स

श्री सरस्वती दशश्लोकी स्तुतिः

संपादन: अद्यतन
स्तोत्र
0 व्यूज़

श्री सरस्वती दशश्लोकी स्तुतिः

ऋषय ऊचुः |
कथं सारस्वतप्राप्तिः केन ध्यानेन सुव्रत |
महासरस्वती येन तुष्टा भवति तद्वद || 1 ||

अश्वलायन उवाच |
शृण्वंतु ऋषयः सर्वे गुह्याद्गुह्यतमं महत् |
दशश्लोकीस्तुतिमिमां वदामि ध्यानपूर्वकं || 2 ||

ध्यानं –
अंकुशं चाक्षसूत्रं च पाशं पुस्तं च धारिणीं |
मुक्ताहारैः समायुक्तां देवीं ध्यायेच्चतुर्भुजां || 3 ||

सितेन दर्पणाभेन वक्त्रेण परिभूषितां |
सुस्तनीं वेदिमध्यां तां चंद्रार्धकृतशेखरां || 4 ||

जटाकलापसंयुक्तां पूर्णचंद्रनिभाननां |
त्रिलोचनीं महादेवीं स्वर्णनूपुरधारिणीं || 5 ||

कटकस्वर्णरत्नाढ्यमहावलयभूषितां |
कंबुकंठीं सुताम्रोष्टीं सर्वाभरणभूषितां || 6 ||

केयूरैर्मेखलाद्यैश्च द्योतयंतीं जगत्त्रयं |
शब्दब्रह्मारणिं ध्यायेद्ध्यानकामः समाहितः || 7 ||

वक्ष्ये सारस्वतं स्तोत्रं वाक्प्रवृत्तिकरं शुभं |
लक्ष्मीविवर्धनं चैव विवादे विजयप्रदं || 8 ||

परब्रह्मात्मिकां देवीं भुक्तिमुक्तिफलप्रदां |
प्रणम्य स्तौमि तामेव ज्ञानशक्तिं सरस्वतीं || 9 ||

स्तुतिः –
या वेदांतोक्ततत्त्वैकस्वरूपा परमार्थतः |
नामरूपात्मिका व्यक्ता सा मां पातु सरस्वती || 10 ||

या सांगोपांगवेदेषु चतुर्ष्वेकैव गीयते |
अद्वैता ब्रह्मणः शक्तिः सा मां पातु सरस्वती || 11 ||

या वर्णपदवाक्यार्थस्वरूपेणैव वर्तते |
अनादिनिधनानंता सा मां पातु सरस्वती || 12 ||

अध्यात्ममधिदेवं च देवानां सम्यगीश्वरी |
प्रत्यगात्मेव संती या सा मां पातु सरस्वती || 13 ||

अंतर्याम्यात्मना विश्वं त्रैलोक्यं या नियच्छति |
रुद्रादित्यादिरूपस्था सा मां पातु सरस्वती || 14 ||

या प्रत्यग्दृष्टिभिर्ज्ञानैर्व्यज्यमानानुभूयते |
व्यापिनी ज्ञप्तिरूपैका सा मां पातु सरस्वती || 15 ||

नामजात्यादिभिर्भेदैरष्टधा या विकल्पिता |
निर्विकल्पात्मिका चैव सा मां पातु सरस्वती || 16 ||

व्यक्ताव्यक्तगिरः सर्वे देवाद्या व्याहरंति यां |
सर्वकामदुघा धेनुः सा मां पातु सरस्वती || 17 ||

यां विदित्वाखिलं बंधं निर्मथ्यामलवर्त्मना |
योगी याति परं स्थानं सा मां पातु सरस्वती || 18 ||

नामजात्यादिकं सर्वं यस्यामाविश्य तां पुनः |
ध्यायंती ब्रह्मरूपैका सा मां पातु सरस्वती || 19 ||

फलश्रुतिः –
यः कवित्वं निरातंकं भुक्तिं मुक्तिं च वांछति |
सोऽभ्यर्च्यैनां दशश्लोक्या भक्त्या स्तौतु सरस्वतीं || 20 ||

तस्यैवं स्तुवतो नित्यं समभ्यर्च्य सरस्वतीं |
भक्तिश्रद्धाभियुक्तस्य षण्मासात् प्रत्ययो भवेत् || 21 ||

ततः प्रवर्तते वाणी स्वेच्छया ललिताक्षरा |
गद्यपद्यात्मिका विद्या प्रमेयैश्च विवर्तते || 22 ||

