मंगला गौरी व्रत कथा
संक्षेप में:मंगला गौरी व्रत सावन मास के हर मंगलवार को सुहागिनें, खासकर नवविवाहिताएँ, पति की लंबी उम्र और सुखी दांपत्य के लिए रखती हैं। कथा में सेठ धर्मपाल का अल्पायु पुत्र अपनी पत्नी के मंगला गौरी व्रत के पुण्य से सौ वर्ष की आयु पाता है।
मंगला गौरी व्रत सावन के महीने में पड़ने वाले हर मंगलवार को रखा जाता है। इसमें माता पार्वती के मंगला गौरी रूप की पूजा होती है। जैसे सावन के सोमवार भगवान शिव के लिए हैं, वैसे ही सावन के मंगलवार माता गौरी के लिए माने जाते हैं। शादी के बाद पहले सावन से यह व्रत शुरू करके आम तौर पर पाँच साल तक रखा जाता है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान में नई बहुएँ इसे बड़े चाव से करती हैं, और इसकी कथा पति की लंबी उम्र से जुड़ी है।
मंगला गौरी व्रत कथा
पुराने समय में एक नगर में धर्मपाल नाम का एक धनी सेठ रहता था। उसकी पत्नी बहुत सुशील थी। घर में धन-दौलत, नौकर-चाकर, किसी चीज़ की कमी नहीं थी। कमी थी तो बस एक, उनके कोई संतान नहीं थी। यही दुख दोनों को भीतर ही भीतर खाता रहता था।
सेठ ने संतान के लिए बहुत पूजा-पाठ, दान-पुण्य किया। आखिर भगवान की कृपा से उनके घर एक बेटा हुआ। पर खुशी के साथ एक चिंता भी आई। ज्योतिषियों ने बालक की कुंडली देखकर बताया कि यह बहुत गुणी होगा, पर इसकी आयु कम है। सोलहवें वर्ष में साँप के काटने से इसकी मृत्यु का योग है।
माता-पिता का कलेजा काँप उठा। उन्होंने बेटे को बड़े जतन से पाला, पर मन से यह डर कभी नहीं गया। जैसे-जैसे बेटा बड़ा होता गया, सोलहवाँ साल पास आता गया और उनकी चिंता बढ़ती गई।
उसी समय एक दूसरे नगर में एक कन्या थी, जिसकी माँ हर साल सावन के मंगलवार को बड़ी श्रद्धा से मंगला गौरी का व्रत करती थी। व्रत के पुण्य से माता गौरी ने उस परिवार पर ऐसी कृपा की थी कि उस घर की बेटी को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिला था, यानी वह कभी विधवा नहीं हो सकती थी। बेटी भी बचपन से माँ के साथ यह व्रत देखती और करती आई थी।
सेठ धर्मपाल के किसी शुभचिंतक ने उन्हें इस कन्या के बारे में बताया और सलाह दी कि अपने बेटे का विवाह इसी लड़की से करें। सेठ ने बिना देर किए रिश्ता भेजा, और सोलहवें वर्ष से पहले ही दोनों का विवाह हो गया।
विवाह के बाद बहू ने ससुराल में भी सावन के हर मंगलवार को माता मंगला गौरी का व्रत और पूजा जारी रखी। वह सोलह दीयों वाला आटे का दीपक जलाती, माता को सोलह शृंगार चढ़ाती और पूरे मन से कथा सुनती।
फिर वह दिन आया जिसका डर था। कहते हैं, काल साँप बनकर सेठ के बेटे के पास पहुँचा, पर बहू के व्रत और माता गौरी के आशीर्वाद के आगे उसकी एक न चली। साँप लौट गया और बेटे का बाल भी बाँका नहीं हुआ। कुछ कथाओं में आता है कि माता गौरी ने स्वयं प्रकट होकर बहू को वरदान दिया कि उसका पति सौ वर्ष जिएगा।
सेठ-सेठानी को जब सारी बात समझ आई, तो उनकी आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने बहू को गले लगा लिया। जिस बेटे की उम्र सोलह साल लिखी थी, उसने पत्नी के साथ सौ वर्ष का सुखी जीवन बिताया। तभी से यह मान्यता है कि सावन के मंगलवार को जो सुहागिन मंगला गौरी का व्रत करती है, माता उसके सुहाग की रक्षा करती हैं।
