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हरतालिका तीज व्रत कथा: सखियों द्वारा पार्वती का हरण और बालू का शिवलिंग

संक्षेप में:हरतालिका तीज भाद्रपद शुक्ल तृतीया को रखी जाती है। कथा के अनुसार पार्वती की सखियाँ उन्हें जंगल ले गईं ताकि पिता उनका विवाह विष्णु से न कर दें; वहाँ बालू का शिवलिंग बनाकर निर्जल व्रत और रात्रि जागरण करने पर शिव ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया।

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हरतालिका तीज का व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को रखा जाता है, गणेश चतुर्थी से ठीक एक दिन पहले। सुहागिन महिलाएँ अखंड सौभाग्य के लिए और कुँवारी कन्याएँ मनचाहे वर के लिए यह व्रत निर्जल रखती हैं। शाम को बालू या मिट्टी से शिवलिंग और पार्वती की प्रतिमा बनाकर पूजा होती है, रात भर जागरण होता है और अगली सुबह पूजा करके व्रत खोला जाता है। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश और राजस्थान में यह तीजों में सबसे कठिन मानी जाती है।

हरतालिका तीज व्रत कथा

यह कथा स्वयं भगवान शिव ने माता पार्वती को उनका पिछला जन्म याद दिलाते हुए सुनाई थी। परंपरा इसे शिव पुराण और भविष्योत्तर पुराण से जोड़ती है।

शिव जी बोले, "देवी, तुम्हें याद है? पर्वतराज हिमालय के घर जन्म लेने के बाद तुमने बचपन से ही मुझे पति रूप में पाने का संकल्प कर लिया था। हिमालय की गंगा-तट वाली कंदराओं में तुमने बरसों कठोर तप किया। कभी केवल सूखे पत्ते खाए, कभी केवल हवा पर रहीं। जाड़े में बर्फ़ीले पानी में खड़ी रहीं, गर्मी में पंचाग्नि के बीच बैठीं, बरसात में खुले आसमान के नीचे भीगती रहीं।"

"तुम्हारे पिता हिमवान बेटी का यह कष्ट देखकर बहुत दुखी रहते थे। एक दिन देवर्षि नारद उनके पास आए और बोले कि भगवान विष्णु आपकी पुत्री से विवाह करना चाहते हैं। हिमवान यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्हें लगा कि इससे अच्छा वर बेटी के लिए कहाँ मिलेगा। उन्होंने हाँ कह दी।"

"जब तुम्हें यह बात पता चली, तो तुम बहुत व्याकुल हो गईं। तुम्हारा मन तो मुझ पर टिका था। तुमने अपनी सखियों से अपना दुख कहा और यहाँ तक कह दिया कि अगर ज़बरदस्ती विवाह हुआ तो प्राण त्याग दूँगी।"

"तब तुम्हारी सखियों ने एक उपाय निकाला। वे चुपके से तुम्हें पिता के महल से निकालकर घने जंगल में ले गईं, जहाँ कोई ढूँढ न सके। सखियों द्वारा हरण किए जाने के कारण ही इस व्रत का नाम हरतालिका पड़ा: 'हरत' यानी हरण करना और 'आलिका' यानी सखी।"

"जंगल में एक नदी के किनारे गुफा थी। वहाँ तुमने फिर से मेरी आराधना शुरू की। भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन, हस्त नक्षत्र में, तुमने नदी की बालू से एक शिवलिंग बनाया, बिना अन्न-जल के पूरे दिन मेरी पूजा की और रात भर जागकर भजन गाती रहीं। तुम्हारे तप से मेरा आसन डोल गया। मैं वहाँ प्रकट हुआ और तुमसे वर माँगने को कहा। तुमने कहा कि आप मुझे पत्नी रूप में स्वीकार करें। मैंने 'तथास्तु' कहा और कैलाश लौट आया।"

"अगली सुबह तुमने पूजा का सारा सामान और वह बालू का शिवलिंग नदी में प्रवाहित किया और सखियों के साथ व्रत का पारण किया। उधर हिमवान बेटी को खोजते-खोजते उसी जंगल में पहुँच गए। तुम्हें देखकर वे रो पड़े और घर छोड़ने का कारण पूछा। तुमने साफ़ कहा कि आप मेरा विवाह विष्णु जी से करना चाहते थे, पर मैं केवल महादेव को पति मानती हूँ। अगर आप वचन दें कि मेरा विवाह शिव से होगा, तभी घर चलूँगी।"

