रक्षाबंधन की कथा: इंद्राणी का रक्षा सूत्र और राजा बलि को लक्ष्मी जी की राखी
संक्षेप में:रक्षाबंधन श्रावण पूर्णिमा को मनाया जाता है, जब बहनें भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बाँधती हैं। भविष्य पुराण के अनुसार सबसे पहले इंद्राणी ने देव-असुर युद्ध में इंद्र को रक्षा सूत्र बाँधा था, और एक दूसरी कथा में लक्ष्मी जी ने राजा बलि को राखी बाँधकर भगवान विष्णु को वैकुंठ लौटाया।
रक्षाबंधन श्रावण (सावन) महीने की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन बहनें भाई को तिलक लगाकर उसकी दाहिनी कलाई पर राखी बाँधती हैं और भाई उनकी रक्षा का वचन देता है। पुराने समय में यह रक्षा सूत्र पुरोहित यजमान को, और पत्नी पति को भी बाँधती थी; भाई-बहन का त्योहार बनने से पहले इसका अर्थ था किसी प्रिय की हर संकट से रक्षा की कामना। राखी हमेशा भद्रा रहित मुहूर्त में बाँधी जाती है।
रक्षाबंधन की कथा
इंद्राणी ने इंद्र को बाँधा रक्षा सूत्र
भविष्य पुराण के उत्तर पर्व में श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को यह कथा सुनाते हैं। एक समय देवताओं और असुरों में बारह वर्ष तक युद्ध चला। असुरों का राजा बलवान था और धीरे-धीरे देवता हारने लगे। देवराज इंद्र थककर निराश हो गए। उन्हें लगने लगा कि अब स्वर्ग हाथ से निकल जाएगा।
इंद्र ने देवगुरु बृहस्पति से उपाय पूछा। बृहस्पति ने कहा कि श्रावण पूर्णिमा के दिन मंत्रों से अभिमंत्रित रक्षा सूत्र बाँधकर युद्ध में जाओ। इंद्र की पत्नी इंद्राणी, जिन्हें शची भी कहते हैं, ने यह बात सुनी। उन्होंने पूर्णिमा से पहले रेशम का एक धागा लिया, उसमें सरसों, अक्षत और दूब जैसी शुभ चीज़ें बाँधीं और ब्राह्मणों से उसे मंत्रों द्वारा पवित्र करवाया।
श्रावण पूर्णिमा की सुबह स्वस्तिवाचन के साथ यह रक्षा सूत्र इंद्र की दाहिनी कलाई पर बाँधा गया। कुछ कथाओं में इसे इंद्राणी स्वयं बाँधती हैं और कुछ में बृहस्पति। इस सूत्र के प्रभाव से इंद्र का खोया आत्मविश्वास लौट आया। वे फिर युद्ध में उतरे और असुरों को हराकर स्वर्ग वापस पा लिया।
तब से श्रावण पूर्णिमा को रक्षा सूत्र बाँधने की परंपरा चली। राखी बाँधते समय जो मंत्र बोला जाता है, वह इसी कथा और राजा बलि से जुड़ा है:
येन बद्धो बलि राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वां प्रतिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥
अर्थ: जिस रक्षा सूत्र से महाबली दानवराज बलि बाँधे गए थे, उसी से मैं तुम्हें बाँधती हूँ। हे रक्षे, तुम अडिग रहना, कभी मत हटना।
लक्ष्मी जी और राजा बलि
दूसरी प्रसिद्ध कथा राजा बलि की है। असुरराज बलि प्रह्लाद के पौत्र थे, बहुत बड़े दानी और धर्म पर चलने वाले राजा। अपने बल से उन्होंने तीनों लोक जीत लिए थे। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने वामन रूप में ब्राह्मण बालक बनकर बलि से तीन पग धरती माँगी। बलि ने हँसकर हाँ कह दी। वामन ने विराट रूप लेकर एक पग में धरती और दूसरे में आकाश नाप लिया। तीसरे पग के लिए बलि ने अपना सिर आगे कर दिया।
बलि की इस भक्ति से भगवान बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने बलि को पाताल लोक का राज्य दिया और वर माँगने को कहा। बलि ने कहा, प्रभु, आप हमेशा मेरे सामने रहें। भगवान ने वचन निभाया और बलि के द्वारपाल बनकर पाताल में रहने लगे।
उधर वैकुंठ में देवी लक्ष्मी अकेली रह गईं। बहुत दिन बीत गए तो वे एक साधारण स्त्री का वेश धरकर पाताल पहुँचीं और बलि से कहा कि मेरा कोई भाई नहीं है, मुझे अपनी बहन बना लो। बलि ने आदर से उन्हें बहन माना। श्रावण पूर्णिमा के दिन लक्ष्मी जी ने बलि की कलाई पर रक्षा सूत्र बाँधा। बलि ने कहा, बहन, जो चाहो माँग लो। लक्ष्मी जी ने द्वार पर खड़े पहरेदार की ओर इशारा किया और कहा, मुझे यही चाहिए, ये मेरे पति हैं।
