एक साल में 24 एकादशी होती हैं, क्योंकि हर हिंदू महीने में दो पक्ष हैं और दोनों की ग्यारहवीं तिथि एकादशी कहलाती है। जिस साल अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) पड़ता है, उसमें दो एकादशी और जुड़ती हैं, पद्मिनी और परमा, और संख्या 26 हो जाती है। हर एकादशी का अपना नाम, अपनी कथा और अपना फल बताया गया है। नीचे उत्तर भारत में चलने वाले पूर्णिमांत महीनों के हिसाब से पूरी सूची है।
एक साल में 24, अधिक मास में 26
चंद्र मास करीब साढ़े 29 दिन का होता है। पहला आधा, अमावस्या से पूर्णिमा तक, शुक्ल पक्ष है और दूसरा आधा, पूर्णिमा से अमावस्या तक, कृष्ण पक्ष। दोनों में एक-एक एकादशी आती है, तो 12 महीनों में 24।
चंद्र वर्ष सौर वर्ष से लगभग 11 दिन छोटा होता है। यह अंतर पूरा करने के लिए करीब हर तीसरे साल एक महीना जोड़ा जाता है, जिसे अधिक मास कहते हैं। उसकी दो एकादशियाँ पद्मिनी (शुक्ल) और परमा (कृष्ण) हैं। उदाहरण के लिए 2026 में ज्येष्ठ अधिक मास था, जिसमें पद्मिनी एकादशी 27 मई और परमा एकादशी 11 जून को पड़ी। इस साल की सभी तारीखें एकादशी कैलेंडर में देखें।
महीने के अनुसार एकादशी सूची
यह सूची पूर्णिमांत पंचांग की है, जो उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और आसपास चलता है। यहाँ महीना पूर्णिमा के अगले दिन से शुरू होता है, इसलिए हर महीने में पहले कृष्ण पक्ष आता है, फिर शुक्ल पक्ष।
| क्रम | महीना (पूर्णिमांत) | पक्ष | एकादशी | दूसरे नाम |
|---|---|---|---|---|
| 1 | चैत्र | कृष्ण | पापमोचनी | — |
| 2 | चैत्र | शुक्ल | कामदा | — |
| 3 | वैशाख | कृष्ण | वरूथिनी | — |
| 4 | वैशाख | शुक्ल | मोहिनी | — |
| 5 | ज्येष्ठ | कृष्ण | अपरा | अचला |
| 6 | ज्येष्ठ | शुक्ल | निर्जला | भीमसेनी |
| 7 | आषाढ़ | कृष्ण | योगिनी | — |
| 8 | आषाढ़ | शुक्ल | देवशयनी | हरिशयनी, पद्मा |
| 9 | श्रावण | कृष्ण | कामिका | — |
| 10 | श्रावण | शुक्ल | पुत्रदा | पवित्रा |
| 11 | भाद्रपद | कृष्ण | अजा | अन्नदा |
| 12 | भाद्रपद | शुक्ल | परिवर्तिनी | पार्श्व, वामन, जलझूलनी |
| 13 | आश्विन | कृष्ण | इंदिरा | — |
| 14 | आश्विन | शुक्ल | पापांकुशा | — |
| 15 | कार्तिक | कृष्ण | रमा | — |
| 16 | कार्तिक | शुक्ल | देवउठनी | प्रबोधिनी, देवोत्थान |
| 17 | मार्गशीर्ष | कृष्ण | उत्पन्ना | — |
| 18 | मार्गशीर्ष | शुक्ल | मोक्षदा | वैकुंठ एकादशी (दक्षिण में) |
| 19 | पौष | कृष्ण | सफला | — |
| 20 | पौष | शुक्ल | पुत्रदा | वैकुंठ एकादशी (कई क्षेत्रों में) |
| 21 | माघ | कृष्ण | षटतिला | — |
| 22 | माघ | शुक्ल | जया | भीष्म एकादशी |
| 23 | फाल्गुन | कृष्ण | विजया | — |
| 24 | फाल्गुन | शुक्ल | आमलकी | रंगभरी (काशी में) |
| 25 | अधिक मास | शुक्ल | पद्मिनी | कमला |
| 26 | अधिक मास | कृष्ण | परमा | — |
अमांत पंचांग वालों के लिए: गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में महीना अमावस्या के बाद शुरू होता है। वहाँ शुक्ल पक्ष की एकादशियों के महीने यही रहते हैं, लेकिन कृष्ण पक्ष वाली हर एकादशी एक महीना पहले के नाम से लिखी जाती है। जैसे पापमोचनी को वहाँ फाल्गुन कृष्ण एकादशी कहा जाता है। तिथि और दिन दोनों जगह एक ही होते हैं, सिर्फ़ महीने का नाम बदलता है।
सबसे प्रसिद्ध एकादशियाँ
- निर्जला (ज्येष्ठ शुक्ल): साल की सबसे कठिन एकादशी, बिना जल के। मान्यता है कि जो साल भर व्रत न रख सके, उसे अकेली निर्जला से सभी एकादशियों का फल मिलता है। भीमसेन की कथा निर्जला एकादशी व्रत कथा में पढ़ें।
