कालभैरव जयंती और भैरव पूजा विधि

कालभैरव जयंती मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है, जिस दिन शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव के क्रोध से कालभैरव प्रकट हुए। इस दिन व्रत, शाम या रात में सरसों के तेल के दीपक से भैरव पूजा, कालभैरवाष्टक का पाठ और काले कुत्ते को भोजन कराने की परंपरा है।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखन: · वेद पण्डित, लेखकअद्यतन · 5 मिनट का पाठ
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कालभैरव जयंती, जिसे भैरव अष्टमी या कालाष्टमी भी कहते हैं, मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है। शिव पुराण के अनुसार इसी दिन भगवान शिव के क्रोध से कालभैरव प्रकट हुए थे। इस दिन लोग व्रत रखते हैं, शाम या रात में भैरव बाबा की पूजा करते हैं, सरसों के तेल का दीपक जलाते हैं और कुत्तों को भोजन कराते हैं।

कालभैरव कौन हैं

कालभैरव भगवान शिव का उग्र रूप हैं। “काल” यानी समय और मृत्यु, और “भैरव” यानी भय को हरने वाले। जो समय से भी परे है और भक्त का डर दूर करता है, वही कालभैरव हैं।

शिव पुराण की शतरुद्र संहिता में उनकी उत्पत्ति की कथा आती है। एक बार ब्रह्मा जी अपने पाँचवें मुख से अहंकार में शिव का अपमान करने लगे। तब शिव के क्रोध से एक भयंकर तेजस्वी रूप प्रकट हुआ, जिसने अपने नाखून से ब्रह्मा जी का वह पाँचवाँ सिर काट दिया। यही कालभैरव थे।

पर ब्रह्मा का सिर काटने से उन पर ब्रह्महत्या का दोष लगा और वह कपाल उनके हाथ से चिपक गया। कपाल हाथ में लिए वे तीनों लोकों में भटकते रहे। जब वे काशी पहुँचे, तो वह कपाल अपने आप हाथ से छूट गया और वे दोष से मुक्त हुए। जहाँ कपाल गिरा, वह स्थान आज कपाल मोचन तीर्थ कहलाता है। यह कथा बताती है कि अहंकार चाहे सृष्टिकर्ता का ही क्यों न हो, टिकता नहीं।

भैरव के कई रूप बताए गए हैं। गृहस्थों में बटुक भैरव, यानी बाल रूप, की सौम्य पूजा ज़्यादा प्रचलित है, जबकि कालभैरव का उग्र रूप तंत्र परंपरा में भी पूजा जाता है।

कब: मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी

उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग में कालभैरव जयंती मार्गशीर्ष (अगहन) कृष्ण अष्टमी को आती है, यानी कार्तिक पूर्णिमा के लगभग आठ दिन बाद। गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण के अमांत पंचांग में इसी दिन को कार्तिक कृष्ण अष्टमी कहा जाता है; दिन एक ही है, बस महीने का नाम अलग है।

2026 में कालभैरव जयंती 1 दिसंबर को और 2027 में 20 नवंबर को है। अष्टमी तिथि और रात्रि पूजा का समय कालभैरव जयंती पृष्ठ पर देखें। भैरव पूजा में रात का महत्व है, इसलिए वह दिन चुना जाता है जिस रात अष्टमी तिथि हो।

मार्गशीर्ष को गीता में भगवान ने “मासानां मार्गशीर्षोऽहम्” कहा है। इस महीने के बाकी व्रत-त्योहार मार्गशीर्ष मास का महत्व लेख में हैं।

पूजा विधि

कालभैरव जयंती की पूजा घर पर सरल रूप में की जा सकती है:

  1. सुबह: स्नान करके व्रत का संकल्प लें। कई लोग दिन भर फलाहार रखते हैं।
  2. शिव पूजा: पहले शिवलिंग पर जल, बेलपत्र और धतूरा चढ़ाएँ। भैरव शिव के ही रूप हैं, इसलिए उनकी पूजा शिव पूजन के साथ ही पूरी मानी जाती है।
  3. शाम या रात की तैयारी: सूर्यास्त के बाद भैरव बाबा की तस्वीर या भैरव यंत्र को चौकी पर रखें। काले या गहरे नीले कपड़े का आसन बहुत से घरों में रखा जाता है।
  4. दीपक: सरसों के तेल का चौमुखा दीया जलाएँ। कई लोग इसमें थोड़े काले तिल डालते हैं।
  5. अर्पण: सिंदूर या रोली, काले तिल, उड़द, नारियल, पान-सुपारी, फूल और भोग में इमरती, जलेबी या उड़द के बड़े।
  6. मंत्र: “ॐ कालभैरवाय नमः” की एक माला, या आदि शंकराचार्य रचित कालभैरवाष्टक का पाठ, जो “देवराजसेव्यमानपावनाङ्घ्रिपङ्कजं” से शुरू होता है।
  7. शिव चालीसा और आरती: शिव चालीसा पढ़ें और भैरव जी की आरती करें।
  8. कुत्ते को भोजन: पूजा के बाद रोटी, जलेबी या इमरती कुत्ते को खिलाएँ।
  9. जागरण और पारण: कई भक्त रात में भजन-कीर्तन करते हैं और अगली सुबह पूजा करके व्रत खोलते हैं।

