना” ग्रंथ के लेखक हैं। इस साइट के लेख उनकी रचनाएँ हैं, या उनके ग्रंथों पर आधारित हैं।

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