सरस्वती पूजा
सरस्वती पूजा माघ शुक्ल पंचमी, यानी बसंत पंचमी के दिन विद्या, वाणी और संगीत की देवी माँ सरस्वती की आराधना है। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बंगाल और ओडिशा में यह एक बड़ा सार्वजनिक उत्सव है, जिसमें स्कूल-कॉलेज और मोहल्लों में प्रतिमा स्थापित की जाती है।
क्यों मनाते हैं
पुराणों में माँ सरस्वती को ब्रह्मा जी की शक्ति और ज्ञान की अधिष्ठात्री माना गया है। एक लोक-मान्यता के अनुसार सृष्टि के आरंभ में चारों ओर मौन था; ब्रह्मा जी के आह्वान पर वीणा लिए देवी प्रकट हुईं और संसार को वाणी मिली। इसलिए विद्यार्थी, शिक्षक, लेखक और कलाकार इस दिन विशेष रूप से पूजा करते हैं। छोटे बच्चों का अक्षरारंभ, यानी पहली बार पढ़ाई शुरू करवाना, भी आज शुभ माना जाता है। पटना, दरभंगा या कोलकाता जैसे शहरों में हफ़्तों पहले से मूर्तिकार प्रतिमाएँ गढ़ने लगते हैं और छात्र चंदा जुटाकर पंडाल सजाते हैं।
किस तिथि को
माघ शुक्ल पंचमी। जिस दिन सूर्योदय से लेकर दोपहर से पहले तक (पूर्वाह्न में) पंचमी हो, उसी दिन पूजा होती है। यही दिन बसंत पंचमी के रूप में भी मनाया जाता है।
पूजा कैसे होती है
- पीले या सफ़ेद वस्त्र पहनकर देवी को पीले फूल, सफ़ेद चंदन, अक्षत और केसरिया भोग चढ़ाया जाता है।
- किताबें, कलम, वाद्य यंत्र देवी के पास रखे जाते हैं; बिहार-बंगाल में उस दिन किताब नहीं खोलने का चलन है।
- प्रसाद में बेर, गाजर, शकरकंद, बूंदी और खिचड़ी बहुत आम है।
- सरस्वती माता की आरती के बाद पुष्पांजलि, और अगले दिन या तीसरे दिन प्रतिमा विसर्जन।
घर पर विधि से पूजा करने का पूरा क्रम वसंत पंचमी सरस्वती पूजा विधि में है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सरस्वती पूजा कब होती है?
सरस्वती पूजा पर किताबें क्यों रखते हैं?
सरस्वती पूजा का प्रसाद क्या होता है?
सरस्वती पूजा पर कौन सा रंग पहनें?
क्या बसंत पंचमी और सरस्वती पूजा एक ही दिन है?
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