शीतला अष्टमी (बसौड़ा) व्रत कथा
संक्षेप में:शीतला अष्टमी, जिसे बसौड़ा भी कहते हैं, चैत्र कृष्ण अष्टमी को मनाई जाती है। इस दिन चूल्हा नहीं जलता और शीतला माता को एक दिन पहले बना ठंडा भोजन चढ़ाया जाता है; कथा में ठंडा भोग देने वाली एक बूढ़ी माई का घर आग से बच जाता है।
शीतला अष्टमी चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को आती है, यानी होली के लगभग आठ दिन बाद। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश और दिल्ली में इसे बसौड़ा या बसियौरा कहते हैं, क्योंकि इस दिन बासी, यानी एक दिन पहले बना भोजन खाया जाता है। कई परिवार यही पूजा सप्तमी को करते हैं, जिसे शीतला सप्तमी कहा जाता है। इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता। शीतला माता का वर्णन स्कन्द पुराण की परंपरा में मिलता है, और लोग परिवार, खासकर बच्चों के आरोग्य और घर की सुख-शांति के लिए उनकी पूजा करते हैं।
शीतला अष्टमी व्रत कथा
एक बार शीतला माता के मन में आया कि चलकर देखूँ, धरती पर मुझे कौन सच्चे मन से याद करता है। वे एक बूढ़ी, कमज़ोर स्त्री का रूप धरकर एक गाँव में पहुँचीं। उस दिन चैत्र कृष्ण अष्टमी थी।
गाँव की गलियों में चलते हुए वे एक घर के नीचे से गुज़रीं। ऊपर से किसी ने चावल का उबलता हुआ माँड बाहर फेंक दिया। गर्म माँड बुढ़िया पर आ गिरा। उनके पूरे शरीर पर छाले पड़ गए और जलन से वे बेहाल हो गईं।
दर्द से कराहती बुढ़िया गाँव भर में घूमीं। हर दरवाज़े पर कहतीं, मैं जल रही हूँ, कोई मेरी मदद करो। पर उस दिन लगभग हर घर में चूल्हे पर गरम-गरम खाना पक रहा था, सब अपने कामों में लगे थे। किसी ने उनकी ओर ध्यान नहीं दिया। कई लोगों ने तो दरवाज़ा ही बंद कर लिया।
गाँव के एक कोने में एक गरीब बूढ़ी माई रहती थी। वह हर साल इस दिन शीतला माता का बसौड़ा मानती थी। उसने एक दिन पहले ही खाना बना लिया था और आज उसके घर चूल्हा ठंडा पड़ा था। बुढ़िया की हालत देखकर उसका दिल पसीज गया। उसने बड़े आदर से उन्हें घर के भीतर बैठाया और बोली, माँ, आप यहाँ बैठिए, मैं अभी कुछ करती हूँ।
माई ने घड़े का ठंडा पानी लाकर उनके छालों पर धीरे-धीरे डाला। फिर बोली, माँ, मेरे पास रात की बनी राबड़ी और दही रखा है, थोड़ा खा लीजिए, ठंडक मिलेगी। बुढ़िया ने ठंडी राबड़ी और दही खाया। सचमुच उनके शरीर की जलन शांत हो गई।
फिर बुढ़िया बोलीं, बेटी, ज़रा मेरे बाल गूँथ दे, सिर में बड़ी खुजली हो रही है। माई उनके बाल सँवारने लगी तो उसने देखा कि बालों के बीच माथे के पीछे एक तीसरी आँख है। वह डर गई और पीछे हट गई।
तब बुढ़िया ने कहा, डर मत बेटी। मैं शीतला माता हूँ। माई ने देखा कि सामने गधे पर सवार देवी खड़ी हैं, एक हाथ में झाड़ू, दूसरे में कलश, साथ में सूप और नीम के पत्ते। माई उनके चरणों में गिर पड़ी और बोली, माँ, मैं गरीब हूँ, आपको बैठाने के लिए मेरे पास आसन भी नहीं है। माता मुस्कुराईं और वहीं ज़मीन पर बैठ गईं। उन्होंने कहा, तूने मुझे ठंडक दी है, अब तेरे घर कोई ताप नहीं आएगा।
उसी रात गाँव में भयंकर आग लगी। एक के बाद एक सारे घर जलने लगे। सुबह लोगों ने देखा कि पूरे गाँव में सिर्फ़ एक घर साबुत खड़ा है, उस बूढ़ी माई का। सब हैरान होकर उसके पास पहुँचे और पूछा कि तेरा घर कैसे बच गया।
