काशी विश्वनाथ मंदिर: दर्शन, आरती और यात्रा

काशी विश्वनाथ वाराणसी में गंगा किनारे स्थित बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यहाँ दिन में पाँच आरतियाँ होती हैं, जिनमें भोर की मंगला आरती सबसे प्रसिद्ध है; दर्शन और आरती का समय मंदिर न्यास की आधिकारिक वेबसाइट पर देखकर ही जाएँ।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखन: · वेद पण्डित, लेखकअद्यतन · 5 मिनट का पाठ
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काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी में गंगा के पश्चिमी तट पर स्थित है और बारह ज्योतिर्लिंगों में गिना जाता है। यहाँ शिव को विश्वेश्वर, यानी पूरे संसार के स्वामी के रूप में पूजा जाता है। श्रद्धालु दिनभर दर्शन करते हैं, और भोर की मंगला आरती, शाम की सप्तर्षि आरती और रात की शयन आरती में शामिल होना बहुत लोगों का सपना होता है।

ज्योतिर्लिंग और काशी का महत्व

शिव पुराण में काशी को अविमुक्त क्षेत्र कहा गया है, यानी वह स्थान जिसे शिव कभी नहीं छोड़ते। लोक मान्यता है कि काशी शिव के त्रिशूल पर टिकी है और प्रलय में भी नष्ट नहीं होती। स्कन्द पुराण के काशी खंड में इस नगरी की महिमा विस्तार से है। यहाँ यह भी माना जाता है कि काशी में देह छोड़ने वाले के कान में स्वयं शिव तारक मंत्र देते हैं, इसीलिए बहुत से बुज़ुर्ग अंतिम दिन काशी में बिताना चाहते हैं।

बारह ज्योतिर्लिंगों में काशी विश्वनाथ का स्थान सातवाँ बताया जाता है। बाकी ज्योतिर्लिंगों के नाम और स्थान 12 ज्योतिर्लिंग लेख में देखें।

मंदिर का इतिहास

विश्वनाथ का मंदिर सदियों में कई बार टूटा और कई बार बना। आज जो मुख्य मंदिर दिखता है, उसे इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने अठारहवीं सदी के आख़िरी दौर में बनवाया था। बाद में पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने शिखर पर सोना चढ़वाने के लिए दान दिया, इसीलिए लोग इसे स्वर्ण मंदिर भी कहते हैं। गर्भगृह छोटा है और शिवलिंग चाँदी की वेदी में स्थापित है।

दर्शन और आरतियाँ

मंदिर में दिन में पाँच प्रमुख आरतियाँ होती हैं:

आरतीकब होती हैक्या खास है
मंगला आरतीभोर, सूर्योदय से पहलेदिन की पहली आरती, सबसे ज़्यादा माँग
भोग आरतीदोपहरभगवान को मध्याह्न भोग
सप्तर्षि आरतीशामसात पुजारी मिलकर करते हैं, सप्तऋषियों की परंपरा
श्रृंगार / भोग आरतीरात के आरंभ मेंशिवलिंग का श्रृंगार
शयन आरतीरातदिन की अंतिम आरती, फिर पट बंद

आरती और दर्शन का सटीक समय, आरती टिकट, सुगम दर्शन की व्यवस्था और उनका शुल्क मौसम, त्योहार और भीड़ के हिसाब से बदलते रहते हैं। सावन, महाशिवरात्रि और देव दीपावली के दिनों में तो नियम अलग ही होते हैं। इसलिए निकलने से पहले श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास की आधिकारिक वेबसाइट पर ताज़ा जानकारी देखें और टिकट केवल वहीं से लें। किसी दलाल या ‘जल्दी दर्शन’ का वादा करने वाले से बचें।

  • मोबाइल, बैग, चमड़े का सामान आदि अंदर ले जाने के नियम बदलते रहते हैं; लॉकर की व्यवस्था रहती है, फिर भी कम सामान लेकर जाएँ।
  • जलाभिषेक के लिए लोटा या दूध साथ ले जाने के नियम भी त्योहारों पर बदलते हैं; वहाँ के निर्देश मानें।
  • भीड़ में बच्चों और बुज़ुर्गों का हाथ पकड़े रहें।

विश्वनाथ धाम कॉरिडोर

पहले मंदिर तक पहुँचने के लिए पुरानी काशी की बहुत संकरी गलियों से गुज़रना पड़ता था। अब काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर बन जाने से मंदिर सीधे गंगा के घाट से जुड़ गया है। श्रद्धालु ललिता घाट और मणिकर्णिका की ओर से गंगा स्नान करके सीधे मंदिर परिसर में आ सकते हैं, जैसे पुराने समय में आते थे। परिसर में बैठने की जगह, भोगशाला, संग्रहालय और कई छोटे पुराने मंदिर भी शामिल हैं। फिर भी गलियों वाली काशी का अपना रस है; समय हो तो विश्वनाथ गली और कचौड़ी गली से एक बार ज़रूर गुज़रें।

आसपास के दर्शन: कालभैरव, अन्नपूर्णा और गंगा आरती

कालभैरव

कालभैरव काशी के कोतवाल माने जाते हैं। परंपरा है कि काशी आने वाला पहले या बाद में बाबा कालभैरव के दर्शन करके उनसे अनुमति ले, तभी काशी यात्रा पूरी मानी जाती है। यहाँ काला धागा बाँधने और सरसों के तेल का दीपक जलाने का चलन है। भैरव पूजा की विधि कालभैरव जयंती और भैरव पूजा लेख में है।

