वसंत पंचमी माघ महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाई जाती है, और इस दिन घर-घर में सरस्वती पूजा होती है। सरस्वती विद्या, वाणी, संगीत और कला की देवी हैं, इसलिए विद्यार्थी, कलाकार और शिक्षक इस दिन का ख़ास इंतज़ार करते हैं। पूजा सुबह के समय (पूर्वाह्न में) की जाती है, पीले कपड़े पहने जाते हैं और पीला भोग लगाया जाता है।
2027 में वसंत पंचमी 11 फ़रवरी (नई दिल्ली पंचांग) को है। हर साल की तिथि और पूजा मुहूर्त वसंत पंचमी पृष्ठ पर देखें।
वसंत पंचमी का महत्व
पौराणिक मान्यता है कि सृष्टि बनाने के बाद ब्रह्मा जी को संसार मौन और नीरस लगा। तब देवी सरस्वती वीणा लेकर प्रकट हुईं और उनके स्वर से संसार को वाणी और संगीत मिला। इसीलिए इस दिन को सरस्वती का प्राकट्य दिवस भी माना जाता है।
यह दिन ऋतु बदलने का संकेत भी है। खेतों में सरसों फूल जाती है, आम पर बौर आने लगता है और कड़ाके की सर्दी ढलने लगती है। ब्रज में इसी दिन से होली का उत्सव शुरू हो जाता है; वृंदावन के मंदिरों में ठाकुर जी को गुलाल लगाया जाता है और कई गाँवों में होलिका का डंडा गाड़ दिया जाता है। कई जगह इस दिन कामदेव और रति की पूजा का भी उल्लेख मिलता है, क्योंकि वसंत को कामदेव का सखा माना गया है।
उत्तर भारत में वसंत पंचमी को अबूझ मुहूर्त भी माना जाता है, यानी इस दिन विवाह, गृह प्रवेश, नया काम या पढ़ाई शुरू करने के लिए अलग से मुहूर्त निकलवाने की ज़रूरत नहीं समझी जाती।
सामग्री
- माँ सरस्वती की मूर्ति या तस्वीर, चौकी और पीला कपड़ा
- कलश, आम के पत्ते, नारियल
- पीले फूल (गेंदा, सरसों के फूल) और सफ़ेद फूल; माला
- हल्दी, केसर, रोली, सफ़ेद चंदन, अक्षत
- दीपक, घी, धूप-अगरबत्ती, कपूर
- भोग: केसरिया मीठे चावल, बूंदी के लड्डू या बेसन के लड्डू, बेर, मौसमी फल
- पूजन के लिए किताबें, कॉपी, कलम, और घर में हों तो वाद्य यंत्र (हारमोनियम, वीणा, तबला)
- बच्चों के विद्यारंभ के लिए स्लेट-चॉक, या थाली में चावल/आटा
कुछ न मिले तो परेशान न हों: तस्वीर की जगह एक साफ़ किताब पर "सरस्वती" लिखकर, एक दीपक और घर की कोई मिठाई के साथ भी पूजा पूरी मानी जाती है। केसर न हो तो हल्दी से चावल पीले कर लें।
पूजा विधि
- सुबह स्नान करके पीले या सफ़ेद कपड़े पहनें। पूजा का स्थान साफ़ करें।
- उत्तर या पूर्व दिशा में चौकी रखें, पीला कपड़ा बिछाएँ और माँ सरस्वती की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। पास में कलश रखें।
- हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प करें: अपना नाम, गोत्र और "विद्या-बुद्धि की प्राप्ति के लिए सरस्वती पूजन करता/करती हूँ" कहें।
- पहले गणेश जी का स्मरण करें और उन्हें रोली-अक्षत चढ़ाएँ।
- माँ सरस्वती को जल से आचमन कराएँ, फिर चंदन, हल्दी-केसर, अक्षत, पीले-सफ़ेद फूल और माला चढ़ाएँ।