माई ने सारी बात बताई कि कल चैत्र की अष्टमी को शीतला माता बुढ़िया बनकर आई थीं, लोगों ने उन पर गर्म माँड डाला और किसी ने मदद नहीं की, जबकि उसने उन्हें ठंडा पानी और बासी ठंडा भोजन दिया था। यह बात राजा तक पहुँची। राजा ने पूरे राज्य में घोषणा करवाई कि हर साल चैत्र कृष्ण अष्टमी को कोई चूल्हा नहीं जलाएगा, एक दिन पहले बना ठंडा भोजन शीतला माता को चढ़ाया जाएगा और वही प्रसाद के रूप में खाया जाएगा। तभी से बसौड़ा की परंपरा चली आ रही है।
कुछ जगहों पर यह कथा थोड़े अलग रूप में सुनाई जाती है, जिसमें एक बुढ़िया अपनी बहुओं के मना करने के बावजूद ठंडा भोग लगाती है और उसी का घर आग से बचता है। पात्र बदलते हैं, पर कथा की सीख वही रहती है: इस दिन ठंडा भोजन, सेवा और दया।
शीतला अष्टमी पूजा विधि
- एक दिन पहले (सप्तमी की शाम): रसोई साफ़ करके भोग बनाएँ। राजस्थान और उत्तर प्रदेश में मीठे चावल (गुड़ या गन्ने के रस वाले), पुए, पूरी, बाजरे की रोटी, राबड़ी, दही, हलवा और कांजी बनाई जाती है। रात में चूल्हा ठंडा कर दें।
- सुबह स्नान: अष्टमी को सूर्योदय से पहले ठंडे पानी से स्नान करें। इस दिन गर्म पानी इस्तेमाल न करने की रीत है।
- पूजा की थाली: थाली में बासी भोग, रोली, हल्दी, अक्षत, मेहँदी, मौली, वस्त्र, दीया (बिना जलाए भी रखा जाता है), जल से भरा लोटा और नीम के पत्ते रखें।
- मंदिर या घर में पूजा: शीतला माता के मंदिर जाकर या घर में उनकी तस्वीर के सामने जल चढ़ाएँ, रोली-हल्दी लगाएँ और ठंडा भोग अर्पित करें। कई घरों में होली की राख या घर के पास की मिट्टी से माता का स्थान बनाया जाता है।
- कथा: परिवार की स्त्रियाँ बैठकर बसौड़ा की कथा सुनती हैं।
- प्रसाद: पूजा के बाद लोटे का बचा जल घर के कोनों और दरवाज़े पर छिड़का जाता है। फिर पूरा परिवार वही बासी भोजन प्रसाद के रूप में खाता है।
नियम
- अष्टमी के दिन घर में चूल्हा, गैस या आग नहीं जलाई जाती; ताज़ा खाना नहीं पकता।
- इस दिन सिलाई-बुनाई और झाड़ू-पोछे जैसे भारी काम से कई परिवार बचते हैं।
- जो परिवार सप्तमी को पूजा करते हैं, वे षष्ठी को भोग बनाकर सप्तमी को बसौड़ा मनाते हैं; अपने घर की रीत मानें।
- भोग इतना ही बनाएँ जितना ठीक से रखा जा सके। बासी खाना साफ़, ढके बर्तन में और ठंडी जगह रखें। अगर कोई बीमार है तो उसके खाने के लिए डॉक्टर की सलाह ही मानें।
इस साल की तिथि शीतला अष्टमी पृष्ठ पर देखें। बसौड़ा के कुछ ही दिन बाद राजस्थान में गणगौर का पर्व आता है, और फिर चैत्र नवरात्रि शुरू होती है। हर महीने की तिथियाँ मासिक कैलेंडर में देखी जा सकती हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
शीतला अष्टमी कब मनाई जाती है?
शीतला अष्टमी चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है, जो होली के लगभग आठ दिन बाद आती है। कई परिवार यह पूजा सप्तमी को भी करते हैं।
बसौड़ा क्यों कहा जाता है?
इस दिन एक दिन पहले बना बासी भोजन शीतला माता को चढ़ाकर प्रसाद के रूप में खाया जाता है। बासी भोजन की इसी परंपरा से इसे बसौड़ा या बसियौरा कहते हैं।
शीतला अष्टमी पर चूल्हा क्यों नहीं जलाते?
शीतला का अर्थ है ठंडक देने वाली। कथा के अनुसार माता को ठंडा भोजन प्रिय है, इसलिए इस दिन घर में आग नहीं जलाई जाती और ताज़ा खाना नहीं पकाया जाता।
शीतला माता को क्या भोग लगाया जाता है?
मीठे चावल, पुए, पूरी, बाजरे की रोटी, राबड़ी, दही, हलवा और कांजी जैसे पकवान एक दिन पहले बनाकर ठंडे रूप में चढ़ाए जाते हैं।
क्या शीतला माता की पूजा से बीमारी ठीक होती है?
परंपरा में शीतला माता को परिवार के आरोग्य की देवी माना जाता है और लोग श्रद्धा से प्रार्थना करते हैं। पर यह आस्था की बात है; किसी भी बीमारी में डॉक्टर से इलाज ज़रूर कराएँ।
