हरियाली तीज कथा: 108 जन्मों का तप और सावन में शिव-पार्वती मिलन
संक्षेप में:हरियाली तीज सावन शुक्ल तृतीया को मनाई जाती है। कथा के अनुसार पार्वती ने 107 जन्मों तक तप किया और 108वें जन्म में हिमालय की पुत्री बनकर कठोर तपस्या की, जिसके बाद सावन की इसी तीज पर शिव ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया।
हरियाली तीज सावन (श्रावण) मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है, नाग पंचमी से दो दिन पहले। इसे छोटी तीज, सिंधारा तीज या श्रावणी तीज भी कहते हैं। मान्यता है कि इसी दिन लंबे तप के बाद माता पार्वती का भगवान शिव से मिलन हुआ था, इसलिए सुहागिनें अखंड सौभाग्य के लिए और कुँवारी लड़कियाँ अच्छे वर के लिए शिव-पार्वती की पूजा करती हैं। हरे कपड़े, हरी चूड़ियाँ, मेहंदी, झूले और सावन के गीत इस त्योहार की पहचान हैं।
हरियाली तीज की कथा
एक बार कैलाश पर्वत पर माता पार्वती ने भगवान शिव से पूछा, "प्रभु, मैंने ऐसा कौन-सा पुण्य किया था कि आप मुझे पति रूप में मिले?" शिव जी मुस्कुराए और बोले, "देवी, तुम्हें अपना पिछला सब कुछ याद नहीं है। सुनो, मैं बताता हूँ।"
"दक्ष की पुत्री सती के रूप में तुम मेरी पत्नी थीं। पिता के यज्ञ में मेरा अपमान सह न सकने के कारण तुमने वहीं देह त्याग दी। उसके बाद मुझे फिर से पाने के लिए तुमने एक के बाद एक जन्म लिए। कहते हैं, एक सौ सात जन्मों तक तुमने तप किया, पर हर बार कुछ न कुछ अधूरा रह गया।"
"एक सौ आठवें जन्म में तुम पर्वतराज हिमालय और रानी मैना की बेटी बनकर आईं। बचपन से ही तुम्हारे मन में केवल मेरा ध्यान था। बड़ी होने पर तुमने हिमालय की तलहटी में घोर तप शुरू किया। धूप, बारिश, बर्फ़, किसी की परवाह नहीं की। अन्न छोड़ा, फिर फल छोड़े, फिर पत्ते भी छोड़ दिए। इसीलिए तुम्हारा एक नाम अपर्णा भी पड़ा, यानी जिसने पत्ते तक त्याग दिए।"
"तुम्हारी परीक्षा लेने मैं स्वयं वेश बदलकर आया और अपनी ही बुराई करने लगा। मैंने कहा कि वह शिव तो श्मशान में रहता है, शरीर पर भस्म लगाता है, गले में साँप डालता है, उसके पास न घर है न धन। तुम क्रोधित हो गईं और बोलीं कि मुझे शिव के सिवा कोई स्वीकार नहीं, चाहे जितने जन्म लेने पड़ें। तुम्हारी यह अटल निष्ठा देखकर मेरा हृदय भर आया।"
"सावन का महीना था। धरती हरी-भरी थी, आसमान में बादल छाए थे। श्रावण शुक्ल तृतीया के दिन मैं तुम्हारे सामने अपने असली रूप में प्रकट हुआ और तुम्हें पत्नी के रूप में स्वीकार करने का वचन दिया। उसके बाद तुम्हारे माता-पिता की सहमति से हमारा विवाह हुआ।"
शिव जी ने आगे कहा, "जिस दिन तुम्हारा तप पूरा हुआ, वह दिन सावन की हरियाली के बीच आया था, इसलिए इसे हरियाली तीज कहते हैं। जो स्त्री इस दिन श्रद्धा से व्रत रखकर हम दोनों की पूजा करेगी और यह कथा सुनेगी, उसके दांपत्य में प्रेम और सुख बना रहेगा।"
पार्वती जी ने यह सुनकर संसार की सभी स्त्रियों के लिए आशीर्वाद माँगा। तभी से सावन की इस तीज पर स्त्रियाँ पार्वती जी के तप को याद करती हैं, उनकी तरह सोलह शृंगार करती हैं और झूले पर बैठकर उनके मिलन की खुशी के गीत गाती हैं।
