व्रत का उद्यापन कैसे करें

उद्यापन किसी व्रत की तय संख्या पूरी होने पर किया जाने वाला समापन अनुष्ठान है, जिसमें संकल्प, देवता की पूजा, हवन, कथा, भोजन और दान होता है। इसे शुभ मुहूर्त में, खरमास और पितृ पक्ष को छोड़कर किया जाता है; हर व्रत की अपनी खास रीत होती है।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखन: · वेद पण्डित, लेखकअद्यतन · 5 मिनट का पाठ
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उद्यापन का अर्थ है व्रत का विधिवत समापन। जब आप सोलह सोमवार, सोलह शुक्रवार, इक्कीस मंगलवार या साल भर की एकादशी जैसा कोई व्रत संकल्प लेकर शुरू करते हैं, तो तय संख्या पूरी होने पर उद्यापन करके भगवान को धन्यवाद दिया जाता है और व्रत को पूर्ण माना जाता है। इसमें आम तौर पर पूजा, हवन, कथा, भोजन और दान होता है। उद्यापन के बाद आप चाहें तो वही व्रत फिर से नए संकल्प के साथ शुरू कर सकते हैं।

उद्यापन क्या है

पुराणों में किसी भी व्रत के तीन हिस्से बताए गए हैं: संकल्प (शुरुआत), नियम से पालन, और उद्यापन (समापन)। जैसे घर का कोई बड़ा काम पूरा होने पर पूजा और भोज रखा जाता है, वैसे ही उद्यापन व्रत की "पूर्णाहुति" है। भविष्य पुराण और स्कन्द पुराण में कई व्रतों के अलग-अलग उद्यापन बताए गए हैं।

ध्यान रखें कि कुछ व्रत जीवन भर के होते हैं, जैसे करवा चौथ या एकादशी, जिन्हें बहुत से लोग कभी नहीं छोड़ते। इनका उद्यापन तब किया जाता है जब कोई व्रत रखना बंद करना चाहे, या परंपरा के अनुसार कुछ साल पूरे होने पर।

उद्यापन कब करें

  • व्रत की तय संख्या पूरी होने के बाद अगले उसी वार या तिथि को, जैसे सोलहवें सोमवार के बाद सत्रहवाँ सोमवार।
  • शुक्ल पक्ष और शुभ नक्षत्र को प्राथमिकता दी जाती है।
  • खरमास, पितृ पक्ष, होलाष्टक और ग्रहण के दिनों में उद्यापन नहीं करते।
  • कई परिवार चातुर्मास (देवशयनी से देवउठनी एकादशी तक) में भी बड़े उद्यापन टालते हैं, हालाँकि सावन के सोमवार का उद्यापन सावन में ही होता है।
  • एकादशी का उद्यापन अक्सर मार्गशीर्ष की उत्पन्ना एकादशी या किसी भी शुक्ल एकादशी को किया जाता है।

सही दिन तय करने के लिए पंचांग देखें या पंडित जी से पूछें।

उद्यापन की सामान्य विधि

आम सामग्री

  • चौकी, लाल या पीला कपड़ा, कलश, आम के पत्ते, नारियल
  • देवता की मूर्ति या चित्र, रोली, अक्षत, चंदन, फूल, माला
  • हवन कुंड, आम की लकड़ी, हवन सामग्री, घी, कपूर
  • व्रत के अनुसार भोग (चूरमा, गुड़-चना, खीर-पूरी, पीली मिठाई)
  • दान के लिए वस्त्र, अनाज, फल और दक्षिणा

हर व्रत का उद्यापन थोड़ा अलग होता है, पर बुनियादी क्रम लगभग एक जैसा है:

  1. उद्यापन वाले दिन भी व्रत रखें। सुबह स्नान करके साफ़ या नए कपड़े पहनें।
  2. पूजा स्थान पर चौकी सजाएँ, कलश स्थापित करें और गणेश जी की पूजा से शुरुआत करें।
  3. संकल्प लें: "मैंने अमुक व्रत इतनी बार रखा, आज उसका उद्यापन कर रहा/रही हूँ, भगवान इसे स्वीकार करें।"
  4. व्रत के मुख्य देवता (शिव-पार्वती, विष्णु, संतोषी माता, बृहस्पति देव आदि) की षोडशोपचार या पंचोपचार पूजा करें।
  5. उस व्रत की कथा पढ़ें या सुनें।
  6. छोटा हवन करें। देवता के मंत्र से 108 या अपनी सामर्थ्य के अनुसार आहुतियाँ दें। घर पर हवन की विधि हवन विधि और सामग्री में देखें।
  7. आरती करें और भोग लगाएँ।
  8. ब्राह्मण, कन्याओं, सुहागिनों या बच्चों को (व्रत के अनुसार) आदर से भोजन कराएँ।
  9. दक्षिणा और दान दें, फिर स्वयं प्रसाद लेकर व्रत खोलें।

