पौष पुत्रदा एकादशी
पौष पुत्रदा एकादशी क्या है
पौष पुत्रदा एकादशी संतान की कामना और संतान के सुख-स्वास्थ्य के लिए रखा जाने वाला व्रत है। साल में दो पुत्रदा एकादशी आती हैं; दूसरी सावन में होती है। उत्तर भारत में पौष वाली पुत्रदा एकादशी को दंपती अक्सर साथ मिलकर रखते हैं। जिनके घर संतान है, वे भी बच्चों की लंबी उम्र और अच्छी बुद्धि के लिए यह व्रत करते हैं।
किस तिथि को आती है
यह पौष शुक्ल पक्ष की एकादशी है, जो पूर्णिमांत और अमांत दोनों में पौष ही कहलाती है। व्रत सूर्योदय के समय की एकादशी पर होता है और पारण अगले दिन द्वादशी में।
कथा संक्षेप में
भद्रावती नगरी के राजा सुकेतुमान और रानी शैब्या के कोई संतान नहीं थी। राजा को चिंता थी कि उनके बाद पितरों को तर्पण कौन देगा। दुखी होकर वे वन में चले गए और एक सरोवर के किनारे तप कर रहे मुनियों (विश्वेदेवों) से मिले। मुनियों ने उन्हें पौष शुक्ल एकादशी का व्रत करने को कहा। राजा-रानी ने विधि से व्रत किया और समय आने पर उन्हें तेजस्वी पुत्र हुआ।
पूजा कैसे करें
पति-पत्नी सुबह स्नान करके साथ संकल्प लें। भगवान विष्णु या बाल गोपाल की पूजा पंचामृत, पीले फूल, तुलसी दल, फल और माखन-मिश्री से करें। कई घरों में लड्डू गोपाल का विशेष श्रृंगार होता है। कथा सुनकर ॐ जय जगदीश हरे की आरती करें और शाम को दीपदान करें। अगले दिन पारण से पहले किसी बच्चे या ब्राह्मण को भोजन कराना शुभ माना जाता है। सामान्य एकादशी व्रत कथा और पारण के नियम एकादशी पारण लेख में पढ़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
पौष पुत्रदा एकादशी कब है?
साल में कितनी पुत्रदा एकादशी होती हैं?
यह व्रत कौन रख सकता है?
इस दिन किसकी पूजा करें?
कथा में किस राजा का वर्णन है?
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