पितृ पक्ष आरम्भ
पितृ पक्ष आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से शुरू होकर सर्वपितृ अमावस्या तक चलने वाले पंद्रह दिन हैं, जिनमें परिवार अपने दिवंगत पूर्वजों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं। इसे श्राद्ध पक्ष या महालय पक्ष भी कहते हैं। यह पृष्ठ पितृ पक्ष के पहले दिन के बारे में है।
क्या है और क्यों मनाते हैं
गरुड़ पुराण और अन्य ग्रंथों में मान्यता है कि इन दिनों पितर अपने वंशजों के पास आते हैं और श्रद्धा से दिया गया जल और अन्न स्वीकार करते हैं। "श्राद्ध" शब्द ही "श्रद्धा" से बना है। महाभारत में कर्ण की कथा आती है, जिन्हें स्वर्ग में भोजन की जगह सोना मिला, क्योंकि उन्होंने जीवन में पितरों के लिए अन्न दान नहीं किया था; इसलिए उन्हें पृथ्वी पर लौटकर श्राद्ध करने का अवसर मिला।
किस तिथि को
पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार आश्विन कृष्ण प्रतिपदा; अमांत पंचांग में यही भाद्रपद कृष्ण प्रतिपदा कहलाती है। कई परिवार एक दिन पहले भाद्रपद पूर्णिमा को पूर्णिमा श्राद्ध से ही पितृ पक्ष की शुरुआत मानते हैं। यह पखवाड़ा महालया अमावस्या (सर्वपितृ अमावस्या) पर समाप्त होता है। जिस तिथि को किसी की मृत्यु हुई थी, उसी तिथि को उनका श्राद्ध होता है; श्राद्ध के लिए दोपहर का कुतुप और रौहिण मुहूर्त उत्तम है।
कैसे मनाते हैं
- रोज़ सुबह दक्षिण की ओर मुख करके जल, काले तिल और कुश से तर्पण।
- तिथि वाले दिन खीर, पूड़ी, सब्ज़ी का भोजन; पहला भाग गाय, कुत्ते, कौवे और चींटियों के लिए।
- ब्राह्मण भोजन और दक्षिणा, या ज़रूरतमंदों को अन्न-वस्त्र का दान।
- इन दिनों नए कपड़े, गृह प्रवेश और विवाह जैसे मांगलिक काम टाले जाते हैं।
पूरी विधि पितृ पक्ष श्राद्ध विधि में है। गया (बिहार), प्रयागराज, हरिद्वार और वाराणसी में पिंडदान के लिए बड़ी संख्या में लोग जाते हैं। अमावस्या से जुड़े नियम अमावस्या के नियम में पढ़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
पितृ पक्ष कब शुरू होता है?
पितृ पक्ष कितने दिन का होता है?
श्राद्ध किस दिन करें?
पितृ पक्ष में क्या नहीं करना चाहिए?
श्राद्ध में कौवे को भोजन क्यों देते हैं?
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