श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धा से किया गया कर्म। पितृ पक्ष के लगभग सोलह दिनों में परिवार अपने दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी और पूर्वजों को याद करके जल (तर्पण), पिंड और भोजन अर्पित करते हैं। यह पक्ष भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन अमावस्या पर पूरा होता है। हर पूर्वज का श्राद्ध उसकी मृत्यु-तिथि को, दोपहर के समय किया जाता है। इस साल पितृ पक्ष कब शुरू हो रहा है, यह पितृ पक्ष आरंभ पृष्ठ पर देखें।
पितृ पक्ष क्या है
पुराणों, ख़ासकर गरुड़ पुराण और विष्णु पुराण में बताया गया है कि इस पक्ष में पितर अपने वंशजों के घर की ओर आते हैं और उनके दिए जल और अन्न से तृप्त होते हैं। उत्तर भारत में इसे कनागत या महालय भी कहते हैं। पूर्णिमांत कैलेंडर में यह आश्विन का कृष्ण पक्ष है, जबकि दक्षिण के अमांत कैलेंडर में इसे भाद्रपद का कृष्ण पक्ष कहा जाता है; दिन वही हैं, बस महीने का नाम अलग।
श्राद्ध कौन करे? परंपरा में आम तौर पर पुत्र या पौत्र श्राद्ध करते हैं, पर पुत्र न हो तो पत्नी, पुत्री, भाई, भतीजा या कोई भी निकट परिजन श्रद्धा से कर सकता है। आज बहुत-सी बेटियाँ भी माता-पिता का श्राद्ध करती हैं। अपने परिवार की परंपरा और कुल पुरोहित की सलाह मानें।
श्राद्ध की तिथि कैसे तय करें
श्राद्ध अंग्रेज़ी तारीख़ से नहीं, हिंदू तिथि से होता है। जिस तिथि को व्यक्ति का देहांत हुआ था (शुक्ल या कृष्ण पक्ष चाहे जो हो), पितृ पक्ष में उसी तिथि को उसका श्राद्ध होगा। उदाहरण के लिए, किसी का देहांत किसी भी महीने की सप्तमी को हुआ हो तो पितृ पक्ष की सप्तमी को श्राद्ध। तिथि जानने के लिए मृत्यु की तारीख़ पंचांग में देखें।
- पूर्णिमा श्राद्ध: पूर्णिमा को देहांत वालों का, पक्ष के पहले दिन।
- मातृ नवमी: नवमी को माँ, दादी और उन सुहागिन स्त्रियों का श्राद्ध जिनका देहांत पति से पहले हुआ।
- द्वादशी: संन्यास ले चुके परिजनों का।
- चतुर्दशी: दुर्घटना, शस्त्र या अकाल मृत्यु वालों का।
- अमावस्या: जिनकी तिथि याद नहीं, या जिनका श्राद्ध किसी कारण छूट गया, उन सबका।
श्राद्ध का सबसे अच्छा समय दोपहर का कुतप काल (लगभग 11:30 से 12:30 के बीच) और अपराह्न माना जाता है। सुबह-सुबह या सूर्यास्त के बाद श्राद्ध नहीं किया जाता।
तर्पण विधि
तर्पण यानी पितरों को तिल मिला जल देना। पितृ पक्ष में कई लोग रोज़ तर्पण करते हैं, और श्राद्ध वाले दिन तो ज़रूर। सामग्री: तांबे या पीतल का लोटा, एक थाली या परात, काले तिल, जौ, कुश, सफ़ेद फूल, गंगाजल और साफ़ पानी।
- स्नान करके सफ़ेद या हल्के रंग के साफ़ कपड़े पहनें। दक्षिण दिशा की ओर मुँह करके बैठें; दक्षिण पितरों की दिशा मानी जाती है।
- दाहिने हाथ की अनामिका में कुश की पवित्री (अंगूठी) पहनें।
- जनेऊ पहनते हों तो उसे दाहिने कंधे पर कर लें (अपसव्य)। जो जनेऊ नहीं पहनते, वे गमछा इसी तरह डाल सकते हैं या बस श्रद्धा से तर्पण करें।
- लोटे में जल, काले तिल, जौ और थोड़ा गंगाजल मिलाएँ।
- हाथ में जल लेकर संकल्प करें: अपना नाम, गोत्र, और जिस पितर के लिए तर्पण कर रहे हैं उनका नाम और संबंध।
