अधिक मास हिंदू पंचांग का वह अतिरिक्त चंद्र महीना है जो लगभग हर ढाई-तीन साल में एक बार जुड़ता है, ताकि चंद्र वर्ष और सौर वर्ष का हिसाब बराबर रहे। नियम सीधा है: जिस चंद्र महीने में सूर्य एक भी बार राशि नहीं बदलता, यानी कोई संक्रांति नहीं पड़ती, वही अधिक मास होता है। इसे पुरुषोत्तम मास और मलमास भी कहते हैं। इसमें विवाह जैसे मांगलिक काम नहीं होते, पर विष्णु भक्ति, जप और दान का फल कई गुना माना जाता है।
अधिक मास क्यों आता है: चंद्र और सौर वर्ष का अंतर
हमारे व्रत-त्योहार चंद्रमा की तिथियों से चलते हैं। एक चंद्र मास (अमावस्या से अमावस्या) लगभग साढ़े उनतीस दिन का होता है, तो बारह चंद्र महीने मिलकर करीब 354 दिन बनाते हैं। पर ऋतुएँ सूर्य से चलती हैं और सौर वर्ष लगभग 365 दिन का है। हर साल करीब 11 दिन का अंतर बचता है।
अगर यह अंतर ऐसे ही जुड़ता रहे तो कुछ सालों में होली सर्दी में और दिवाली बरसात में आने लगे। ऐसा न हो, इसलिए जब अंतर एक महीने के बराबर हो जाता है तो पंचांग में एक महीना जोड़ दिया जाता है। इसी वजह से हमारे त्योहार हर साल अंग्रेज़ी तारीख में 10-20 दिन आगे-पीछे होते रहते हैं, पर अपने मौसम से नहीं हटते।
कौन-सा महीना अधिक होगा, यह कैसे तय होता है
सूर्य हर लगभग 30 दिन में राशि बदलता है और चंद्र मास 29.5 दिन का होता है। इसलिए कभी-कभी पूरा एक चंद्र मास दो संक्रांतियों के बीच में "फँस" जाता है और उसमें कोई संक्रांति नहीं पड़ती। वही महीना अधिक मास कहलाता है और उसे अगले महीने का नाम मिलता है, जैसे "अधिक ज्येष्ठ", फिर उसके बाद असली महीना "निज ज्येष्ठ" आता है।
उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग में इसे देखना थोड़ा अलग लगता है। यहाँ महीना पूर्णिमा पर बदलता है, इसलिए पहले निज महीने का कृष्ण पक्ष आता है, फिर पूरा अधिक मास (शुक्ल और कृष्ण पक्ष), और उसके बाद निज महीने का शुक्ल पक्ष। महीनों के इस हिसाब को पूर्णिमांत और अमांत का अंतर वाले लेख में विस्तार से समझाया गया है।
कितने साल में आता है
औसतन अधिक मास 32-33 महीने में एक बार आता है। उन्नीस सालों में ऐसे सात महीने जुड़ते हैं। ज़्यादातर अधिक मास चैत्र से आश्विन के बीच के महीनों में पड़ते हैं; कार्तिक, मार्गशीर्ष और पौष लगभग कभी अधिक नहीं होते, क्योंकि उन दिनों सूर्य तेज़ चलता है और हर चंद्र मास में संक्रांति आ ही जाती है।
हाल का उदाहरण: 2026 में ज्येष्ठ अधिक मास था। नई दिल्ली के पंचांग में उसकी पूर्णिमा 31 मई को पड़ी, और उसी महीने की दो एकादशियाँ — पद्मिनी (27 मई) और परमा (11 जून) — मनाई गईं। ये दोनों एकादशियाँ सिर्फ अधिक मास में ही आती हैं। हर महीने की तिथियाँ आप मासिक कैलेंडर में और रोज़ की तिथि-संक्रांति आज के पंचांग में देख सकते हैं।
पुरुषोत्तम मास नाम की कथा
