कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली: गंगा स्नान और दीपदान

देव दीपावली कार्तिक पूर्णिमा को मनाई जाती है, जब मान्यता है कि भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का वध किया और देवताओं ने काशी में दीप जलाकर उत्सव मनाया। इस दिन भोर में गंगा स्नान, दान, शाम को घाटों और घरों में दीपदान, सत्यनारायण कथा होती है, और यही गुरु नानक जयंती का दिन भी है।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखन: · वेद पण्डित, लेखकअद्यतन · 5 मिनट का पाठ
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कार्तिक पूर्णिमा कार्तिक मास का आख़िरी और सबसे बड़ा स्नान-पर्व है, और इसी शाम काशी में देव दीपावली मनाई जाती है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का वध किया था और देवताओं ने स्वर्ग से उतरकर गंगा के घाटों पर दीप जलाए थे, इसलिए इसे देवताओं की दिवाली कहा जाता है। 2026 में कार्तिक पूर्णिमा 24 नवंबर को है; हर साल की तिथि और पूर्णिमा का समय कार्तिक पूर्णिमा पृष्ठ पर देखें।

कार्तिक पूर्णिमा क्यों खास: त्रिपुरासुर वध

तारकासुर के तीन बेटों, तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली, ने तपस्या करके तीन उड़ने वाले नगर (त्रिपुर) पाए थे: एक सोने का, एक चाँदी का और एक लोहे का। वरदान यह था कि जब तीनों नगर एक सीध में आएँ और कोई एक ही बाण से तीनों को भेद दे, तभी उनका अंत होगा। तीनों असुरों ने देवताओं और ऋषियों को सताना शुरू किया। तब भगवान शिव ने पृथ्वी को रथ, सूर्य-चंद्र को पहिए, मेरु पर्वत को धनुष और भगवान विष्णु को बाण बनाकर एक ही बाण से तीनों पुरों को भस्म कर दिया। इसी से शिव "त्रिपुरारी" कहलाए और यह दिन त्रिपुरारी पूर्णिमा।

वैष्णव परंपरा में यह भी माना जाता है कि भगवान विष्णु का मत्स्य अवतार कार्तिक पूर्णिमा को हुआ था। यानी यह दिन शिव और विष्णु, दोनों के भक्तों के लिए समान रूप से पवित्र है।

गंगा स्नान और दान

कार्तिक पूर्णिमा पर भोर में पवित्र नदी में स्नान का बहुत महत्व है। उत्तर भारत में इस दिन बड़े स्नान मेले लगते हैं: हापुड़ के पास गढ़मुक्तेश्वर में गंगा मेला, प्रयागराज में संगम स्नान, वाराणसी और हरिद्वार के घाट, बिहार में सोनपुर के पास गंगा-गंडक संगम। जो लोग पूरे कार्तिक भर स्नान का नियम रखते हैं, वे इसी दिन उसका समापन करते हैं।

  • स्नान सूर्योदय से पहले करें, डुबकी लगाते समय गंगा और भगवान विष्णु का स्मरण करें।
  • नदी तक न जा सकें तो घर पर पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
  • स्नान के बाद सूर्य को अर्घ्य दें और तुलसी पूजा करें।
  • दान में अन्न, गुड़, तिल, कंबल, गर्म कपड़े और दीपक देना अच्छा माना जाता है, क्योंकि यह जाड़े की शुरुआत का समय है।

भीड़ वाले स्नान मेलों में जाने से पहले प्रशासन की ओर से जारी यातायात और घाट व्यवस्था की जानकारी ज़रूर देख लें। ये इंतज़ाम हर साल बदलते हैं। बुज़ुर्ग और बच्चे भीड़ में साथ रहें और गहरे पानी में न उतरें।

काशी की देव दीपावली

वाराणसी में कार्तिक पूर्णिमा की शाम गंगा के अर्धचंद्राकार घाटों पर लाखों दीये जलाए जाते हैं। राजघाट से अस्सी घाट तक का पूरा किनारा दीयों की कतारों से जगमगा उठता है, दशाश्वमेध घाट पर विशेष गंगा आरती होती है और नदी में दीपदान के दोने तैरते हैं। सामने की रेती से या नाव से घाटों का यह दृश्य देखने देश-विदेश से लोग आते हैं।

काशी जाने की योजना हो तो नाव, होटल और आरती के स्थान बहुत पहले भर जाते हैं, और किराए-नियम हर साल बदलते हैं। यात्रा से पहले स्थानीय प्रशासन और घाट समितियों की ताज़ा जानकारी देख लें। काशी के घाटों पर गाई जाने वाली गंगा मैया की आरती आप घर पर भी इस शाम गा सकते हैं।