बलि सारी बात समझ गए। उन्होंने अपना वचन निभाया और भगवान विष्णु को लक्ष्मी जी के साथ वैकुंठ लौटने दिया। बदले में भगवान ने बलि को वरदान दिया कि वे साल के कुछ महीने उनके पास पाताल में रहेंगे। इसीलिए मंत्र में "येन बद्धो बलि राजा" आता है: जिस धागे ने दानवराज बलि को भी प्रेम से बाँध लिया।
द्रौपदी और श्रीकृष्ण की लोककथा
लोक में एक और प्रसंग बहुत सुनाया जाता है। शिशुपाल वध के समय सुदर्शन चक्र से श्रीकृष्ण की उँगली कट गई। द्रौपदी ने तुरंत अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर उनकी उँगली पर बाँध दिया। कृष्ण ने उस एक टुकड़े का ऋण चीरहरण के समय द्रौपदी की लाज बचाकर चुकाया। यह प्रसंग महाभारत के मूल पाठ में इस रूप में नहीं मिलता, पर भाई-बहन के रिश्ते की मिसाल के तौर पर घर-घर में सुनाया जाता है।
राखी बाँधने की विधि
- सुबह स्नान करके घर के मंदिर में दीपक जलाएँ। पहली राखी भगवान को, ख़ासकर श्रीकृष्ण या गणेश जी को चढ़ाएँ।
- थाली में रोली, अक्षत, राखी, दीपक, मिठाई और थोड़ा जल रखें।
- भद्रा समाप्त होने के बाद, दोपहर (अपराह्न) या प्रदोष के शुभ समय में भाई को पूर्व या उत्तर की ओर मुँह करके बिठाएँ। भाई सिर पर रूमाल या टोपी रखे।
- भाई को रोली-अक्षत का तिलक लगाएँ और "येन बद्धो बलि राजा" मंत्र बोलते हुए दाहिनी कलाई पर राखी बाँधें।
- दीपक से भाई की आरती उतारें और मिठाई खिलाएँ। भाई बहन के पैर छूकर या आशीर्वाद लेकर उपहार दे।
- कई परिवारों में बहनें राखी बाँधने तक व्रत रखती हैं। राखी के बाद भोजन करें।
भद्रा और अन्य नियम
- भद्रा काल में राखी न बाँधें। लोक मान्यता में शूर्पणखा ने रावण को भद्रा में राखी बाँधी थी, इसलिए इस समय को टाला जाता है। हर साल का भद्रा समय पंचांग में अलग होता है।
- राहु काल में भी राखी बाँधने से बचें।
- दक्षिण भारत में इसी दिन ब्राह्मण उपाकर्म करके नया जनेऊ धारण करते हैं; महाराष्ट्र और तटीय इलाकों में इसे नारली पूर्णिमा कहा जाता है।
- राखी को कम से कम कुछ दिन कलाई पर रहने दें; उतारने के बाद उसे फेंकने के बजाय बहते जल में प्रवाहित करें या पौधे की जड़ में रख दें।
इस साल भद्रा का समय और राखी बाँधने का शुभ मुहूर्त रक्षाबंधन पृष्ठ पर देखें, और दिन भर की चौघड़िया के लिए आज का पंचांग देखें। पूर्णिमा की पूजा के बारे में पूर्णिमा व्रत कथा पढ़ें, और भाई-बहन के दूसरे त्योहार की कहानी भाई दूज की कथा में पढ़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
रक्षाबंधन कब मनाया जाता है?
रक्षाबंधन श्रावण महीने की पूर्णिमा को मनाया जाता है, जो आमतौर पर अगस्त में पड़ती है। राखी भद्रा खत्म होने के बाद बाँधी जाती है।
सबसे पहले राखी किसने बाँधी थी?
भविष्य पुराण के अनुसार सबसे पहले इंद्राणी (शची) ने देव-असुर युद्ध के समय इंद्र की कलाई पर रक्षा सूत्र बाँधा था।
लक्ष्मी जी ने राजा बलि को राखी क्यों बाँधी?
भगवान विष्णु वचन के कारण बलि के द्वारपाल बनकर पाताल में रह रहे थे। लक्ष्मी जी ने बलि को भाई बनाकर राखी बाँधी और उपहार में अपने पति को वापस माँग लिया।
भद्रा में राखी क्यों नहीं बाँधते?
भद्रा को शुभ कामों के लिए वर्जित समय माना जाता है। लोक मान्यता है कि शूर्पणखा ने रावण को भद्रा में राखी बाँधी थी, इसलिए यह समय टाला जाता है।
राखी बाँधते समय कौन-सा मंत्र बोलें?
येन बद्धो बलि राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वां प्रतिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥ यह मंत्र बोलते हुए दाहिनी कलाई पर राखी बाँधें।
क्या द्रौपदी-कृष्ण की कथा महाभारत में है?
द्रौपदी के साड़ी फाड़कर कृष्ण की उँगली बाँधने का प्रसंग लोककथा के रूप में प्रचलित है; महाभारत के मूल पाठ में यह इस रूप में नहीं मिलता।
