लड्डू गोपाल की सेवा का मूल भाव यह है कि घर में श्रीकृष्ण का बाल रूप एक छोटे बच्चे की तरह रहता है। उसे सुबह जगाया जाता है, नहलाया जाता है, कपड़े पहनाए जाते हैं, समय पर खिलाया जाता है और रात को सुलाया जाता है। नियम बहुत हैं, पर सबसे बड़ा नियम है रोज़ की नियमितता और प्रेम; जो सेवा आप हर दिन निभा सकें, वही सही सेवा है।
घर में लड्डू गोपाल: पहले क्या जानें
- मूर्ति: पीतल या अष्टधातु के घुटनों के बल बैठे, हाथ में लड्डू लिए बाल कृष्ण सबसे आम हैं। छोटी मूर्ति घर के लिए सुविधाजनक रहती है, क्योंकि उसे रोज़ नहलाना और कपड़े बदलना होता है।
- प्रतिष्ठा: कई परिवार मूर्ति लाकर किसी मंदिर में या पुरोहित से प्राण प्रतिष्ठा करवाते हैं, कई जन्माष्टमी या किसी शुभ दिन सीधे घर में पंचामृत स्नान कराके सेवा शुरू करते हैं। अपनी परंपरा के अनुसार करें।
- स्थान: साफ़, ऊँचा स्थान; छोटा सिंहासन या झूला। रसोई के पास हो तो भोग लगाना आसान रहता है।
- ज़रूरी चीज़ें: स्नान के लिए छोटी थाली या कटोरी, साफ़ अंगोछा, दो-तीन जोड़ी पोशाक, मुकुट, बाँसुरी, छोटा तकिया-बिस्तर, भोग के लिए अलग छोटे बर्तन, घंटी।
ध्यान रहे, कई परिवारों में यह माना जाता है कि एक बार सेवा शुरू की तो लड्डू गोपाल को अकेला या भूखा नहीं छोड़ते। इसलिए घर लाने से पहले यह सोच लें कि रोज़ सुबह-शाम कौन सेवा करेगा।
सुबह जगाना और स्नान
- अपने स्नान के बाद, धीरे से घंटी बजाकर या भजन गुनगुनाकर लड्डू गोपाल को जगाएँ। ब्रज के मंदिरों में इस समय मंगला के पद गाए जाते हैं; घर में कोई भी प्रभाती या "राधे-राधे" का नाम काफ़ी है।
- जागते ही पहले थोड़ा जल या मिश्री-माखन दिखाएँ (मंगल भोग), फिर रात के कपड़े उतारें।
- स्नान थाली में बिठाकर पहले सादे जल से, फिर पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से और आख़िर में फिर शुद्ध जल से स्नान कराएँ। रोज़ पंचामृत न हो सके तो सादा जल या जल में थोड़ा दूध काफ़ी है; पंचामृत बनाने का सही तरीका पंचामृत कैसे बनाएं में है।
- सर्दियों में गुनगुना पानी और गर्मियों में सामान्य पानी लें, जैसा आप घर के बच्चे के लिए करते।
- मुलायम कपड़े से अच्छी तरह पोंछें, ख़ास तौर पर बाँहों और पैरों के मोड़ में, ताकि नमी न रहे और धातु पर दाग न पड़ें।
- स्नान का जल चरणामृत की तरह घर वाले ले सकते हैं या तुलसी और पौधों में डाल दें; नाली में न बहाएँ।
श्रृंगार और वस्त्र
स्नान के बाद पोशाक पहनाएँ। रोज़ साफ़ कपड़े बदलें; त्योहारों पर नई पोशाक। मौसम का ध्यान सबसे ज़रूरी है: सर्दियों में ऊनी पोशाक, टोपी और रज़ाई, गर्मियों में सूती हल्के कपड़े और पास में छोटा पंखा। कई परिवार सावन में झूला सजाते हैं और जन्माष्टमी पर पीली या केसरिया पोशाक पहनाते हैं।
- माथे पर चंदन का तिलक; ब्रज में गोपी-चंदन का चलन है।
- मुकुट, कान के कुंडल, गले में छोटी माला या मोती, हाथ में बाँसुरी।
- इत्र की एक छोटी बूँद, ताज़े फूल; तुलसी की माला या एक तुलसी पत्र अवश्य।
- दर्पण दिखाना कई घरों में श्रृंगार का आख़िरी हिस्सा होता है।
भोग: दिन में कितनी बार
पुष्टिमार्गीय मंदिरों में दिन में आठ झाँकियाँ और कई भोग होते हैं, पर घर में चार-पाँच भोग भी बहुत हैं। व्यस्त परिवार सुबह और शाम दो बार भी भोग लगाते हैं, और बीच में घर में जो बने उसका पहला हिस्सा अर्पित कर देते हैं।
