2026

पौष अमावस्या 2026

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मुख्य विवरण

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पौष अमावस्या

पौष अमावस्या क्या है

पौष अमावस्या कड़ाके की सर्दी के महीने पौष की अमावस्या है। पौष को सूर्य उपासना का महीना माना जाता है, इसलिए इस अमावस्या पर सुबह स्नान के बाद सूर्य को अर्घ्य, पितरों का तर्पण और ज़रूरतमंदों को गर्म कपड़े व अन्न देने की परंपरा है। कई परिवार पितृ दोष की शांति के लिए इस दिन विशेष श्राद्ध या दान करते हैं।

किस तिथि को

पूर्णिमांत पंचांग में यह पौष कृष्ण अमावस्या है, जो प्रायः दिसंबर के उत्तरार्ध या जनवरी की शुरुआत में आती है। अमांत पंचांग में इसे मार्गशीर्ष अमावस्या कहते हैं। स्नान-दान सूर्योदय वाली अमावस्या पर किया जाता है।

खरमास और पौष अमावस्या

सूर्य जब धनु राशि में रहते हैं, उस लगभग एक महीने को खरमास कहते हैं, और पौष अमावस्या अक्सर इसी अवधि में पड़ती है। इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश और मुंडन जैसे मांगलिक काम टाले जाते हैं, पर जप, दान, तीर्थ स्नान और सूर्य पूजा को बहुत फलदायी माना जाता है। खरमास के नियम खरमास क्या है में पढ़ें।

कैसे मनाते हैं

  • सूर्योदय के समय ताँबे के लोटे से जल, लाल फूल और गुड़ डालकर सूर्य को अर्घ्य। सही तरीका सूर्य को जल कैसे चढ़ाएं में है।
  • पितरों के लिए तिल-जल तर्पण और पीपल की जड़ में जल।
  • कंबल, रज़ाई, ऊनी कपड़े, तिल, गुड़ और खिचड़ी की सामग्री का दान।
  • गायों को गुड़ और हरा चारा खिलाना।

आगे-पीछे के पर्व

पूर्णिमांत गणना में इसी कृष्ण पक्ष की एकादशी सफला एकादशी है। अमावस्या के बाद शुक्ल पक्ष में पौष पुत्रदा एकादशी आती है, और खरमास का अंत मकर संक्रांति पर होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पौष अमावस्या पर क्या करना चाहिए?
सुबह स्नान, सूर्य को अर्घ्य, पितरों का तर्पण और कंबल, गुड़, तिल व अन्न का दान इस दिन के मुख्य कर्म हैं।
अमांत पंचांग में पौष अमावस्या को क्या कहते हैं?
अमांत पंचांग में यही दिन मार्गशीर्ष अमावस्या कहलाता है।
क्या पौष अमावस्या खरमास में आती है?
अक्सर हाँ, क्योंकि सूर्य का धनु राशि में रहना आमतौर पर मध्य दिसंबर से मध्य जनवरी तक होता है। सटीक स्थिति हर साल के पंचांग पर निर्भर करती है।
क्या इस दिन शादी या गृह प्रवेश कर सकते हैं?
अमावस्या और खरमास दोनों के कारण आमतौर पर इस दिन मांगलिक काम नहीं किए जाते।
पौष मास में सूर्य पूजा क्यों होती है?
पौष को सूर्य देव का महीना माना जाता है; ठंड के इस समय सूर्य को अर्घ्य और धूप में बैठकर जप करना परंपरा का हिस्सा है।

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