एकादशी व्रत शुरू करने के लिए सबसे शुभ दिन मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की उत्पन्ना एकादशी मानी जाती है। व्रत तीन दिन का अनुशासन है: दशमी को संयम, एकादशी को उपवास और पूजा, और द्वादशी को सही समय पर पारण। पहली बार व्रत रख रहे हैं तो अपनी सेहत के हिसाब से फलाहार से शुरू करें, निर्जल से नहीं।
शुरुआत उत्पन्ना एकादशी से क्यों
पद्म पुराण की कथा के अनुसार मुर नाम के दैत्य से युद्ध करते-करते भगवान विष्णु बदरिकाश्रम की एक गुफा में विश्राम कर रहे थे। तभी उनके शरीर से एक तेजस्वी देवी प्रकट हुईं और उन्होंने मुर का वध कर दिया। वह दिन एकादशी था, इसलिए देवी का नाम एकादशी पड़ा और भगवान ने वर दिया कि जो इस तिथि को व्रत रखेगा, उस पर उनकी विशेष कृपा रहेगी। पूरी कथा एकादशी व्रत कथा पृष्ठ पर पढ़ें।
क्योंकि एकादशी देवी का जन्म इसी दिन हुआ, ज़्यादातर पंडित और घर के बुज़ुर्ग कहते हैं कि साल भर की एकादशियाँ उत्पन्ना से शुरू करें। उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग में यह कार्तिक पूर्णिमा के बाद आती है, यानी नवंबर-दिसंबर के आसपास।
अगर उत्पन्ना निकल चुकी है और आप इंतज़ार नहीं करना चाहते, तो कई परिवार किसी भी शुक्ल पक्ष की एकादशी से भी शुरुआत कर लेते हैं, खासकर देवउठनी या मोक्षदा से। कुछ परंपराएँ चातुर्मास (देवशयनी से देवउठनी तक) और खरमास में नया व्रत शुरू करने से बचने की सलाह देती हैं। अपने कुल की रीत हो तो उसी को मानें।
दशमी के नियम
एकादशी की तैयारी एक दिन पहले, दशमी की शाम से शुरू होती है। नियम सरल हैं:
- दशमी को दिन में एक बार, सूर्यास्त से पहले सात्विक भोजन करें।
- उस दिन से चावल, मसूर दाल, प्याज़, लहसुन, मांस-मदिरा से दूर रहें।
- रात को हल्का खाएँ या न खाएँ, ताकि अगली सुबह पेट हल्का रहे।
- मन में कलह, गुस्सा और झूठ से बचने का संकल्प रखें। व्रत सिर्फ़ भूखे रहने का नाम नहीं है।
- ब्रह्मचर्य का पालन करें और जमीन या साधारण बिस्तर पर सोएँ, जहाँ यह संभव हो।
एकादशी के दिन की विधि
- सुबह जल्दी उठें: सूर्योदय से पहले स्नान करें। संभव हो तो पानी में थोड़ा गंगाजल मिला लें।
- संकल्प: विष्णु जी की तस्वीर या शालिग्राम के सामने हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर बोलें कि आप आज एकादशी का व्रत किस रूप में (निर्जल, जल सहित या फलाहार) रखेंगे और कल द्वादशी को पारण करेंगे।
- पूजा: भगवान को पीले फूल, पीला चंदन, तुलसी दल, धूप, घी का दीपक और फल या मिश्री का भोग लगाएँ। एकादशी को तुलसी के पत्ते नहीं तोड़े जाते, इसलिए दशमी को ही तोड़कर रख लें।
- मंत्र जाप: “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” की एक माला, या विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
- कथा: उस एकादशी की अपनी कथा पढ़ें या सुनें। हर एकादशी का नाम और कथा अलग है।
- आरती: ॐ जय जगदीश हरे आरती गाएँ।
