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कजरी तीज व्रत कथा: गरीब ब्राह्मण और सत्तू की कहानी, नीमड़ी पूजा

संक्षेप में:कजरी तीज (बड़ी या सातुड़ी तीज) भाद्रपद कृष्ण तृतीया को मनाई जाती है। इसकी कथा उस गरीब ब्राह्मण की है जो पत्नी के व्रत के लिए साहूकार की दुकान से सत्तू बनाकर ले जाते पकड़ा गया और अपनी सच्चाई से साहूकार का मन जीत लिया; व्रत नीमड़ी पूजा और चंद्र अर्घ्य के बाद सत्तू से खोला जाता है।

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कजरी तीज भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है, रक्षाबंधन के तीन दिन बाद। इसे बड़ी तीज, बूढ़ी तीज और सातुड़ी तीज भी कहते हैं। सुहागिनें पति की लंबी उम्र के लिए और कुँवारी लड़कियाँ अच्छे वर के लिए दिन भर उपवास रखती हैं, शाम को नीमड़ी माता की पूजा करती हैं, गरीब ब्राह्मण और सत्तू की कथा सुनती हैं और रात को चाँद को अर्घ्य देकर सत्तू से व्रत खोलती हैं। राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश, खासकर मिर्ज़ापुर और वाराणसी में, इसकी बड़ी धूम रहती है।

कजरी तीज व्रत कथा

किसी गाँव में एक गरीब ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ रहता था। घर में इतना ही अनाज आता था कि किसी तरह गुज़ारा हो जाए। भादो के कृष्ण पक्ष की तीज आई, तो ब्राह्मणी ने हर साल की तरह तीज माता का व्रत रखा।

दोपहर को उसने पति से कहा, "आज मेरा तीज का व्रत है। शाम को पूजा के लिए और व्रत खोलने के लिए चने का सत्तू चाहिए। कहीं से थोड़ा सत्तू ले आइए।" ब्राह्मण का मन भारी हो गया। उसके पास एक पैसा भी नहीं था। उसने कहा, "भाग्यवान, सत्तू कहाँ से लाऊँ? घर में तो कुछ भी नहीं।" ब्राह्मणी बोली, "मुझे नहीं पता, चाहे चोरी करो या डाका डालो, पर व्रत खोलने को सत्तू चाहिए।" उसका मन व्रत में इतना लगा था कि वह बिना सत्तू के पूजा अधूरी मान रही थी।

रात हो गई। ब्राह्मण बेचारा घर से निकला और गाँव के एक साहूकार की दुकान पर पहुँचा। दुकान बंद थी, नौकर सो रहे थे। ब्राह्मण चुपके से भीतर गया। उसने वहाँ रखे चने, घी और शक्कर में से सवा सेर का अंदाज़ा लगाकर तौला और बैठकर सत्तू तैयार किया। वह पोटली बाँधकर निकलने ही वाला था कि आहट से नौकर जाग गए और "चोर, चोर" चिल्लाते हुए उसे पकड़ लिया।

शोर सुनकर साहूकार भी आ गया। उसने ब्राह्मण से पूछा कि रात को उसकी दुकान में क्या कर रहा था। ब्राह्मण ने हाथ जोड़कर कहा, "सेठ जी, मैं चोर नहीं हूँ। मेरी पत्नी ने आज तीज का व्रत रखा है। उसे पूजा और व्रत खोलने के लिए सत्तू चाहिए था। मेरे पास पैसे नहीं थे, इसलिए मैं यहाँ से सवा सेर सत्तू बनाकर ले जा रहा था। इसके सिवा मैंने कुछ नहीं छुआ।"

साहूकार ने उसकी तलाशी ली। सचमुच उसके पास सत्तू की एक पोटली के सिवा कुछ नहीं निकला। ब्राह्मण की सच्चाई और उसकी पत्नी की श्रद्धा देखकर साहूकार का मन पिघल गया। उसने कहा, "पंडित जी, आज से आपकी पत्नी को मैं अपनी धर्म-बहन मानता हूँ।" उसने ब्राह्मण को सत्तू के साथ गहने, कपड़े, मेहंदी, रुपये और सुहाग का पूरा सामान दिया और अपने नौकरों के साथ आदर से घर भेजा।

घर पहुँचकर ब्राह्मण ने सारी बात बताई। ब्राह्मणी ने तीज माता और नीमड़ी माता की पूजा की, कथा कही, चाँद को अर्घ्य दिया और सत्तू खाकर व्रत खोला। उस दिन के बाद उनके घर में कभी कमी नहीं रही।

कथा के अंत में महिलाएँ कहती हैं, "हे तीज माता, जैसे ब्राह्मणी के दिन फिरे, वैसे सबके दिन फिरें।" कहानी की सीख यह भी है कि सच्चाई से बोला गया सच सबसे कठोर आदमी का मन भी बदल देता है।