उज्जैन के कालभैरव मंदिर जैसे कुछ प्राचीन स्थानों पर मदिरा चढ़ाने की परंपरा है, जो वहाँ की तांत्रिक रीत का हिस्सा है। घर की पूजा में यह नहीं किया जाता; गृहस्थ के लिए सात्विक भोग ही उचित है।

कुत्ते को भोजन क्यों

कुत्ता कालभैरव का वाहन माना जाता है, इसलिए भैरव मंदिरों के आसपास और तस्वीरों में उनके साथ कुत्ता दिखता है। भैरव जयंती और हर कालाष्टमी को कुत्ते को भोजन कराना भैरव की सेवा मानी जाती है, खासकर काले कुत्ते को।

  • सादी रोटी पर सरसों का तेल लगाकर, या दूध-रोटी दें।
  • इमरती या जलेबी भोग के रूप में दे सकते हैं, पर बहुत ज़्यादा मीठा न खिलाएँ।
  • गली के कुत्तों को परेशान करना, पत्थर मारना भैरव भक्त के लिए ठीक नहीं माना जाता।
  • सबसे अच्छी सेवा यह है कि सर्दी के इन दिनों में बेसहारा जानवरों के लिए पानी और खाना रखा जाए।

काशी के कोतवाल

कपाल से मुक्त होने के बाद शिव ने कालभैरव को काशी का रक्षक बना दिया, इसलिए उन्हें “काशी का कोतवाल” कहा जाता है। वाराणसी में मान्यता है कि काशी में रहने के लिए भैरव जी की अनुमति चाहिए, और विश्वनाथ जी के दर्शन के बाद कालभैरव के दर्शन किए बिना काशी यात्रा पूरी नहीं होती।

वाराणसी का कालभैरव मंदिर विश्वेश्वरगंज क्षेत्र में है। भैरव जयंती पर यहाँ भारी भीड़ होती है और बाबा का विशेष श्रृंगार किया जाता है। दर्शन, आरती और काशी यात्रा की बाकी जानकारी काशी विश्वनाथ मंदिर दर्शन लेख में है। मंदिर के समय और नियम बदलते रहते हैं, इसलिए जाने से पहले स्थानीय रूप से पुष्टि करें।

मासिक कालाष्टमी

भैरव जयंती साल में एक बार आती है, पर हर महीने कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मासिक कालाष्टमी होती है। भैरव भक्त हर कालाष्टमी को व्रत रखते हैं और शाम को सरसों के तेल का दीया जलाकर भैरव पूजा करते हैं। साल की सभी कालाष्टमी तिथियाँ कालाष्टमी कैलेंडर में देखें।

  • अगर कालभैरव जयंती से शुरुआत करें, तो साल भर हर कालाष्टमी का नियम लेना शुभ माना जाता है।
  • रविवार और मंगलवार को पड़ने वाली कालाष्टमी को भैरव भक्त विशेष मानते हैं।
  • पूजा छोटी हो सकती है: एक दीया, “ॐ कालभैरवाय नमः” की माला और कुत्ते को रोटी।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कालभैरव जयंती कब मनाई जाती है?

मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को, जो अमांत पंचांग में कार्तिक कृष्ण अष्टमी कहलाती है। 2026 में यह 1 दिसंबर और 2027 में 20 नवंबर को है।

कालभैरव की पूजा कब करनी चाहिए?

भैरव पूजा का मुख्य समय शाम और रात है। सूर्यास्त के बाद सरसों के तेल का दीपक जलाकर पूजा और मंत्र जाप करें।

कालभैरव को क्या भोग लगाएं?

घर की पूजा में इमरती, जलेबी, उड़द के बड़े, नारियल, पान और काले तिल चढ़ाए जाते हैं। गृहस्थों के लिए सात्विक भोग ही उचित है।

कालभैरव जयंती पर कुत्ते को खाना क्यों खिलाते हैं?

कुत्ता कालभैरव का वाहन माना जाता है, इसलिए उसे भोजन कराना भैरव की सेवा समझी जाती है।

कालभैरव को काशी का कोतवाल क्यों कहते हैं?

ब्रह्महत्या के दोष से काशी में मुक्त होने के बाद शिव ने उन्हें काशी का रक्षक नियुक्त किया, इसलिए वे काशी के कोतवाल कहलाते हैं।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखक के बारे में

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा

वेद पण्डित, लेखक

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा जी वेद पण्डित और लेखक हैं। अनेक वर्षों से वे दुर्गा देवी की आराधना का अध्ययन और आचरण करते आ रहे हैं। पूजा विधि, मंत्रों और स्तोत्रों को सामान्य भक्तों के लिए सरलता से समझाना उनका लक्ष्य है। वे “श्री दुर्गा नित्याराधना” ग्रंथ के लेखक हैं। इस साइट के लेख उनकी रचनाएँ हैं, या उनके ग्रंथों पर आधारित हैं।

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