सकट चौथ व्रत कथा: कुम्हार का आवा और बुढ़िया माई के बेटे की कहानी
संक्षेप में:सकट चौथ माघ कृष्ण चतुर्थी को माताएँ संतान की रक्षा के लिए रखती हैं। कथा के अनुसार कुम्हार के आवे में बलि के लिए बिठाए गए बुढ़िया के इकलौते बेटे को सकट माता और गणेश जी ने बचा लिया; पूजा में तिलकुट चढ़ता है और चाँद को अर्घ्य देकर व्रत खुलता है।
सकट चौथ माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाई जाती है, जो उत्तर भारत में आम तौर पर जनवरी में पड़ती है। इसे तिलकुटा चौथ, तिल चौथ, संकट चौथ और लंबोदर संकष्टी चतुर्थी भी कहते हैं। माताएँ अपनी संतान की रक्षा और लंबी उम्र के लिए दिन भर उपवास रखती हैं, शाम को गणेश जी और सकट माता की पूजा करके तिलकुट का भोग लगाती हैं, कुम्हार के आवे वाली कथा सुनती हैं और चाँद को अर्घ्य देकर व्रत खोलती हैं।
सकट चौथ व्रत कथा
बहुत पहले किसी राज्य में एक कुम्हार रहता था। वह राजा के लिए मिट्टी के बर्तन बनाता था। एक बार ऐसा हुआ कि उसने बर्तन बनाकर आवे (भट्ठी) में रखे, आग लगाई, पर बर्तन पके ही नहीं। अगली बार भी वही हुआ। कई दिन तक कोशिश करने पर भी आवा कच्चा का कच्चा रह गया।
परेशान कुम्हार राजा के पास गया। राजा ने राजपंडित को बुलाया। उस समय के अंधविश्वास के अनुसार पंडित ने कहा कि जब-जब आवा लगाया जाए, उसमें एक बच्चे की बलि दी जाए, तभी बर्तन पकेंगे। राजा ने हुक्म दे दिया कि नगर का हर परिवार बारी-बारी से एक बच्चा देगा। कई घरों की गोद सूनी हो गई और नगर में डर का माहौल छा गया।
उसी नगर में एक बूढ़ी माई रहती थी। उसका एक ही बेटा था, वही उसके बुढ़ापे का सहारा था। कुछ दिन बाद उसकी बारी आ गई, और संयोग से उस दिन माघ कृष्ण चतुर्थी, यानी सकट चौथ थी। बुढ़िया हर साल सकट माता का व्रत रखती थी।
बुढ़िया का दिल बैठ गया, पर उसने भरोसा नहीं छोड़ा। उसने बेटे को नहला-धुलाकर उसके हाथ में सकट की सुपारी और दूब का बीड़ा दिया और कहा, "बेटा, आवे में बैठते ही सकट माता और गणेश जी का नाम लेते रहना। डरना मत, वे तुम्हारी रक्षा करेंगे।" फिर वह खुद पूजा में बैठ गई और रोते-रोते सकट माता से विनती करती रही कि उसके बेटे की लाज रखें।
राजा के सिपाही बेटे को ले गए और उसे आवे में बिठाकर आग लगा दी गई। लड़का आँखें बंद करके गणेश जी का नाम लेता रहा। कथा कहती है कि गणपति की कृपा से आग की लपटें उसे छू तक नहीं पाईं। उसके चारों ओर ठंडक बनी रही।
उस रात जो आवा बरसों में एक बार भी ठीक से न पका था, वह पूरी रात में अच्छी तरह पक गया। सुबह कुम्हार आवा खोलने आया तो दंग रह गया। सारे बर्तन पक चुके थे और बीच में बुढ़िया का बेटा सही-सलामत बैठा मुस्कुरा रहा था। इतना ही नहीं, कई घरों में सुनाई जाने वाली कथा के अनुसार, पहले जिन बच्चों की बलि दी गई थी, वे भी जीवित होकर बाहर आ गए।
यह ख़बर आग की तरह नगर में फैल गई। राजा स्वयं आया और बुढ़िया से पूछा कि यह कैसे हुआ। बुढ़िया ने बताया कि उसने सकट चौथ का व्रत रखा था और बेटे को गणेश जी के भरोसे भेजा था। राजा को अपनी भूल का एहसास हुआ। उसने बच्चों की बलि की प्रथा उसी दिन बंद कर दी और पूरे नगर में घोषणा करवाई कि सब सकट चौथ का व्रत रखें।
तभी से माताएँ इस दिन संतान की रक्षा के लिए व्रत रखती हैं और कथा के अंत में कहती हैं, "हे सकट माता, जैसे बुढ़िया के बेटे की रक्षा की, वैसे सबके बच्चों की रक्षा करना।"