- देवशयनी (आषाढ़ शुक्ल): इस दिन से भगवान विष्णु चार महीने के योगनिद्रा में जाते हैं और चातुर्मास शुरू होता है। विवाह जैसे मांगलिक काम रुक जाते हैं।
- देवउठनी (कार्तिक शुक्ल): भगवान जागते हैं, चातुर्मास खत्म होता है और तुलसी विवाह के साथ शादियों का मौसम खुलता है। तारीख प्रबोधिनी एकादशी पृष्ठ पर देखें।
- उत्पन्ना (मार्गशीर्ष कृष्ण): एकादशी देवी के प्रकट होने का दिन, इसलिए व्रत शुरू करने के लिए सबसे अच्छा। कथा एकादशी व्रत कथा में है।
- मोक्षदा (मार्गशीर्ष शुक्ल): इसी दिन गीता जयंती भी मनाई जाती है।
- षटतिला (माघ कृष्ण): तिल से स्नान, उबटन, हवन, तर्पण, भोजन और दान, ये छह प्रयोग इस दिन किए जाते हैं।
स्मार्त और वैष्णव एकादशी
कभी-कभी पंचांग में एक ही एकादशी दो दिन लिखी मिलती है। ऐसा तब होता है जब एकादशी तिथि सूर्योदय के समय दशमी से मिली हुई हो या दो सूर्योदयों को छू रही हो। तब गृहस्थ परिवार, जिन्हें स्मार्त कहा जाता है, पहले दिन व्रत रखते हैं। वैष्णव संप्रदाय, जैसे इस्कॉन और वल्लभ संप्रदाय के अनुयायी, दशमी-विद्ध एकादशी नहीं मानते और अगले दिन व्रत रखते हैं। दूसरे दिन वाली को गौण एकादशी भी कहा जाता है, जैसे 2027 में पौष पुत्रदा एकादशी 18 जनवरी और गौण पौष पुत्रदा 19 जनवरी को है। आप जिस परंपरा से जुड़े हैं, उसी के दिन व्रत रखें।
हर एकादशी का फल संक्षेप में
पुराणों में हर एकादशी की कथा के आखिर में उसका फल बताया गया है। ये कथाएँ ज़्यादातर पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण से ली जाती हैं, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को एक-एक एकादशी का माहात्म्य सुनाते हैं।
- पापमोचनी: अनजाने में हुए पापों से मुक्ति; मेधावी ऋषि और अप्सरा मंजुघोषा की कथा।
- कामदा: मनोकामना पूरी होना; गंधर्व ललित को शाप से मुक्ति मिली।
- वरूथिनी: रक्षा और सौभाग्य का व्रत।
- मोहिनी: मोह और भ्रम से छुटकारा; भगवान के मोहिनी रूप से जुड़ी।
- अपरा: अपार पुण्य देने वाली।
- निर्जला: सभी 24 एकादशियों के बराबर फल।
- योगिनी: रोग और शाप से मुक्ति; कुबेर के माली हेममाली की कथा।
- देवशयनी: चातुर्मास का आरंभ; राजा मान्धाता के राज्य में वर्षा की कथा।
- कामिका: तुलसी पूजा और दीपदान का विशेष फल।
- श्रावण पुत्रदा: संतान की कामना से रखी जाती है।
- अजा: कष्टों से उबरना; राजा हरिश्चंद्र की कथा।
- परिवर्तिनी: शयन में भगवान करवट बदलते हैं; वामन पूजा।
- इंदिरा: पितृ पक्ष में आती है, पितरों की सद्गति के लिए।
- पापांकुशा: पापों पर अंकुश, दशहरे के बाद।
- रमा: दिवाली से पहले, लक्ष्मी के नाम पर; सुख-समृद्धि।
- देवउठनी: मांगलिक कार्यों की शुरुआत, तुलसी विवाह।
- उत्पन्ना: एकादशी देवी का प्राकट्य; व्रत की शुरुआत।
- मोक्षदा: पितरों को मोक्ष; राजा वैखानस की कथा।
- सफला: कामों में सफलता; राजकुमार लुंपक की कथा।
- पौष पुत्रदा: संतान सुख; राजा सुकेतुमान की कथा।
- षटतिला: तिल दान से दरिद्रता दूर होना।
- जया: अधोगति से मुक्ति; माल्यवान और पुष्पवती की कथा।
- विजया: विजय; लंका जाने से पहले श्रीराम ने यह व्रत किया था।
- आमलकी: आँवले के पेड़ की पूजा; काशी में इसी दिन से होली का रंग शुरू होता है।
- पद्मिनी और परमा: अधिक मास की दुर्लभ एकादशियाँ, पुरुषोत्तम भगवान की पूजा का विशेष पुण्य।
किसी भी एकादशी पर क्या खाएँ और क्या नहीं, यह एकादशी में क्या खाएं में देखें, और पहली बार व्रत रख रहे हों तो एकादशी व्रत कैसे शुरू करें से शुरुआत करें।