अश्रुतो बुध्यते ग्रंथः प्रायः सारस्वतः कविः |
श्रुतं च धारयेदाशु स्खलद्वाक् स्पष्टवाग्भवेत् || 23 ||

प्रख्यातः सर्वलोकेषु वाग्मी भवति पूजितः |
अजितः प्रतिपक्षाणां स्वयं जेताऽधिजायते || 24 ||

अयोध्यैर्वेदबाह्यैर्वा विवादे प्रस्तुते सति |
अहं वाचस्पतिर्विष्णुः शिवो वास्मीति भावयेत् || 25 ||

एवं भावयता तेन बृहस्पतिरपि स्वयं |
न शक्नोति परं वक्तुं नरेष्वन्येषु का कथा || 26 ||

न कांचन स्त्रियं निंदेत् न देवान्नापि च द्विजान् |
अनार्यैर्नाभिभाषेत सर्वत्रैव क्षमी भवेत् || 27 ||

सर्वत्रैव प्रियं ब्रूयात् यथेच्छालब्धमात्मनः |
श्लोकैरेव तिरस्कृत्य द्विषंतं प्रतिवादिनं || 28 ||

प्रतिवादिगजानां तु सिंहो भवति तद्वचः |
यद्वागितिद्व्यृचेनैव देवीं योऽर्चति सुव्रतः |
तस्य नासंस्कृता वाणी मुखादुच्चारिता क्वचित् || 29 ||

प्रथमं भारती नाम द्वितीयं च सरस्वती |
तृतीयं शारदा देवी चतुर्थं कंसमर्दनी || 30 ||

पंचमं तु जगन्माता षष्ठं चैव तु पार्वती |
सप्तमं चैव कामक्षी ह्यष्टमं ब्रह्मचारिणी || 31 ||

नवमं चैव वाराही दशमं ब्रह्मपुत्रिका |
एकादशं च वाग्देवी द्वादशं वरदांबिका || 32 ||

द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः |
तस्य सारस्वतं चैव षण्मासेनैव सिध्यति || 33 ||

यस्याः स्मरणमात्रेण वाग्विभूतिर्विजृंभते |
सा भारती प्रसन्नाक्षी रमतां मन्मुखांबुजे || 34 ||

इत्याश्वलायनमुनिर्निजगाद देव्याः
स्तोत्रं समस्तफलभोगनिधानभूतं |
एतत् पठन् द्विजवरः शुचितामुपैति
संध्यासु वांछितमुपैतिन संशयोऽत्र || 35 ||

इति अश्वलायन प्रोक्त श्री सरस्वती दशश्लोकी स्तुतिः ||

अर्थ

श्री सरस्वती दशश्लोकी स्तुति अश्वलायन मुनि द्वारा ऋषियों के प्रश्नों के उत्तर में कही गई है - "सरस्वती माता का ध्यान कैसे करें? उन्हें कैसे प्रसन्न करें?" इन प्रश्नों के उत्तर में यह दशश्लोकी स्तोत्र निर्मित हुआ। यह केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि ज्ञान और वाक्शक्ति प्राप्त करने के इच्छुक साधकों के लिए एक गहन मार्गदर्शिका है। इसके ध्यान और स्तोत्र के माध्यम से देवी की कृपा प्राप्त करने के सभी रहस्यों को यहां उजागर किया गया है।

ध्यान खंड में (श्लोक 3-9), देवी सरस्वती का चतुर्भुज रूप में ध्यान करने का विधान है, जिनके करों में मणिमाला, पुस्तक, जपमाला, पाश और अंकुश सुशोभित हैं। उनका मुख चंद्रमा के समान प्रकाशमान है, जो जटाजूट, स्वर्ण नूपुरों, मोतियों की मालाओं और कांतिमान वस्त्रों से अलंकृत है। वे ज्ञान की साक्षात मूर्ति के रूप में दर्शन देती हैं। वे शुद्ध, तेजस्वी और कमल पर विराजमान हैं - जो वाणी (वाक्) का ही साकार रूप हैं। इस दिव्य रूप का ध्यान मन को शुद्ध करता है और ज्ञान के मार्ग को प्रशस्त करता है।