- भोजन: निर्जल न रख सकें तो दिन में एक या दो बार फलाहार लें। अन्न, खासकर चावल, बिल्कुल नहीं। क्या खा सकते हैं, इसकी पूरी सूची एकादशी में क्या खाएं, क्या नहीं लेख में है।
- शाम की पूजा: सूर्यास्त के बाद फिर दीपक जलाएँ और तुलसी के पास भी एक दीया रखें।
पहली बार व्रत रखने वाले, बुज़ुर्ग, गर्भवती महिलाएँ, डायबिटीज़ या कोई दवा लेने वाले लोग निर्जल व्रत न रखें। शास्त्रों में भी असमर्थ लोगों के लिए फलाहार और दूध की छूट दी गई है। भाव पूरा रहे, यही काफ़ी है।
व्रत के चार रूप: अपनी क्षमता से चुनें
| रूप | क्या लेते हैं | किसके लिए ठीक |
|---|---|---|
| निर्जल | पानी भी नहीं | सिर्फ़ अनुभवी और पूरी तरह स्वस्थ लोग |
| जलाहार | केवल पानी | जिन्हें कुछ साल का अभ्यास हो |
| फलाहार | फल, दूध, मेवे, साबूदाना, कुट्टू आदि | शुरुआत करने वालों के लिए सबसे अच्छा |
| एक भुक्त | दिन में एक बार व्रत वाला भोजन | बुज़ुर्ग, कामकाजी या कमज़ोर सेहत वाले |
संकल्प जिस रूप का लें, उसी को निभाएँ। बीच में बदलना पड़े तो भगवान से क्षमा माँगकर बदल लें, अपराध-बोध न पालें।
रात्रि जागरण
एकादशी की रात जागकर भजन-कीर्तन करना पुरानी परंपरा है, खासकर देवउठनी, निर्जला और वैकुंठ से जुड़ी एकादशियों पर। घर पर इसे आसान रखें:
- परिवार के साथ बैठकर विष्णु या कृष्ण भजन गाएँ।
- गीता का एक अध्याय या विष्णु सहस्रनाम पढ़ें।
- पूरी रात न जाग सकें तो कम से कम आधी रात तक भगवान का नाम लें।
जागरण का मतलब मोबाइल पर रात काटना नहीं है। जो समय जागें, वह भगवान के नाम में लगे।
द्वादशी पारण
एकादशी का व्रत तभी पूरा होता है जब अगले दिन द्वादशी तिथि के भीतर, सूर्योदय के बाद, सही समय पर पारण किया जाए। द्वादशी के पहले हिस्से, जिसे हरि वासर कहते हैं, में पारण नहीं किया जाता। सुबह स्नान-पूजा के बाद तुलसी दल डला जल पीकर, फिर सात्विक भोजन से व्रत खोलें। पारण का समय हर बार अलग होता है, उसे एकादशी कैलेंडर में देखें। हरि वासर और पारण के बाकी नियम एकादशी व्रत पारण लेख में विस्तार से समझाए गए हैं।
उद्यापन कब
उद्यापन का मतलब है व्रत का विधिवत समापन। एकादशी के मामले में आम चलन यह है कि साल भर की 24 एकादशियाँ (अधिक मास वाले साल में 26) पूरी होने के बाद उद्यापन करें। कई लोग इसे उत्पन्ना या मोक्षदा एकादशी पर करते हैं, तो कुछ देवउठनी पर।
- उद्यापन के दिन विष्णु-लक्ष्मी का पूजन और छोटा हवन होता है।
- ब्राह्मण या ज़रूरतमंद लोगों को भोजन कराकर वस्त्र, अन्न और दक्षिणा दी जाती है।
- कई परिवार इस मौके पर गीता, विष्णु सहस्रनाम की पुस्तक या तुलसी का पौधा दान करते हैं।
उद्यापन के बाद भी कई लोग जीवन भर एकादशी रखते रहते हैं। उद्यापन की पूरी विधि व्रत का उद्यापन कैसे करें में दी गई है। साल की सभी एकादशियों के नाम और महीने 24 एकादशी की लिस्ट में देखें, ताकि आप पहले से तैयारी कर सकें।