पुरुषोत्तम मास माहात्म्य में एक कथा आती है। जब यह अतिरिक्त महीना बना तो इसका कोई स्वामी देवता नहीं था। बाकी बारह महीनों के अपने-अपने देवता थे, पर इसे सबने "मलमास" कहकर ठुकरा दिया, क्योंकि इसमें कोई शुभ काम नहीं होता था। दुखी होकर यह महीना वैकुंठ में भगवान विष्णु के पास पहुँचा और अपनी व्यथा सुनाई।
भगवान उसे गोलोक में श्रीकृष्ण के पास ले गए। श्रीकृष्ण ने कहा, "आज से इस महीने का स्वामी मैं हूँ। मेरा नाम पुरुषोत्तम है, यह महीना भी पुरुषोत्तम मास कहलाएगा। इसमें जो मेरी भक्ति, जप और दान करेगा, उसे बाकी महीनों से कहीं अधिक पुण्य मिलेगा।" तब से जिस महीने को कोई नहीं अपनाता था, वह भक्ति का सबसे प्रिय महीना बन गया। इस कथा का रोज़ एक अध्याय पढ़ने की परंपरा कई घरों में है।
अधिक मास में क्या करें
- विष्णु और कृष्ण की पूजा: रोज़ सुबह तुलसी दल के साथ पूजा, और "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जप।
- कथा और पाठ: पुरुषोत्तम मास माहात्म्य, श्रीमद्भागवत या गीता का पाठ। कई मोहल्लों में महीने भर की भागवत कथा बैठती है।
- दीपदान: शाम को तुलसी के पास और मंदिर में घी का दीपक।
- मालपुए का दान: यूपी, बिहार और मध्य प्रदेश में अधिक मास में काँसे के बर्तन में 33 मालपुए रखकर दान करने की पुरानी रीति है। कई घरों में यह दान दामाद को दिया जाता है, जिसे विष्णु रूप मानकर सम्मान दिया जाता है।
- व्रत: पद्मिनी और परमा एकादशी, और जो रख सकें वे पूरे महीने एक समय भोजन का नियम।
- तीर्थ स्नान और दान: अन्न, वस्त्र और जल-पात्र का दान।
अधिक मास में क्या न करें
- विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, मुंडन, जनेऊ जैसे संस्कार।
- नए घर की नींव, नया व्यापार या बड़ी नई शुरुआत।
- कोई नया काम्य व्रत शुरू करना या पुराने व्रत का उद्यापन।
- सालाना त्योहार अधिक मास में नहीं, निज मास में ही मनाए जाते हैं।
रोज़ की पूजा, पहले से चल रहे व्रत, इलाज, नौकरी और ज़रूरी खरीदारी जारी रहती है। यह ठीक वैसा ही है जैसा खरमास में होता है, पर दोनों अलग चीज़ें हैं: खरमास सूर्य के धनु या मीन में रहने से हर साल आता है, जबकि अधिक मास पूरा एक अतिरिक्त चंद्र महीना है।
क्षय मास
अधिक मास का उल्टा है क्षय मास। अगर किसी चंद्र महीने में दो संक्रांतियाँ पड़ जाएँ, तो एक महीना "घट" जाता है और उसे क्षय मास कहते हैं। ऐसा तभी हो सकता है जब सूर्य सबसे तेज़ चलता है, यानी कार्तिक से माघ के बीच। यह बहुत दुर्लभ है और कई दशकों में एक बार होता है। जिस साल क्षय मास होता है, उस साल हिसाब बराबर करने के लिए उससे पहले और बाद में एक-एक अधिक मास भी आता है।
तिथियाँ भी इसी तरह कभी घटती-बढ़ती हैं; उसकी पूरी बात तिथि क्षय और वृद्धि में है। हिंदू महीनों के नाम और उनके अंग्रेज़ी महीनों से मेल के लिए हिंदू कैलेंडर के 12 महीने पढ़ें।