कुछ घरों में कथा का एक छोटा रूप भी सुनाया जाता है, जिसमें सेठ को एक साधु बेटे का वरदान देते हैं और उसकी अल्पायु की बात भी बताते हैं। कथा के रूप चाहे अलग हों, बात एक ही है: पत्नी की निष्ठा और माता गौरी की कृपा से पति पर आया संकट टल जाता है।
मंगला गौरी पूजा विधि
- सुबह की तैयारी: सावन के मंगलवार को सुबह जल्दी नहाकर साफ़, हो सके तो लाल या हरे कपड़े पहनें।
- संकल्प: हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर पति की लंबी उम्र और सुखी गृहस्थी के लिए व्रत का संकल्प लें।
- चौकी सजाएँ: लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएँ और माता मंगला गौरी की मूर्ति या तस्वीर रखें। साथ में गणेश जी का स्थान बनाएँ।
- सोलह मुखी दीपक: आटे से बना सोलह बत्तियों वाला दीपक घी से जलाएँ।
- सोलह की सामग्री: माता को सोलह-सोलह की गिनती में चूड़ियाँ, लौंग, सुपारी, इलायची, फल, पान, लड्डू और मेवे चढ़ाएँ। साथ में सोलह शृंगार की चीज़ें, मेहँदी, सिंदूर और चुनरी अर्पित करें।
- कथा और आरती: पूजा के बाद मंगला गौरी की कथा सुनें और फिर आरती करें।
- भोजन: दिन में एक बार, आम तौर पर बिना नमक का भोजन या फलाहार लिया जाता है। अगले दिन चढ़ाई गई प्रतिमा का नदी या तालाब में आदर से विसर्जन करें, या घर के गमले में मिट्टी में मिला दें।
उद्यापन और नियम
- व्रत आम तौर पर पाँच साल तक रखा जाता है। कुछ परिवारों में कुल सोलह या बीस मंगलवार पूरे करने के बाद उद्यापन किया जाता है।
- उद्यापन सावन के ही किसी मंगलवार को करें। इसमें हवन होता है और सोलह सुहागिनों को भोजन कराकर सुहाग की सामग्री दी जाती है।
- पहले सावन में व्रत की शुरुआत मायके में और बाकी वर्षों में ससुराल में करने का रिवाज़ कई घरों में है।
- व्रत के दिन घर में सात्विक माहौल रखें और कलह से बचें।
सावन के सोमवार का व्रत करने वाली महिलाएँ सोमवार व्रत कथा और सोलह सोमवार की कथा भी पढ़ सकती हैं। सावन की शुक्ल तृतीया को आने वाली हरियाली तीज भी इसी सुहाग-भाव का पर्व है। पूजा के बाद शिवजी की आरती ॐ जय शिव ओंकारा गाई जा सकती है, और हर मंगलवार की तिथि आज के पंचांग में देख लें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
मंगला गौरी व्रत कब रखा जाता है?
यह व्रत सावन मास में पड़ने वाले हर मंगलवार को रखा जाता है। सावन में चार या पाँच मंगलवार आते हैं, और सभी पर यह पूजा की जाती है।
मंगला गौरी व्रत कितने साल रखना चाहिए?
परंपरा में शादी के बाद पहले सावन से शुरू करके यह व्रत पाँच साल तक रखा जाता है। कुछ परिवारों में सोलह या बीस मंगलवार पूरे होने पर उद्यापन कर दिया जाता है।
मंगला गौरी व्रत की कथा किसकी है?
कथा सेठ धर्मपाल के बेटे की है, जिसकी आयु सोलह वर्ष लिखी थी। उसकी पत्नी के मंगला गौरी व्रत के पुण्य से वह संकट टला और उसे सौ वर्ष की आयु मिली।
मंगला गौरी पूजा में सोलह चीज़ें क्यों चढ़ाते हैं?
सोलह की संख्या सोलह शृंगार और पूर्णता से जुड़ी है। इसलिए दीपक में सोलह बत्तियाँ और चूड़ी, लौंग, सुपारी, फल जैसी चीज़ें सोलह-सोलह की गिनती में चढ़ाई जाती हैं।
क्या कुँवारी लड़कियाँ मंगला गौरी व्रत रख सकती हैं?
यह व्रत मुख्य रूप से सुहागिनों का है, पर कई घरों में कुँवारी लड़कियाँ भी अच्छे जीवनसाथी की कामना से माता गौरी की यह पूजा करती हैं।