स्तुति खंड में (श्लोक 10-19), सरस्वती देवी के आध्यात्मिक महत्व का विस्तृत वर्णन है। वे वेदांत में प्रतिपादित सत्य स्वरूपा हैं, नाम-रूप जगत का सार हैं, साक्षात परम तत्वमयी हैं। वेदों में प्रशंसित, अद्वैत ब्रह्मशक्ति के रूप में प्रसिद्ध माता सभी जीवों की रक्षा करती हैं। वर्ण, पद और वाक्यार्थ - ये सभी उनका ही स्वरूप हैं। वे अंतर्यामी हैं, भक्तों के हृदय में नित्य सन्निहित रहती हैं। रुद्र और आदित्य के रूप में तीनों लोकों को नियंत्रित करने वाली शक्ति वे ही हैं। वे ज्ञानस्वरूपा, साक्षात चैतन्यरूपा हैं। नाम, जाति आदि भेदों से परे निर्विकल्प स्वरूपा वे ही हैं। देवता भी वाणी के रूप में उनकी आराधना करते हैं - वे सर्वकामधेनु के समान सभी शुभ इच्छाओं को पूर्ण करती हैं। उनका ध्यान करने वाला योगी पापबंधनों से मुक्त होकर परमपद को प्राप्त करता है। वाक्प्रवाह का मूल उनका ही चैतन्य है, और ध्यान करने वाले में वे ब्रह्मरूप में विकसित होती हैं।

इस दशश्लोकी स्तुति का नियमित पाठ अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान के प्रकाश को प्रज्वलित करता है। यह केवल शैक्षिक सफलता के लिए ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी मार्ग प्रशस्त करता है। इस स्तोत्र के माध्यम से देवी की आराधना करने वाले सभी कलाओं में, विवादों में विजय प्राप्त करते हैं और समाज में आदरणीय स्थान पाते हैं। यह स्तोत्र साधक को आत्म-साक्षात्कार की ओर भी ले जाता है।

लाभ (Benefits):

  • वाक्पटुता और काव्य-शक्ति: इस स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करने से स्पष्ट, प्रभावशाली बोलने की क्षमता और काव्य रचना की प्रतिभा प्राप्त होती है।
  • ज्ञान और विवेक: देवी की कृपा से सभी शास्त्रों का ज्ञान, ग्रहण शक्ति और सही-गलत का विवेक बढ़ता है।
  • भुक्ति और मुक्ति: भौतिक सुख-समृद्धि के साथ-साथ, अंततः मोक्ष प्राप्ति का मार्ग भी सुगम होता है।
  • वाद-विवाद में विजय: किसी भी वाद-विवाद, प्रतियोगिता या बहस में विजय प्राप्त करने में सहायता मिलती है।
  • अज्ञान का नाश: अज्ञानता का निवारण होता है और आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह श्री सरस्वती दशश्लोकी स्तुति क्या है?
यह स्तुति महर्षि अश्वलायन द्वारा ऋषियों के प्रश्नों के उत्तर में कही गई है कि सरस्वती देवी का ध्यान कैसे करें और उन्हें कैसे प्रसन्न करें। यह देवी के दिव्य रूप, महिमा और पूजा विधि का वर्णन करती है।
इस स्तुति का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तुति का पाठ सुबह स्नान के बाद, स्वच्छ और शांत वातावरण में करना श्रेष्ठ है। सरस्वती देवी के चित्र या मूर्ति के सामने बैठकर, ध्यानपूर्वक और भक्तिभाव से इसका पाठ करना चाहिए।
इस स्तुति का पाठ करने से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तुति का पाठ करने से वाक्पटुता, ज्ञान, स्मरण शक्ति और काव्य रचना की क्षमता बढ़ती है। यह अज्ञान को दूर कर भुक्ति (भौतिक सुख) और मुक्ति (मोक्ष) दोनों प्रदान करती है।
इस स्तुति का पाठ कौन कर सकता है?
विद्यार्थी, शिक्षक, लेखक, वक्ता, कलाकार और ज्ञान, वाक्पटुता तथा रचनात्मकता चाहने वाले सभी लोग इस स्तुति का पाठ कर सकते हैं। यह सभी के लिए शुभ फलदायी है।
इस स्तुति का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
प्रतिदिन कम से कम एक बार भक्तिपूर्वक पाठ किया जा सकता है। विशेष लाभ के लिए, फलश्रुति में छह महीने तक नित्य पाठ करने से वाग्देवी की विशेष कृपा प्राप्त होने का उल्लेख है।
इस स्तुति का मूल स्रोत क्या है?
यह श्री सरस्वती दशश्लोकी स्तुति महर्षि अश्वलायन द्वारा अन्य ऋषियों को उपदेशित की गई थी। इसे सरस्वती देवी का ध्यान और उनकी आराधना करने की विधि समझाने के लिए कहा गया था।

टिप्पणियाँ

टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें

टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...