जय सरस्वती माता आरती
संक्षेप में:जय सरस्वती माता विद्या और वाणी की देवी माँ सरस्वती की सबसे प्रचलित आरती है। बसंत पंचमी, स्कूल-कॉलेज की सरस्वती पूजा और पढ़ाई शुरू करने से पहले इसे गाया जाता है।
पाठ
जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता।
सदगुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता॥
॥ जय सरस्वती माता ॥
चन्द्रवदनि पद्मासिनि, द्युति मंगलकारी।
सोहे शुभ हंस सवारी, अतुल तेजधारी॥
॥ जय सरस्वती माता ॥
बाएं कर में वीणा, दाएं कर माला।
शीश मुकुट मणि सोहे, गल मोतियन माला॥
॥ जय सरस्वती माता ॥
देवी शरण जो आए, उनका उद्धार किया।
पैठी मंथरा दासी, रावण संहार किया॥
॥ जय सरस्वती माता ॥
विद्या ज्ञान प्रदायिनि, ज्ञान प्रकाश भरो।
मोह अज्ञान और तिमिर का, जग से नाश करो॥
॥ जय सरस्वती माता ॥
धूप दीप फल मेवा, माँ स्वीकार करो।
ज्ञानचक्षु दे माता, जग निस्तार करो॥
॥ जय सरस्वती माता ॥
माँ सरस्वती की आरती, जो कोई जन गावे।
हितकारी सुखकारी, ज्ञान भक्ति पावे॥
॥ जय सरस्वती माता ॥
जय सरस्वती माता, जय जय सरस्वती माता।
सदगुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता॥
आरती का परिचय
यह माँ सरस्वती की वह आरती है जो बसंत पंचमी पर स्कूलों, कोचिंग संस्थानों और घरों में सबसे ज़्यादा गाई जाती है। इसके रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है; यह लोक-परंपरा से चली आ रही आरती है। सरस्वती जी को वाणी, विद्या, संगीत और कला की देवी माना जाता है, इसलिए विद्यार्थी और कलाकार इसे खास श्रद्धा से गाते हैं।
पहला पद: टेक
हे सरस्वती माँ, आपकी जय हो। आप सद्गुणों के वैभव से भरी हैं और तीनों लोकों में प्रसिद्ध हैं।
दूसरा और तीसरा पद: माँ का रूप
चंद्रमा जैसे मुख वाली, कमल पर बैठने वाली माँ की आभा मंगल करने वाली है। वे सुंदर हंस पर सवार हैं और उनका तेज अतुलनीय है। बाएं हाथ में वीणा, दाएं हाथ में माला, सिर पर मणि-जड़ा मुकुट और गले में मोतियों की माला है।
चौथा पद: रामकथा का संकेत
जो देवी की शरण आए, उनका उद्धार हुआ। लोक-मान्यता है कि सरस्वती जी ने ही मंथरा की बुद्धि में प्रवेश किया, जिससे राम वन गए और आगे चलकर रावण का संहार हुआ। यह पद इसी कथा की ओर इशारा करता है।
पाँचवाँ और छठा पद: प्रार्थना
हे विद्या और ज्ञान देने वाली माँ, ज्ञान का प्रकाश भरिए और दुनिया से मोह, अज्ञान और अंधकार मिटाइए। धूप, दीप, फल और मेवा स्वीकार कीजिए, ज्ञान की आँख दीजिए और संसार का उद्धार कीजिए।
सातवाँ और आठवाँ पद
जो माँ सरस्वती की यह आरती गाता है, उसे हित और सुख देने वाला ज्ञान और भक्ति मिलती है। अंत में टेक दोहराई जाती है।
पाठ-भेद
भारतकोश के पाठ में टेक 'जय सरस्वती माता जय जय हे सरस्वती माता' है, पाँचवें पद में 'मोह और अज्ञान तिमिर का' और छठे पद में 'भव से उद्धार करो' मिलता है। बहुत से लोग टेक की शुरुआत 'ॐ जय सरस्वती माता' से करते हैं। यहाँ द्रिक पंचांग में दिया पाठ रखा गया है।
कब और कैसे पढ़ें
बसंत पंचमी पर पीले वस्त्र पहनकर, पीले फूल और केसरिया चावल या बूंदी का भोग लगाकर, किताबें-कलम माँ के सामने रखकर यह आरती गाएं। पूर्वी भारत और बिहार में सरस्वती पूजा पर पंडालों में भी यही आरती होती है। बच्चों के विद्यारंभ और परीक्षा से पहले भी इसे गाने का चलन है। नवरात्रि में इसके साथ जय अम्बे गौरी भी गाई जाती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सरस्वती माता की आरती कब करनी चाहिए?
बसंत पंचमी, सरस्वती पूजा, विद्यारंभ संस्कार और परीक्षा या कोई नई पढ़ाई शुरू करने से पहले।
आरती में मंथरा और रावण का ज़िक्र क्यों है?
लोक-मान्यता है कि देवताओं के कहने पर सरस्वती जी ने मंथरा की बुद्धि फेरी, जिससे राम वनवास गए और रावण का वध हुआ।
क्या यह आरती 'ॐ जय सरस्वती माता' से शुरू होती है?
बहुत से परिवार और मंदिर इसे 'ॐ जय सरस्वती माता' से शुरू करते हैं, जबकि कई पुस्तकों में बिना ॐ के 'जय सरस्वती माता' छपा है। दोनों रूप प्रचलित हैं।
बसंत पंचमी पर सरस्वती जी को क्या भोग लगाएं?
पीले रंग का भोग जैसे केसरिया चावल, बूंदी या बेसन के लड्डू और मौसमी फल चढ़ाने का चलन है।