- किताबें, कलम और वाद्य यंत्र माँ के चरणों के पास रखें और उन पर भी रोली-अक्षत-फूल चढ़ाएँ।
- दीपक और धूप जलाएँ। मंत्र का जाप करें: "ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः" (कम से कम 11 या 108 बार)। प्रसिद्ध वंदना "या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता…" का पाठ भी किया जाता है।
- भोग लगाएँ: पीले मीठे चावल, लड्डू, बेर और फल।
- आख़िर में सरस्वती माता की आरती गाएँ और प्रसाद बाँटें।
पूजा का शुभ समय सुबह से दोपहर तक (पूर्वाह्न) माना जाता है; अपने शहर के सूर्योदय और राहु काल के लिए आज का पंचांग देख लें।
पीला भोग और पीले कपड़े
पीला रंग वसंत का रंग है: सरसों के खेत, गेंदे के फूल और गुनगुनी धूप। इसीलिए इस दिन घर में पीले कपड़े पहने जाते हैं और खाना भी पीला बनता है:
- केसरिया या मीठे पीले चावल: उत्तर प्रदेश और बिहार में सबसे आम भोग।
- बूंदी या बेसन के लड्डू, राजभोग, केसरिया खीर।
- खिचड़ी या पीली दाल: कई घरों में दोपहर का भोजन।
- बेर: बिहार और बंगाल में मान्यता है कि सरस्वती पूजा से पहले साल का पहला बेर नहीं खाते; पूजा में चढ़ाने के बाद ही बेर खाना शुरू होता है।
पंजाब और हरियाणा में इस दिन पीली पतंगें उड़ाने का भी चलन है।
विद्यारंभ और कलम-किताब पूजन
बहुत से परिवार दो-तीन साल के बच्चे को इसी दिन पहली बार अक्षर लिखवाते हैं। इसे विद्यारंभ या अक्षर-आरंभ कहते हैं, जो सोलह संस्कारों में गिना जाता है। तरीका सरल है:
- पूजा के बाद बच्चे को माँ सरस्वती के सामने गोद में बिठाएँ।
- थाली में चावल या आटा फैलाएँ, या नई स्लेट रखें।
- बच्चे की उँगली पकड़कर पहले "ॐ" लिखवाएँ, फिर "श्री" और वर्णमाला का पहला अक्षर "अ"।
- बच्चे को नई किताब और कलम भेंट करें, और घर के बड़े आशीर्वाद दें।
बड़े विद्यार्थी अपनी किताबें, कॉपियाँ और कलम पूजा में रखते हैं। बिहार और बंगाल में इस दिन किताबें माँ के चरणों में रखी रहती हैं और पढ़ाई नहीं की जाती; अगले दिन पूजा के बाद ही किताबें उठाई जाती हैं। संगीत सीखने वाले अपने वाद्य की पूजा करके उस दिन पहला सुर माँ को अर्पित करते हैं।
बिहार-बंगाल के पंडाल
बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बंगाल और असम में सरस्वती पूजा का रंग अलग ही होता है। स्कूल, कॉलेज, कोचिंग और मोहल्लों के युवा हफ़्तों पहले से चंदा इकट्ठा करते हैं, मिट्टी की प्रतिमा लाते हैं और पंडाल सजाते हैं। पूजा के दिन सुबह पुरोहित से पूजा और पुष्पांजलि होती है, दोपहर में खिचड़ी-भोग बँटता है और शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। एक-दो दिन बाद प्रतिमा का विसर्जन जुलूस के साथ होता है। इन राज्यों में इस पर्व का कैलेंडर नाम सरस्वती पूजा ही है।
विसर्जन के समय ध्यान रखें कि प्रतिमा मिट्टी की हो और रंग प्राकृतिक हों, और स्थानीय प्रशासन ने जो कुंड या घाट तय किए हों, वहीं विसर्जन करें।