राजस्थान में इसी दिन तीज माता की सवारी निकलती है; जयपुर में तीज माता को पालकी में बिठाकर शहर में घुमाया जाता है, और वहाँ इस कथा को पार्वती के ससुराल जाने के उत्सव से भी जोड़ा जाता है। ब्रज में इस दिन ठाकुर जी को सोने-चाँदी के हिंडोलों में झुलाया जाता है।
सिंधारा की परंपरा
तीज से एक दिन पहले या उसी दिन मायके से बेटी के लिए सिंधारा (सिंजारा) आता है। इसमें घेवर, फेनी, मिठाई, मेहंदी, हरी चूड़ियाँ, लहरिया साड़ी या सूट और सुहाग का सामान होता है। नई ब्याही बेटियाँ पहली तीज अक्सर मायके में मनाती हैं। तीज से पहले की शाम को मेहंदी लगाई जाती है, जिसे सिंजारा की रात भी कहते हैं।
हरियाली तीज पूजा विधि
- संकल्प: सुबह स्नान करके शिव-पार्वती का ध्यान करें और व्रत का संकल्प लें। कई जगह यह निर्जल रखा जाता है, कई जगह फलाहार; अपने घर की परंपरा मानें।
- शृंगार: हरे या लहरिया कपड़े, हरी चूड़ियाँ, मेहंदी, बिंदी, सिंदूर समेत सोलह शृंगार करें।
- पूजा की तैयारी: चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर मिट्टी या धातु की शिव-पार्वती और गणेश की प्रतिमा रखें। बेलपत्र, धतूरा, फूल, फल, घेवर और सुहाग की पिटारी रखें।
- पूजा: पहले गणेश जी, फिर शिव जी को जल-बेलपत्र और पार्वती जी को सुहाग का सामान चढ़ाएँ।
- कथा: शाम को सखियों या परिवार की महिलाओं के साथ बैठकर हरियाली तीज की कथा सुनें और आरती करें।
- झूला और गीत: पेड़ पर या आँगन में झूला डालकर सावन के गीत गाएँ।
- पारण: शाम की पूजा के बाद या चंद्र दर्शन के बाद (अपने क्षेत्र की रीत के अनुसार) प्रसाद लेकर व्रत खोलें। सास को बया (सुहाग का सामान और मिठाई) देकर आशीर्वाद लें।
नियम और सावधानियाँ
- इस दिन काले और सफ़ेद कपड़ों से परहेज़ किया जाता है।
- मन में क्रोध या कलह न लाएँ; यह मिलन और प्रेम का पर्व है।
- बीमार या गर्भवती महिलाएँ फलाहार से व्रत रखें।
- घेवर और मिठाई पहले शिव-पार्वती को भोग लगाकर ही बाँटी जाती है।
इस साल की तिथि हरियाली तीज के पृष्ठ पर देखें। इसके बाद भादो में आने वाली दो तीजों की कथाएँ कजरी तीज व्रत कथा और हरतालिका तीज व्रत कथा में पढ़ें। सावन में सुहागिनें मंगलवार को मंगला गौरी व्रत भी रखती हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
हरियाली तीज क्यों मनाई जाती है?
मान्यता है कि सावन शुक्ल तृतीया को पार्वती जी का लंबा तप पूरा हुआ और शिव जी ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया। उसी मिलन की याद में यह तीज मनाई जाती है।
पार्वती ने कितने जन्म तप किया था?
लोक कथा के अनुसार पार्वती ने 107 जन्मों तक तप किया और 108वें जन्म में हिमालय की पुत्री के रूप में शिव को प्राप्त किया।
सिंधारा या सिंजारा क्या है?
तीज पर मायके से बेटी को भेजा जाने वाला उपहार, जिसमें घेवर, मिठाई, मेहंदी, चूड़ियाँ, कपड़े और सुहाग का सामान होता है।
हरियाली तीज पर हरा रंग क्यों पहनते हैं?
सावन में चारों ओर फैली हरियाली और सौभाग्य के प्रतीक के रूप में हरे कपड़े और हरी चूड़ियाँ पहनी जाती हैं।
क्या हरियाली तीज निर्जल व्रत है?
कई घरों में यह निर्जल रखा जाता है और कई जगह फलाहार के साथ। हरतालिका तीज की तुलना में इसके नियम आम तौर पर हल्के माने जाते हैं।
