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होलिका दहन की कथा: भक्त प्रह्लाद, होलिका और भगवान नृसिंह

संक्षेप में:होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा की रात, भद्रा रहित प्रदोष काल में किया जाता है, और अगले दिन रंगों की होली खेली जाती है। कथा के अनुसार हिरण्यकशिपु की बहन होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठी, पर होलिका जल गई और विष्णु भक्त प्रह्लाद सुरक्षित बच गए।

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होलिका दहन फाल्गुन महीने की पूर्णिमा को सूर्यास्त के बाद, प्रदोष काल में किया जाता है, बशर्ते उस समय भद्रा न हो। इसे छोटी होली भी कहते हैं और इसके अगले दिन, चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को, रंग वाली होली या धुलेंडी खेली जाती है। मोहल्ले भर के लोग मिलकर लकड़ी और उपलों की होली सजाते हैं, महिलाएँ दिन में उसकी पूजा करती हैं और रात को शुभ समय में उसे जलाया जाता है। यह पर्व याद दिलाता है कि अहंकार चाहे जितना बड़ा हो, सच्ची भक्ति के आगे टिक नहीं पाता।

होलिका दहन की कथा

यह कथा श्रीमद्भागवत पुराण और विष्णु पुराण में विस्तार से आती है। ऋषि कश्यप और दिति के दो पुत्र थे, हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु। हिरण्याक्ष ने धरती को समुद्र में डुबो दिया था, तब भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर उसका वध किया। भाई की मृत्यु से हिरण्यकशिपु के मन में विष्णु के प्रति गहरा बैर बैठ गया।

बदला लेने के लिए उसने मंदराचल पर्वत पर बरसों कठोर तपस्या की। ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए तो उसने अमर होने का वर माँगा। ब्रह्मा ने कहा कि यह संभव नहीं। तब हिरण्यकशिपु ने बहुत चतुराई से वर माँगा: मुझे न कोई मनुष्य मार सके न पशु, न दिन में न रात में, न घर के भीतर न बाहर, न धरती पर न आकाश में, न किसी अस्त्र से न शस्त्र से। ब्रह्मा ने तथास्तु कहा।

वर पाकर हिरण्यकशिपु ने तीनों लोक जीत लिए और घोषणा कर दी कि अब कोई विष्णु की पूजा नहीं करेगा, सब मेरी पूजा करेंगे। पर विधि का खेल देखिए, उसी के घर में विष्णु का सबसे बड़ा भक्त पैदा हुआ। जब हिरण्यकशिपु तपस्या पर था, तब उसकी पत्नी कयाधु नारद मुनि के आश्रम में रही थीं। गर्भ में ही प्रह्लाद ने नारद जी से नारायण की महिमा सुन ली थी।

प्रह्लाद बड़े हुए तो गुरुकुल में भी वे दूसरे बच्चों को हरि नाम सिखाने लगे। हिरण्यकशिपु ने पूछा कि तुमने अब तक क्या सीखा, तो बालक ने सहज भाव से कहा कि सबसे अच्छी विद्या भगवान विष्णु की भक्ति है। यह सुनकर राजा आग-बबूला हो गया।

उसने अपने ही बेटे को मारने के कई उपाय किए। प्रह्लाद को ऊँचे पहाड़ से नीचे फिंकवाया, मतवाले हाथियों के पैरों तले डलवाया, विषैले साँपों के बीच छोड़ा, खाने में विष मिलवाया। हर बार प्रह्लाद नारायण का नाम लेते रहे और हर बार सुरक्षित बच गए।

आख़िरी उपाय उसकी बहन होलिका ने सुझाया। होलिका को वरदान में एक ऐसा वस्त्र मिला था, जिसे ओढ़ने पर आग उसे जला नहीं सकती थी। कुछ कथाओं में यह वस्त्र नहीं, सीधा वरदान बताया जाता है कि अग्नि उसे नहीं जलाएगी। तय हुआ कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर जलती चिता पर बैठेगी। फाल्गुन पूर्णिमा के दिन लकड़ियों का बड़ा ढेर लगाया गया।

होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर बैठ गई और आग लगा दी गई। प्रह्लाद आँखें बंद करके नारायण का नाम जपते रहे। तभी तेज़ हवा चली और होलिका का वस्त्र उड़कर प्रह्लाद पर जा पड़ा। जो वरदान दूसरों को नुकसान पहुँचाने के लिए इस्तेमाल हुआ, वह काम नहीं आया। होलिका जलकर राख हो गई और प्रह्लाद मुस्कराते हुए आग से बाहर आ गए। लोगों ने खुशी में राख उड़ाई और यही उत्सव आगे चलकर होली बना।