नीमड़ी माता और कजरी का नाम

राजस्थान और मालवा में इस दिन नीमड़ी माता (नीम की डाल) की पूजा होती है। आँगन में मिट्टी और गोबर से एक छोटा तालाब (तलैया) बनाया जाता है, उसके किनारे नीम की टहनी रोपी जाती है और तालाब में कच्चा दूध और जल भरा जाता है। पूजा के बाद महिलाएँ उस पानी में दीये की लौ, नथ का मोती, नींबू, ककड़ी और गहनों की परछाई देखती हैं।

पूर्वी उत्तर प्रदेश में इस तीज का नाम कजरी गीतों से जुड़ा है। मिर्ज़ापुर और वाराणसी में सावन-भादो की रातों में महिलाएँ झुंड में घूम-घूमकर कजरी गाती हैं, जिनमें बादल, विरह और मायके की याद होती है। एक लोक मान्यता कजरी को कजली वन और राजा दादुराय की रानी के विरह से भी जोड़ती है।

कजरी तीज पूजा विधि

  1. संकल्प: सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लें। ज़्यादातर महिलाएँ चाँद निकलने तक निर्जल रहती हैं।
  2. सत्तू तैयार करना: दिन में चने, जौ या गेहूँ के सत्तू में घी और शक्कर मिलाकर पिंड (लड्डू) बनाएँ। इसे सातुड़ी कहा जाता है।
  3. नीमड़ी स्थापना: शाम को मिट्टी-गोबर की तलैया बनाकर किनारे नीम की टहनी लगाएँ और दीवार पर रोली-मेहंदी-काजल की तेरह-तेरह बिंदियाँ लगाएँ।
  4. पूजा: नीमड़ी माता को जल, रोली, अक्षत, मौली, मेहंदी, फल और सत्तू चढ़ाएँ। तलैया में दीये और गहनों की परछाई देखें।
  5. कथा: हाथ में गेहूँ के दाने लेकर गरीब ब्राह्मण और सत्तू की कथा सुनें, फिर आरती करें।
  6. चंद्र अर्घ्य: चाँद निकलने पर जल, रोली और अक्षत से अर्घ्य दें।
  7. पारण: सत्तू का पिंड खाकर व्रत खोलें। बया (सत्तू, फल और सुहाग का सामान) सास को देकर आशीर्वाद लें।

नियम और सावधानियाँ

  • बादलों के कारण चाँद न दिखे तो पंचांग के चंद्रोदय समय के बाद उस दिशा में अर्घ्य दिया जाता है।
  • गर्भवती या बीमार महिलाएँ जल और फल ले सकती हैं।
  • उद्यापन में सत्तू के पिंड, सुहाग का सामान और कपड़े सुहागिनों को दिए जाते हैं।
  • पूर्वांचल में इस दिन गाय की पूजा और उसे आटे की लोई खिलाने की भी रीत है।

इस साल का चंद्रोदय समय कजरी तीज के पृष्ठ पर देखें। सावन की तीज की कहानी हरियाली तीज कथा में और भादो शुक्ल की तीज की कहानी हरतालिका तीज व्रत कथा में पढ़ें। तीज से तीन दिन पहले आने वाले भाई-बहन के पर्व की रक्षाबंधन की कथा भी देखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कजरी तीज की कथा क्या है?

एक गरीब ब्राह्मण पत्नी के तीज व्रत के लिए रात में साहूकार की दुकान से सवा सेर सत्तू बनाकर ले जा रहा था और पकड़ा गया। उसकी सच्चाई देखकर साहूकार ने ब्राह्मणी को धर्म-बहन माना और उन्हें सत्तू, गहने और धन देकर विदा किया।

कजरी तीज को बड़ी तीज क्यों कहते हैं?

सावन की हरियाली तीज को छोटी तीज कहा जाता है और भादो कृष्ण तृतीया की इस तीज को बड़ी या बूढ़ी तीज। सत्तू के कारण राजस्थान में इसे सातुड़ी तीज भी कहते हैं।

कजरी तीज पर नीम की पूजा क्यों होती है?

राजस्थान और मालवा में नीम की टहनी को नीमड़ी माता मानकर पूजा जाता है। मिट्टी की तलैया के किनारे नीम लगाकर उसकी पूजा और जल में परछाई देखने की रीत है।

कजरी तीज का व्रत कैसे खोलें?

चाँद निकलने पर अर्घ्य देकर घी-शक्कर मिले सत्तू के पिंड से व्रत खोला जाता है।

कजरी गीत कहाँ गाए जाते हैं?

मिर्ज़ापुर, वाराणसी और पूर्वी उत्तर प्रदेश में सावन-भादो में कजरी गाई जाती है, और इसी परंपरा से इस तीज का नाम जुड़ा है।