"हिमवान ने बेटी की बात मान ली। वे तुम्हें घर ले गए और कुछ समय बाद शास्त्र-विधि से हमारा विवाह हुआ।"

कथा के अंत में शिव जी ने कहा कि जो स्त्री इस दिन श्रद्धा से यह व्रत रखेगी, बालू या मिट्टी के शिवलिंग और पार्वती की पूजा करेगी और रात्रि जागरण करेगी, उसका सौभाग्य अटल रहेगा और कुँवारी कन्याओं को मनचाहा वर मिलेगा। इसी विश्वास के साथ आज भी घर-घर में फुलेरा सजाया जाता है और रात भर तीज के गीत गाए जाते हैं।

हरतालिका तीज पूजा विधि

  1. सरगी और संकल्प: कई घरों में सूर्योदय से पहले हल्का भोजन या फल लिया जाता है। फिर स्नान करके निर्जल व्रत का संकल्प लें।
  2. शृंगार: दोपहर बाद नहा-धोकर हाथों में मेहंदी, हरी या लाल चूड़ियाँ, सिंदूर और नए कपड़े पहनें। बिहार-पूर्वांचल में मायके से आई साड़ी पहनने का चलन है।
  3. फुलेरा और प्रतिमा: केले के पत्तों और फूलों से फुलेरा (मंडप) सजाएँ। बालू या काली मिट्टी से शिवलिंग, पार्वती और गणेश की प्रतिमा बनाएँ।
  4. प्रदोष काल पूजा: सूर्यास्त के बाद गणेश, फिर शिव-पार्वती की पूजा करें। शिव जी को बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल और पार्वती जी को सुहाग का पूरा सामान चढ़ाएँ।
  5. कथा: पूजा के बाद हरतालिका की कथा सुनें या पढ़ें, फिर आरती करें।
  6. रात्रि जागरण: रात भर भजन-कीर्तन करें। हर पहर (लगभग तीन घंटे) में एक बार शिव-पार्वती की पूजा और आरती करने का विधान है।
  7. पारण: अगली सुबह स्नान करके पूजा करें, सुहाग का सामान किसी सुहागिन या सास को दें, प्रतिमा को नदी, तालाब या घर के गमले में विसर्जित करें, फिर जल और प्रसाद लेकर व्रत खोलें।

नियम और सावधानियाँ

  • एक बार यह व्रत शुरू करें तो परंपरा के अनुसार इसे हर साल रखा जाता है; असमर्थ होने पर उद्यापन करके छोड़ा जाता है।
  • रात को सोने से बचें; जागरण इस व्रत का अहम हिस्सा है।
  • गर्भवती, बीमार या बुज़ुर्ग महिलाएँ जल और फल लेकर व्रत रख सकती हैं।
  • उद्यापन में सोलह सुहागिनों को सुहाग का सामान और भोजन देने की रीत है।

इस साल की तिथि और पूजा मुहूर्त हरतालिका तीज के पृष्ठ पर देखें। सावन में आने वाली तीज की कहानी हरियाली तीज कथा में और भादो कृष्ण पक्ष की तीज की कहानी कजरी तीज व्रत कथा में पढ़ें। अगले दिन गणेश पूजा के लिए गणेश चतुर्थी कथा देखें, और जागरण में शिव जी की आरती ज़रूर गाएँ।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हरतालिका नाम क्यों पड़ा?

पार्वती की सखियाँ उन्हें पिता के घर से हरकर जंगल ले गई थीं। 'हरत' यानी हरण और 'आलिका' यानी सखी, इसी से हरतालिका नाम बना।

हरतालिका तीज कब मनाई जाती है?

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को, गणेश चतुर्थी से एक दिन पहले। सटीक तारीख पंचांग में देखें।

क्या हरतालिका तीज में पानी पी सकते हैं?

परंपरा में यह निर्जल व्रत है, पर बीमार, गर्भवती या बुज़ुर्ग महिलाएँ बड़ों की अनुमति से जल और फल लेकर व्रत रख सकती हैं।

हरतालिका तीज का पारण कब होता है?

रात्रि जागरण के बाद अगली सुबह स्नान, पूजा और प्रतिमा विसर्जन करके व्रत खोला जाता है।

क्या कुँवारी लड़कियाँ हरतालिका तीज रख सकती हैं?

हाँ, कथा में पार्वती ने स्वयं अविवाहित रहते हुए यह व्रत किया था, इसलिए कुँवारी कन्याएँ अच्छे वर की कामना से इसे रखती हैं।