काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी में गंगा के पश्चिमी तट पर स्थित है और बारह ज्योतिर्लिंगों में गिना जाता है। यहाँ शिव को विश्वेश्वर, यानी पूरे संसार के स्वामी के रूप में पूजा जाता है। श्रद्धालु दिनभर दर्शन करते हैं, और भोर की मंगला आरती, शाम की सप्तर्षि आरती और रात की शयन आरती में शामिल होना बहुत लोगों का सपना होता है।
ज्योतिर्लिंग और काशी का महत्व
शिव पुराण में काशी को अविमुक्त क्षेत्र कहा गया है, यानी वह स्थान जिसे शिव कभी नहीं छोड़ते। लोक मान्यता है कि काशी शिव के त्रिशूल पर टिकी है और प्रलय में भी नष्ट नहीं होती। स्कन्द पुराण के काशी खंड में इस नगरी की महिमा विस्तार से है। यहाँ यह भी माना जाता है कि काशी में देह छोड़ने वाले के कान में स्वयं शिव तारक मंत्र देते हैं, इसीलिए बहुत से बुज़ुर्ग अंतिम दिन काशी में बिताना चाहते हैं।
बारह ज्योतिर्लिंगों में काशी विश्वनाथ का स्थान सातवाँ बताया जाता है। बाकी ज्योतिर्लिंगों के नाम और स्थान 12 ज्योतिर्लिंग लेख में देखें।
मंदिर का इतिहास
विश्वनाथ का मंदिर सदियों में कई बार टूटा और कई बार बना। आज जो मुख्य मंदिर दिखता है, उसे इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने अठारहवीं सदी के आख़िरी दौर में बनवाया था। बाद में पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने शिखर पर सोना चढ़वाने के लिए दान दिया, इसीलिए लोग इसे स्वर्ण मंदिर भी कहते हैं। गर्भगृह छोटा है और शिवलिंग चाँदी की वेदी में स्थापित है।
दर्शन और आरतियाँ
मंदिर में दिन में पाँच प्रमुख आरतियाँ होती हैं:
| आरती | कब होती है | क्या खास है |
|---|---|---|
| मंगला आरती | भोर, सूर्योदय से पहले | दिन की पहली आरती, सबसे ज़्यादा माँग |
| भोग आरती | दोपहर | भगवान को मध्याह्न भोग |
| सप्तर्षि आरती | शाम | सात पुजारी मिलकर करते हैं, सप्तऋषियों की परंपरा |
| श्रृंगार / भोग आरती | रात के आरंभ में | शिवलिंग का श्रृंगार |
| शयन आरती | रात | दिन की अंतिम आरती, फिर पट बंद |
आरती और दर्शन का सटीक समय, आरती टिकट, सुगम दर्शन की व्यवस्था और उनका शुल्क मौसम, त्योहार और भीड़ के हिसाब से बदलते रहते हैं। सावन, महाशिवरात्रि और देव दीपावली के दिनों में तो नियम अलग ही होते हैं। इसलिए निकलने से पहले श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास की आधिकारिक वेबसाइट पर ताज़ा जानकारी देखें और टिकट केवल वहीं से लें। किसी दलाल या ‘जल्दी दर्शन’ का वादा करने वाले से बचें।
- मोबाइल, बैग, चमड़े का सामान आदि अंदर ले जाने के नियम बदलते रहते हैं; लॉकर की व्यवस्था रहती है, फिर भी कम सामान लेकर जाएँ।
- जलाभिषेक के लिए लोटा या दूध साथ ले जाने के नियम भी त्योहारों पर बदलते हैं; वहाँ के निर्देश मानें।
- भीड़ में बच्चों और बुज़ुर्गों का हाथ पकड़े रहें।
विश्वनाथ धाम कॉरिडोर