घर पर दीपदान की विधि

  1. शाम को सूर्यास्त के बाद घर की सफ़ाई करके मुख्य द्वार पर रंगोली बनाएँ।
  2. कम से कम 5, 11 या 21 मिट्टी के दीये तैयार रखें; घी या तिल का तेल लें।
  3. पहला दीया घर के मंदिर में भगवान विष्णु या शिव के सामने जलाएँ।
  4. दूसरा तुलसी के पास, तीसरा मुख्य द्वार पर, चौथा रसोई में पानी के स्थान के पास, और बाकी छत और आँगन की मुंडेर पर रखें।
  5. पास में नदी या तालाब हो तो पत्ते के दोने में दीया और फूल रखकर जल में प्रवाहित करें। नदी न हो तो किसी बड़े बर्तन में पानी भरकर उसमें दीये तैराना भी चलता है।
  6. दीप जलाते समय मन में देवताओं, पितरों और परिवार के सुख की प्रार्थना करें।
  7. जिन्होंने कार्तिक भर आकाशदीप जलाया हो, वे आज आख़िरी बार जलाकर अगले दिन उसे उतारते हैं।

पूरे महीने के स्नान और दीपदान के नियम कार्तिक मास के नियम में विस्तार से हैं।

गुरु नानक जयंती और पुष्कर मेला

कार्तिक पूर्णिमा को सिख परंपरा में गुरु नानक देव जी का प्रकाश पर्व (गुरपुरब) मनाया जाता है। गुरुद्वारों में अखंड पाठ, प्रभात फेरी, कीर्तन और लंगर होता है, और पंजाब, हरियाणा, दिल्ली में इस दिन शहर रोशनी से सजते हैं।

राजस्थान में पुष्कर का मेला कार्तिक शुक्ल एकादशी के आसपास शुरू होकर पूर्णिमा को पुष्कर सरोवर के स्नान पर पूरा होता है। ब्रह्मा जी के मंदिर वाला यह तीर्थ इसी दिन सबसे पवित्र माना जाता है। बिहार में सोनपुर मेला भी इसी पूर्णिमा के स्नान से शुरू होता है।

पूर्णिमा की रात चंद्रमा को अर्घ्य

पूर्वांचल और बिहार के कई घरों में कार्तिक पूर्णिमा की रात चंद्रमा को दूध मिले जल से अर्घ्य दिया जाता है और खीर का भोग लगाया जाता है। महिलाएँ इस दिन व्रत भी रखती हैं, जो चंद्र दर्शन और अर्घ्य के बाद खोला जाता है। जो परिवार हर महीने पूर्णिमा व्रत रखते हैं, उनके लिए कार्तिक की पूर्णिमा साल की सबसे ख़ास पूर्णिमाओं में गिनी जाती है।

सत्यनारायण कथा का दिन

हर पूर्णिमा की तरह कार्तिक पूर्णिमा पर भी घर-घर सत्यनारायण भगवान की कथा होती है, और कार्तिक की पूर्णिमा होने से इसका महत्व और बढ़ जाता है। बहुत से परिवार पूरे महीने के नियम का समापन इसी कथा, हवन और ब्राह्मण भोजन से करते हैं। कथा के पाँचों अध्याय सत्यनारायण व्रत कथा में और पूजा की सामग्री व क्रम सत्यनारायण पूजा सामग्री और विधि में दिए गए हैं।

तो इस दिन का सीधा क्रम यह बनता है: भोर में स्नान, दिन में दान और कथा, शाम को दीपदान। जो इतने में से जितना कर सके, उतना श्रद्धा से करे।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

देव दीपावली कब मनाई जाती है?

देव दीपावली कार्तिक पूर्णिमा की शाम मनाई जाती है, जो दिवाली के लगभग पंद्रह दिन बाद आती है। 2026 में कार्तिक पूर्णिमा 24 नवंबर को है।

देव दीपावली क्यों मनाते हैं?

मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का वध किया और देवताओं ने काशी के घाटों पर दीप जलाकर उत्सव मनाया, इसलिए इसे देवताओं की दिवाली कहते हैं।

कार्तिक पूर्णिमा पर क्या दान करें?

अन्न, गुड़, तिल, कंबल, गर्म कपड़े और दीपक का दान अच्छा माना जाता है। अपनी सामर्थ्य के अनुसार किसी ज़रूरतमंद को दें।

घर पर कार्तिक पूर्णिमा का दीपदान कैसे करें?

शाम को मंदिर, तुलसी, मुख्य द्वार, रसोई और छत पर घी या तिल के तेल के दीये जलाएँ। पास में नदी हो तो दोने में दीया प्रवाहित करें।

क्या कार्तिक पूर्णिमा और गुरु नानक जयंती एक ही दिन होती है?

हाँ, गुरु नानक देव जी का प्रकाश पर्व कार्तिक पूर्णिमा को ही मनाया जाता है।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखक के बारे में

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा

वेद पण्डित, लेखक

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा जी वेद पण्डित और लेखक हैं। अनेक वर्षों से वे दुर्गा देवी की आराधना का अध्ययन और आचरण करते आ रहे हैं। पूजा विधि, मंत्रों और स्तोत्रों को सामान्य भक्तों के लिए सरलता से समझाना उनका लक्ष्य है। वे “श्री दुर्गा नित्याराधना” ग्रंथ के लेखक हैं। इस साइट के लेख उनकी रचनाएँ हैं, या उनके ग्रंथों पर आधारित हैं।

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