| भोग | समय | क्या चढ़ाएं |
|---|---|---|
| मंगल भोग | जगाने के तुरंत बाद | माखन-मिश्री, दूध, थोड़ा जल |
| श्रृंगार / बाल भोग | स्नान-श्रृंगार के बाद, सुबह | फल, मेवे, पेड़ा या घर का नाश्ता |
| राजभोग | दोपहर, लगभग खाने के समय | पूरा सात्विक भोजन: दाल, चावल, रोटी, सब्ज़ी, खीर या मीठा |
| उत्थापन भोग | दोपहर के विश्राम के बाद | फल, शरबत (गर्मी में), मिठाई |
| संध्या भोग | शाम की आरती के समय | हल्का नाश्ता, लड्डू, मेवा |
| शयन भोग | रात सुलाने से पहले | गुनगुना दूध, थोड़ी मिश्री |
भोग के नियम सरल हैं: प्याज़-लहसुन, मांस-अंडा न हो; भोग पर तुलसी पत्र रखें; भोग लगाने से पहले चखें नहीं। भोग के बर्तन अलग रखें। भोग थाली कुछ मिनट रखकर, परदा या दरवाज़ा थोड़ी देर बंद करके फिर हटा लें और प्रसाद सब में बाँट दें। एकादशी पर कई घरों में भोग में चावल नहीं रखते।
शयन
राजभोग के बाद दोपहर में थोड़ी देर विश्राम कराने का चलन है: हल्का परदा कर दें या बिस्तर पर लिटा दें। शाम को उत्थापन से जगाएँ। रात को शयन भोग के बाद श्रृंगार उतारें, मुकुट और गहने हटाकर रात के नरम कपड़े पहनाएँ, बिस्तर पर लिटाएँ और ओढ़नी या रज़ाई ओढ़ाएँ। शयन से पहले छोटी आरती या भजन गाया जाता है; आरती कुंजबिहारी की उत्तर भारत के घरों में सबसे ज़्यादा गाई जाने वाली कृष्ण आरती है, और बच्चों को सूरदास का पद मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो ख़ूब भाता है। रात को पास में एक गिलास पानी रखने की परंपरा भी कई घरों में है।
यात्रा और सूतक में सेवा
यात्रा: अगर घर में कोई रुकने वाला है तो उसे सेवा का समय और भोग समझा दें। अगर पूरा परिवार जा रहा है, तो बहुत से लोग लड्डू गोपाल को साथ ले जाते हैं: एक छोटा डिब्बा या टोकरी, साथ में दो जोड़ी कपड़े, मिश्री और तुलसी। सफ़र में जो सात्विक खाना आप खाएँ, उसका पहला हिस्सा भोग में लगाएँ। दूसरा रास्ता यह है कि कुछ दिनों के लिए उन्हें किसी परिचित परिवार या पास के मंदिर में सेवा के लिए सौंप दें।
सूतक: घर में जन्म या मृत्यु के बाद के सूतक में परिवार के लोग मूर्ति को छूकर सेवा नहीं करते, यह आम मान्यता है। ऐसे में परिवार से बाहर का कोई व्यक्ति, जैसे पड़ोसी या दूसरे घर में ब्याही बेटी, कुछ दिन स्नान-भोग कर दे। जहाँ यह संभव न हो, वहाँ कई परिवार दूर से प्रणाम करके, मन से भोग अर्पित करते हैं और सूतक खत्म होने पर शुद्धि के साथ सेवा फिर शुरू करते हैं। सूतक की अवधि और नियम कुल-परंपरा से अलग-अलग होते हैं, इसलिए अपने पुरोहित से पूछ लें।
बीमारी या बहुत व्यस्त दिन: सेवा छोड़ने से बेहतर है उसे छोटा कर दें: जल से स्नान, एक बार भोग, एक दीपक। भाव की सेवा भी सेवा ही है।
साल का सबसे बड़ा दिन लड्डू गोपाल का जन्मदिन यानी कृष्ण जन्माष्टमी है, जब आधी रात को पंचामृत अभिषेक और नई पोशाक होती है। उस दिन की पूरी विधि जन्माष्टमी पूजा विधि में है। बाल कृष्ण की सेवा का सबसे जीवंत रूप देखना हो तो वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर का दर्शन करें, जहाँ ठाकुर जी को आज भी बच्चे की तरह ही लाड़ लड़ाया जाता है।