पहले मंदिर तक पहुँचने के लिए पुरानी काशी की बहुत संकरी गलियों से गुज़रना पड़ता था। अब काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर बन जाने से मंदिर सीधे गंगा के घाट से जुड़ गया है। श्रद्धालु ललिता घाट और मणिकर्णिका की ओर से गंगा स्नान करके सीधे मंदिर परिसर में आ सकते हैं, जैसे पुराने समय में आते थे। परिसर में बैठने की जगह, भोगशाला, संग्रहालय और कई छोटे पुराने मंदिर भी शामिल हैं। फिर भी गलियों वाली काशी का अपना रस है; समय हो तो विश्वनाथ गली और कचौड़ी गली से एक बार ज़रूर गुज़रें।
आसपास के दर्शन: कालभैरव, अन्नपूर्णा और गंगा आरती
कालभैरव
कालभैरव काशी के कोतवाल माने जाते हैं। परंपरा है कि काशी आने वाला पहले या बाद में बाबा कालभैरव के दर्शन करके उनसे अनुमति ले, तभी काशी यात्रा पूरी मानी जाती है। यहाँ काला धागा बाँधने और सरसों के तेल का दीपक जलाने का चलन है। भैरव पूजा की विधि कालभैरव जयंती और भैरव पूजा लेख में है।
माँ अन्नपूर्णा
विश्वनाथ मंदिर के पास ही माँ अन्नपूर्णा का मंदिर है। कथा है कि शिव ने स्वयं माँ अन्नपूर्णा से भिक्षा माँगी थी। धनतेरस से अन्नकूट तक यहाँ स्वर्ण अन्नपूर्णा के दर्शन खुलते हैं, जिनके लिए भारी भीड़ होती है।
दूसरे मंदिर
विशालाक्षी (शक्तिपीठ), संकटमोचन हनुमान, दुर्गा कुंड, तुलसी मानस मंदिर और थोड़ा दूर सारनाथ भी लोग इसी यात्रा में जोड़ते हैं।
गंगा आरती
दशाश्वमेध घाट और अस्सी घाट की संध्या गंगा आरती देखे बिना काशी यात्रा अधूरी लगती है। सुबह अस्सी घाट पर सुबह-ए-बनारस की आरती भी होती है। कार्तिक पूर्णिमा पर घाटों पर अनगिनत दीयों वाली देव दीपावली मनाई जाती है, जिसकी पूरी जानकारी कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली लेख में है।
बाबा को क्या चढ़ाएँ
विश्वनाथ जी को गंगाजल, बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल और दूध चढ़ाने की परंपरा है। बहुत से लोग घाट पर स्नान करके छोटे लोटे में गंगाजल भरकर लाते हैं और वही चढ़ाते हैं। भीड़ के दिनों में गर्भगृह के बाहर से ही जल अर्पित करने की व्यवस्था होती है, जिसे झाँकी दर्शन कहते हैं; इससे दर्शन का फल कम नहीं होता। बेलपत्र तीन पत्तियों वाला, बिना कटा-फटा हो, और चिकनी तरफ़ से शिवलिंग पर रखें। मंदिर के बाहर की दुकानों पर फूल-माला और प्रसाद मिल जाता है, पर दाम पहले पूछ लें। दर्शन के बाद मंदिर परिसर में थोड़ी देर बैठकर ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप करना काशी के अनुभव को और गहरा कर देता है।
यात्रा सुझाव
- भीड़ से बचना हो तो सोमवार, सावन, महाशिवरात्रि और छुट्टियों के अलावा कोई सामान्य दिन चुनें। तिथि और वार आज के पंचांग में देख लें।
- सुबह जल्दी गंगा स्नान करके दर्शन करना सबसे शांत अनुभव देता है।
- घाट से मंदिर और मंदिर से घाट पैदल चलना पड़ता है; आरामदायक चप्पल पहनें जिन्हें आसानी से उतार सकें।
- नाव से सुबह का घाट दर्शन करें, पर नाव का किराया पहले तय कर लें।
- दर्शन के बाद शिव जी की आरती गाना चाहें तो ॐ जय शिव ओंकारा साथ रखें।
- काशी में कम से कम दो दिन रखें: एक दिन विश्वनाथ-कालभैरव-अन्नपूर्णा के लिए और एक दिन घाटों और सारनाथ के लिए।