नृसिंह अवतार

होलिका के जलने के बाद भी हिरण्यकशिपु नहीं माना। एक दिन उसने गरजकर पूछा, कहाँ है तेरा भगवान? क्या इस खंभे में भी है? प्रह्लाद ने कहा, हाँ, वे हर जगह हैं। राजा ने गदा से खंभे पर प्रहार किया और उसी खंभे से भगवान नृसिंह प्रकट हुए, आधा शरीर मनुष्य का और आधा सिंह का। संध्या का समय था, न दिन न रात। उन्होंने हिरण्यकशिपु को महल की देहरी पर, अपनी जाँघ पर रखकर, अपने नाखूनों से मार दिया। इस तरह ब्रह्मा का हर वचन भी सच रहा और अधर्म का अंत भी हुआ। यह प्रसंग वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को नृसिंह जयंती के रूप में मनाया जाता है।

होलिका दहन पूजा विधि

  1. होलिका दहन से कुछ दिन पहले चौराहे या खुले स्थान पर लकड़ी, सूखी टहनियाँ और गोबर के उपले (बड़कुल्ले) इकट्ठे किए जाते हैं। बीच में प्रह्लाद के प्रतीक के रूप में एक सीधी डंडी गाड़ी जाती है।
  2. पूर्णिमा के दिन महिलाएँ थाली में रोली, अक्षत, फूल, कच्चा सूत, हल्दी की गाँठ, साबुत मूँग, गुड़, बताशे, नारियल और एक लोटा जल लेकर पूजा करने जाती हैं।
  3. होलिका के पास पूर्व या उत्तर की ओर मुँह करके बैठें, नरसिंह भगवान और प्रह्लाद का ध्यान करके संकल्प लें।
  4. होलिका पर रोली-अक्षत-फूल चढ़ाएँ और कच्चा सूत लपेटते हुए तीन या सात परिक्रमा करें। फिर लोटे का जल अर्पित करें।
  5. होलिका दहन की कथा सुनें। दहन भद्रा समाप्त होने के बाद, प्रदोष काल में ही करें; भद्रा मुख में होलिका जलाना वर्जित माना जाता है।
  6. आग लगने पर नई फसल की गेहूँ या जौ की बालियाँ (होला) भूनें और प्रसाद के रूप में बाँटें। परिवार के साथ अग्नि की परिक्रमा करें।
  7. अगली सुबह होलिका की थोड़ी राख घर लाकर माथे पर लगाने की परंपरा है।

नियम और सावधानियाँ

  • हर साल भद्रा का समय अलग होता है; यदि भद्रा पूरी रात रहे तो पंचांग के अनुसार भद्रा पूँछ में दहन किया जाता है।
  • हरे पेड़ न काटें; सूखी लकड़ी और उपलों का ही इस्तेमाल करें।
  • होलिका की अग्नि में प्लास्टिक, टायर या कचरा न डालें। बच्चों को आग से दूरी पर रखें।
  • कई परिवारों में नवविवाहित बहू अपनी पहली होलिका ससुराल में नहीं देखती; ऐसी स्थानीय परंपराएँ अपने बड़ों से पूछकर निभाएँ।

इस साल होलिका दहन का भद्रा रहित मुहूर्त होलिका दहन पृष्ठ पर देखें और अगले दिन के रंगोत्सव की जानकारी होली पृष्ठ पर पढ़ें। भगवान नृसिंह के प्रकट होने का दिन नृसिंह जयंती पर मनाया जाता है। फाल्गुन पूर्णिमा की पूजा के लिए पूर्णिमा व्रत कथा भी पढ़ें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

होलिका दहन कब किया जाता है?

होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा की शाम, सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में किया जाता है, जब भद्रा न हो। इसके अगले दिन रंगों की होली खेली जाती है।

होलिका कौन थी?

होलिका असुरराज हिरण्यकशिपु की बहन थी। उसे वरदान था कि आग उसे नहीं जलाएगी, पर प्रह्लाद को जलाने के प्रयास में वह स्वयं जल गई।

होलिका दहन में भद्रा क्यों देखी जाती है?

भद्रा काल को शुभ कामों के लिए वर्जित माना गया है, इसलिए होलिका दहन भद्रा खत्म होने के बाद प्रदोष काल में किया जाता है।

होलिका की अग्नि में गेहूँ की बालियाँ क्यों भूनते हैं?

फाल्गुन में रबी की नई फसल पकती है। नई बालियाँ अग्नि को अर्पित करके भूनना और प्रसाद के रूप में खाना नए अन्न का स्वागत माना जाता है।

होलिका दहन की कथा किस ग्रंथ में है?

प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु की कथा श्रीमद्भागवत पुराण और विष्णु पुराण में है; होलिका वाला प्रसंग लोक परंपरा और बाद के ग्रंथों में प्रसिद्ध है।

क्या होलिका दहन के दिन व्रत रखते हैं?

कई लोग फाल्गुन पूर्णिमा का व्रत रखते हैं और होलिका पूजा के बाद भोजन करते हैं। यह अपने घर की परंपरा पर निर्भर है।