- अंजलि में तिल-जल लेकर अंगूठे और तर्जनी के बीच के भाग (पितृ तीर्थ) से थाली में धीरे-धीरे गिराएँ। हर पितर के नाम से तीन अंजलि दें: "अमुक गोत्र, अमुक नाम, पिता/माता, तृप्यताम्।"
- पहले पिता, दादा, परदादा, फिर माता, दादी, परदादी, फिर नाना-नानी पक्ष और अन्य परिजन, जिन्हें आप याद करना चाहें।
- आख़िर में उन सबके लिए जल दें जिनका कोई तर्पण करने वाला नहीं।
- थाली का जल किसी पीपल या पेड़ की जड़ में डाल दें, नाली में नहीं।
मंत्र न आते हों तो चिंता न करें। अपनी भाषा में नाम लेकर "आप तृप्त हों" कहना भी उतना ही मान्य है।
पंचबलि: गाय, कुत्ता, कौआ, देवता और चींटी
श्राद्ध के भोजन में से ब्राह्मण या अतिथि को खिलाने से पहले पाँच हिस्से निकाले जाते हैं, जिन्हें पंचबलि कहते हैं:
| बलि | किसके लिए | कहाँ रखें |
|---|---|---|
| गो बलि | गाय | पत्ते पर रखकर गाय को खिलाएँ |
| श्वान बलि | कुत्ता | घर के बाहर |
| काक बलि | कौआ | छत या मुंडेर पर |
| देव बलि | देवता | पत्ते पर रखकर अग्नि या पूजा स्थान पर |
| पिपीलिका बलि | चींटियाँ | जहाँ चींटियाँ आती हों |
उत्तर भारत में कौए को भोजन देने का बहुत महत्व है; माना जाता है कि कौआ पितरों तक संदेश पहुँचाता है। श्राद्ध के खाने में आम तौर पर खीर, पूरी, कद्दू या आलू की सब्ज़ी, उड़द की दाल के बड़े और पितर को जो पसंद था वह बनाया जाता है। इसके बाद ब्राह्मण, किसी ज़रूरतमंद या परिवार के बुज़ुर्ग को आदर से भोजन कराकर दक्षिणा दें।
पितृ पक्ष में क्या न करें
- शादी, सगाई, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे शुभ काम इन दिनों टाले जाते हैं।
- श्राद्ध के भोजन में प्याज़, लहसुन, मसूर दाल और बासी खाना न बनाएँ।
- लोहे के बर्तन की जगह पीतल, तांबे या पत्तल का इस्तेमाल करें।
- श्राद्ध करने वाला व्यक्ति उस दिन शराब, मांस और झगड़े से दूर रहे।
- कई परिवार इन दिनों नए कपड़े, गहने या बड़ी ख़रीदारी नहीं करते; यह परिवार की परंपरा पर है।
- किसी भिखारी या जानवर को द्वार से ख़ाली हाथ न लौटाएँ।
गया में पिंडदान
बिहार का गया पिंडदान के लिए सबसे प्रसिद्ध तीर्थ है। फल्गु नदी के किनारे, विष्णुपद मंदिर और अक्षयवट पर पिंडदान की परंपरा पुराणों में बताई गई है। पितृ पक्ष में यहाँ बहुत भीड़ होती है। एक दिन से लेकर सत्रह दिन तक के पिंडदान के विधान हैं। पंडों की व्यवस्था, ठहरने और ख़र्च के नियम हर साल बदलते हैं, इसलिए जाने से पहले स्थानीय प्रशासन या विश्वसनीय पुरोहित से पुष्टि कर लें। काशी, प्रयागराज, हरिद्वार और बद्रीनाथ का ब्रह्मकपाल भी पिंडदान के लिए जाने जाते हैं।
सर्वपितृ अमावस्या
पितृ पक्ष का आख़िरी दिन, आश्विन अमावस्या, सर्वपितृ या महालया अमावस्या कहलाता है। इस दिन उन सब पूर्वजों का श्राद्ध होता है जिनकी तिथि याद नहीं या जो छूट गए। शाम को घर के दरवाज़े पर दक्षिण दिशा में दीपक जलाकर पितरों को विदा करने की रीत है। तिथि सर्वपितृ अमावस्या पृष्ठ पर देखें। साल भर की अमावस्या पर भी तर्पण किया जा सकता है; उसके नियम अमावस्या के नियम और अमावस्या तिथियाँ पर देखें।