माँ अन्नपूर्णा

विश्वनाथ मंदिर के पास ही माँ अन्नपूर्णा का मंदिर है। कथा है कि शिव ने स्वयं माँ अन्नपूर्णा से भिक्षा माँगी थी। धनतेरस से अन्नकूट तक यहाँ स्वर्ण अन्नपूर्णा के दर्शन खुलते हैं, जिनके लिए भारी भीड़ होती है।

दूसरे मंदिर

विशालाक्षी (शक्तिपीठ), संकटमोचन हनुमान, दुर्गा कुंड, तुलसी मानस मंदिर और थोड़ा दूर सारनाथ भी लोग इसी यात्रा में जोड़ते हैं।

गंगा आरती

दशाश्वमेध घाट और अस्सी घाट की संध्या गंगा आरती देखे बिना काशी यात्रा अधूरी लगती है। सुबह अस्सी घाट पर सुबह-ए-बनारस की आरती भी होती है। कार्तिक पूर्णिमा पर घाटों पर अनगिनत दीयों वाली देव दीपावली मनाई जाती है, जिसकी पूरी जानकारी कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली लेख में है।

बाबा को क्या चढ़ाएँ

विश्वनाथ जी को गंगाजल, बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल और दूध चढ़ाने की परंपरा है। बहुत से लोग घाट पर स्नान करके छोटे लोटे में गंगाजल भरकर लाते हैं और वही चढ़ाते हैं। भीड़ के दिनों में गर्भगृह के बाहर से ही जल अर्पित करने की व्यवस्था होती है, जिसे झाँकी दर्शन कहते हैं; इससे दर्शन का फल कम नहीं होता। बेलपत्र तीन पत्तियों वाला, बिना कटा-फटा हो, और चिकनी तरफ़ से शिवलिंग पर रखें। मंदिर के बाहर की दुकानों पर फूल-माला और प्रसाद मिल जाता है, पर दाम पहले पूछ लें। दर्शन के बाद मंदिर परिसर में थोड़ी देर बैठकर ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप करना काशी के अनुभव को और गहरा कर देता है।

यात्रा सुझाव

  1. भीड़ से बचना हो तो सोमवार, सावन, महाशिवरात्रि और छुट्टियों के अलावा कोई सामान्य दिन चुनें। तिथि और वार आज के पंचांग में देख लें।
  2. सुबह जल्दी गंगा स्नान करके दर्शन करना सबसे शांत अनुभव देता है।
  3. घाट से मंदिर और मंदिर से घाट पैदल चलना पड़ता है; आरामदायक चप्पल पहनें जिन्हें आसानी से उतार सकें।
  4. नाव से सुबह का घाट दर्शन करें, पर नाव का किराया पहले तय कर लें।
  5. दर्शन के बाद शिव जी की आरती गाना चाहें तो ॐ जय शिव ओंकारा साथ रखें।
  6. काशी में कम से कम दो दिन रखें: एक दिन विश्वनाथ-कालभैरव-अन्नपूर्णा के लिए और एक दिन घाटों और सारनाथ के लिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

काशी विश्वनाथ में मंगला आरती कब होती है?

मंगला आरती भोर में सूर्योदय से पहले होती है। सटीक समय और टिकट की जानकारी श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास की आधिकारिक वेबसाइट पर देखें, क्योंकि यह मौसम के अनुसार बदलती है।

काशी विश्वनाथ मंदिर किसने बनवाया?

आज का मुख्य मंदिर इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने अठारहवीं सदी के आख़िरी दौर में बनवाया था। बाद में महाराजा रणजीत सिंह ने शिखर पर सोना चढ़वाया।

क्या काशी विश्वनाथ से पहले कालभैरव के दर्शन करने चाहिए?

कालभैरव काशी के कोतवाल माने जाते हैं, इसलिए परंपरा है कि काशी यात्रा में उनके दर्शन ज़रूर करें। कुछ लोग पहले जाते हैं, कुछ विश्वनाथ के बाद।

काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग का क्या महत्व है?

यह बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है और काशी को शिव का अविमुक्त क्षेत्र कहा गया है। मान्यता है कि यहाँ शिव मोक्ष देने वाला तारक मंत्र देते हैं।

काशी में गंगा आरती कहाँ देखें?

दशाश्वमेध घाट की संध्या गंगा आरती सबसे प्रसिद्ध है। अस्सी घाट पर सुबह और शाम दोनों आरती होती हैं।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखक के बारे में

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा

वेद पण्डित, लेखक

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा जी वेद पण्डित और लेखक हैं। अनेक वर्षों से वे दुर्गा देवी की आराधना का अध्ययन और आचरण करते आ रहे हैं। पूजा विधि, मंत्रों और स्तोत्रों को सामान्य भक्तों के लिए सरलता से समझाना उनका लक्ष्य है। वे “श्री दुर्गा नित्याराधना” ग्रंथ के लेखक हैं। इस साइट के लेख उनकी रचनाएँ हैं, या उनके ग्रंथों पर आधारित हैं।

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