दूसरी कथा: देवरानी और जेठानी
एक और लोक कथा में एक गरीब देवरानी अपनी अमीर जेठानी के घर काम करके गुज़ारा करती थी। सकट चौथ पर उसने थोड़े से तिल और गुड़ से तिलकुट बनाकर पूरे मन से पूजा की। रात को गणेश जी एक बालक के रूप में उसके घर आए। देवरानी ने अपनी टूटी खाट और जो कुछ था, वही प्रेम से अर्पित किया। सुबह उसकी झोंपड़ी सोने से भर गई। जेठानी ने यह देखा तो लालच में वैसा ही दिखावा किया, पर मन में श्रद्धा नहीं थी, इसलिए उसे कुछ नहीं मिला। कथा की सीख है कि गणेश जी भाव के भूखे हैं, दिखावे के नहीं।
सकट चौथ पूजा विधि
- संकल्प: सुबह स्नान करके संतान की कुशलता के लिए व्रत का संकल्प लें। कई माताएँ निर्जल रहती हैं, कई फलाहार करती हैं; शकरकंद और सिंघाड़ा फलाहार में खाया जाता है।
- तिलकुट बनाना: भुने तिल को गुड़ के साथ कूटकर तिलकुट तैयार करें। उत्तर प्रदेश के कई घरों में तिलकुट से बकरे की आकृति बनाकर उसे बेटा या बेटी काटते हैं; राजस्थान में तिल के लड्डू बनते हैं।
- पूजा की तैयारी: चौकी पर गणेश जी की प्रतिमा, जल भरा कलश या लोटा, रोली, अक्षत, दूब, सुपारी, गुड़-तिल, शकरकंद और बेर रखें। कई घर दीवार पर सकट माता का चित्र बनाते हैं।
- शाम की पूजा: गणेश जी को दूब, रोली, फूल और तिलकुट अर्पित करें। सकट माता की पूजा करें।
- कथा: हाथ में तिल या दूब लेकर कुम्हार और बुढ़िया की कथा सुनें, फिर गणेश जी की आरती करें।
- चंद्र अर्घ्य: चाँद निकलने पर लोटे के जल में तिल, दूध और अक्षत डालकर अर्घ्य दें।
- पारण: अर्घ्य के बाद तिलकुट का प्रसाद लेकर व्रत खोलें और बच्चों को प्रसाद दें। बया सास को देकर आशीर्वाद लें।
नियम और सावधानियाँ
- चाँद को अर्घ्य दिए बिना व्रत न खोलें; बादल हों तो पंचांग के चंद्रोदय समय के बाद अर्घ्य दें।
- इस दिन तिल का दान अच्छा माना जाता है।
- बीमार या गर्भवती महिलाएँ फलाहार से व्रत रखें।
- बच्चों पर गुस्सा करना या उन्हें मारना इस दिन वर्जित माना जाता है।
इस साल का चंद्रोदय समय सकट चौथ के पृष्ठ पर देखें। हर महीने आने वाली संकष्टी की तिथियाँ संकष्टी चतुर्थी कैलेंडर में मिलेंगी और उसकी कथा संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा में पढ़ें। पूजा के अंत में जय गणेश जय गणेश देवा आरती गाएँ।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सकट चौथ की कथा क्या है?
एक कुम्हार का आवा नहीं पकता था और बच्चों की बलि दी जाने लगी। सकट चौथ के दिन एक बुढ़िया के इकलौते बेटे की बारी आई, पर बुढ़िया के व्रत और गणेश जी की कृपा से बच्चा आग में भी सुरक्षित रहा और राजा ने बलि प्रथा बंद कर दी।
सकट चौथ कब होती है?
माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को, जो आम तौर पर जनवरी में आती है। सटीक तारीख और चंद्रोदय पंचांग में देखें।
सकट चौथ पर तिलकुट क्यों चढ़ाते हैं?
माघ की ठंड में तिल और गुड़ का विशेष महत्व है, इसलिए गणेश जी को तिलकुट का भोग लगाया जाता है। इसी से इसका नाम तिलकुटा चौथ पड़ा।
सकट चौथ का व्रत कैसे खोलते हैं?
चाँद निकलने पर जल में तिल, दूध और अक्षत डालकर अर्घ्य दिया जाता है और फिर तिलकुट का प्रसाद लेकर व्रत खोला जाता है।
सकट चौथ और संकष्टी चतुर्थी में क्या फ़र्क है?
हर महीने की कृष्ण चतुर्थी संकष्टी कहलाती है। माघ की संकष्टी को उत्तर भारत में सकट चौथ कहते हैं और इसे सबसे बड़ी संकष्टी माना जाता है।