व्रत अनुसार अंतर

व्रतकब उद्यापनख़ास बातें
सोलह सोमवारसोलह सोमवार पूरे होने पर सत्रहवें सोमवारशिव-पार्वती पूजा, चूरमे (आटा, घी, गुड़) का भोग; चूरमा तीन हिस्सों में बाँटकर एक गाय, एक प्रसाद और एक स्वयं के लिए; कई घरों में जोड़े को भोजन
एकादशीसाल भर (24 या अधिक मास में 26) एकादशी के बाद, अक्सर मार्गशीर्ष मेंविष्णु-लक्ष्मी पूजा, तुलसी, हवन; द्वादशी को ब्राह्मण भोजन और दान
शुक्रवार संतोषी माता16 शुक्रवार के बाद अगले शुक्रवारगुड़-चने और खीर-पूरी का भोग; 8 बालकों को भोजन; उस दिन घर में कोई खट्टी चीज़ न बने, न किसी को दी जाए
गुरुवार (बृहस्पति)16 गुरुवार के बादपीले वस्त्र, चने की दाल, गुड़, केले का भोग; पीली वस्तुओं का दान
मंगलवार (हनुमान)21 मंगलवार के बादहनुमान जी को चोला, बूंदी या चूरमे का भोग; सुंदरकांड पाठ
करवा चौथपरिवार की परंपरा अनुसार, अक्सर कुछ साल बाद या व्रत छोड़ते समय13 सुहागिनों को भोजन, सास को बया (साड़ी, श्रृंगार, मिठाई)

इन व्रतों की कथाएँ यहाँ पढ़ें: सोलह सोमवार व्रत कथा और संतोषी माता व्रत कथा। एकादशी शुरू करने के नियम एकादशी व्रत कैसे शुरू करें में, और करवा चौथ की पूरी तैयारी करवा चौथ पूजा विधि और सामग्री में है।

दान और भोजन

उद्यापन में दान को "पूर्णता" का हिस्सा माना जाता है। क्या दान करें, यह व्रत के देवता पर निर्भर करता है: शिव व्रत में सफ़ेद वस्तुएँ (चावल, दूध, सफ़ेद कपड़ा), बृहस्पति व्रत में पीली वस्तुएँ (चने की दाल, हल्दी, पीला कपड़ा), संतोषी माता में गुड़-चना, एकादशी में अन्न, फल और वस्त्र। सुहाग के व्रतों में श्रृंगार सामग्री दान होती है।

भोजन किसे कराएँ, इसमें भी परिवारों की अलग रीत है: कहीं ब्राह्मण, कहीं कन्याएँ, कहीं सुहागिन जोड़े, कहीं बच्चे। संख्या को लेकर बहुत परेशान न हों। शास्त्र कहते हैं कि दान अपनी सामर्थ्य के भीतर और बिना दिखावे के होना चाहिए। किसी ज़रूरतमंद परिवार को भोजन या राशन देना भी उतना ही पुण्य है।

उद्यापन न कर पाएं तो

बहुत से लोग इस बात से डरते हैं कि उद्यापन नहीं किया तो व्रत का फल नहीं मिलेगा। ऐसा डर रखने की ज़रूरत नहीं।

  • पैसे या समय की कमी हो तो सादा उद्यापन करें: पूजा, कथा, एक दीपक, एक व्यक्ति को भोजन और थोड़ा दान। भाव ही मुख्य है।
  • बीमारी या किसी और कारण से ख़ुद न कर पाएँ तो घर का कोई सदस्य या पुरोहित आपके नाम से उद्यापन कर सकता है।
  • उद्यापन में देर हो जाए तो अगला शुभ दिन चुनकर कर लें; तब तक व्रत जारी रख सकते हैं।
  • संख्या में गलती हो गई हो (कोई व्रत छूट गया) तो एक व्रत और रखकर गिनती पूरी कर लें, फिर उद्यापन करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

व्रत का उद्यापन कब करना चाहिए?

व्रत की तय संख्या पूरी होने के बाद अगले उसी वार या तिथि को, शुभ मुहूर्त में। खरमास, पितृ पक्ष, होलाष्टक और ग्रहण के दिनों में उद्यापन नहीं किया जाता।

सोलह सोमवार का उद्यापन कैसे करें?

सत्रहवें सोमवार को व्रत रखकर शिव-पार्वती की पूजा, कथा और हवन करें, चूरमे का भोग लगाएँ और उसे तीन हिस्सों में बाँटें, फिर भोजन और दान करें।

संतोषी माता उद्यापन में क्या ध्यान रखें?

उस दिन घर में कोई खट्टी चीज़ न बने और न किसी को दी जाए। गुड़-चने और खीर-पूरी का भोग लगाकर 8 बालकों को भोजन कराने की परंपरा है।

क्या बिना उद्यापन के व्रत अधूरा रहता है?

परंपरा में उद्यापन को व्रत की पूर्णता माना गया है, पर सादगी से किया गया उद्यापन भी पूरा माना जाता है। देर हो जाए तो अगले शुभ दिन कर सकते हैं।

एकादशी का उद्यापन कब करें?

साल भर की एकादशी पूरी होने पर, अक्सर मार्गशीर्ष की उत्पन्ना एकादशी या किसी शुक्ल एकादशी को, और द्वादशी को ब्राह्मण भोजन और दान के साथ।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखक के बारे में

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा

वेद पण्डित, लेखक

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा जी वेद पण्डित और लेखक हैं। अनेक वर्षों से वे दुर्गा देवी की आराधना का अध्ययन और आचरण करते आ रहे हैं। पूजा विधि, मंत्रों और स्तोत्रों को सामान्य भक्तों के लिए सरलता से समझाना उनका लक्ष्य है। वे “श्री दुर्गा नित्याराधना” ग्रंथ के लेखक हैं। इस साइट के लेख उनकी रचनाएँ हैं, या उनके ग्रंथों पर आधारित हैं।

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