सत्यनारायण पूजा भगवान विष्णु के सत्य स्वरूप की पूजा है, जिसकी कथा स्कन्द पुराण के रेवा खंड से ली जाती है। इसके लिए बहुत बड़ा तामझाम नहीं चाहिए: एक साफ़ चौकी, केले के पत्तों का छोटा-सा मंडप, कलश, पंचामृत, तुलसी और पंजीरी का प्रसाद ही इसकी जान है। नीचे पूरी सामग्री लिस्ट, पूजा का क्रम और घर पर खुद करने का तरीका दिया गया है।
कब कराते हैं: पूर्णिमा, गृह प्रवेश, मनौती
उत्तर भारत के ज़्यादातर घरों में सत्यनारायण भगवान की कथा हर महीने की पूर्णिमा को होती है। कई परिवार इसे महीने का नियम बना लेते हैं, तो कई साल में एक-दो बार ही कराते हैं। हर महीने की पूर्णिमा की तिथि आप पूर्णिमा व्रत कैलेंडर में और सत्यनारायण पूजा के दिन सत्यनारायण पूजा कैलेंडर में देख सकते हैं।
पूर्णिमा के अलावा ये मौके भी बहुत आम हैं:
- गृह प्रवेश के बाद नए घर में पहली कथा
- शादी के बाद, जब नई बहू घर आती है
- बच्चे का जन्म, मुंडन या नौकरी लगने पर
- कोई मनौती पूरी होने पर, जैसे परीक्षा में सफलता या बीमारी से ठीक होना
- एकादशी, संक्रांति या किसी भी शुभ दिन, जब मन हो
कथा का सबसे प्रचलित समय शाम का है, सूर्यास्त के आसपास, जब घर के सब लोग इकट्ठा हो सकें। सुबह करने में भी कोई दोष नहीं है।
सत्यनारायण पूजा सामग्री लिस्ट
पूजा से एक दिन पहले यह लिस्ट मिलाकर सामान जुटा लें, ताकि ऐन वक्त पर भागदौड़ न हो।
| सामग्री | कितना / कैसा | न मिले तो |
|---|---|---|
| चौकी या पाटा | एक, साफ़ धुला हुआ | साफ़ लकड़ी का तख्ता या ऊँची थाली |
| पीला या लाल कपड़ा | चौकी पर बिछाने लायक | कोई भी नया, साफ़ कपड़ा |
| केले के पत्ते और तने | 4 खंभे या 4-5 पत्ते | आम के पत्तों की बंदनवार |
| सत्यनारायण भगवान की तस्वीर या शालिग्राम | एक | विष्णु जी या लक्ष्मी-नारायण की तस्वीर |
| कलश, आम के पत्ते, नारियल | एक तांबे या मिट्टी का कलश | स्टील का लोटा |
| गणेश-गौरी के लिए सुपारी | 2 साबुत सुपारी | गणेश जी की छोटी मूर्ति |
| रोली, चंदन, हल्दी, अक्षत | थोड़ा-थोड़ा | कुमकुम और साबुत चावल काफ़ी हैं |
| मौली (कलावा), जनेऊ | एक-एक | सिर्फ़ मौली |
| पंचामृत | दूध, दही, घी, शहद, शक्कर | कच्चा दूध और गंगाजल |
| तुलसी दल | कम से कम 11 पत्ते | तुलसी के बिना भोग अधूरा माना जाता है, पड़ोस से माँग लें |
| पंजीरी | सवा पाव से सवा किलो, घर की परंपरा अनुसार | सूजी का हलवा या बूरा-चने |
| केले और मौसमी फल | कम से कम 5 केले | जो फल मौसम में हों |
| पान, सुपारी, लौंग, इलायची | 5-5 | लौंग-इलायची काफ़ी हैं |
| फूल, माला, दूर्वा | पीले फूल अच्छे माने जाते हैं | गेंदे के फूल |
| धूप, अगरबत्ती, घी का दीपक, कपूर | आरती के लिए | सरसों के तेल का दीपक भी चलता है |
| गंगाजल | थोड़ा सा | साफ़ पानी में तुलसी पत्ता डाल लें |
| दक्षिणा और वस्त्र | पंडित जी के लिए, श्रद्धा अनुसार | बिना पंडित पूजा में मंदिर में दान |
| कथा की पुस्तक | सत्यनारायण व्रत कथा | हमारी वेबसाइट पर पूरी कथा |
चौकी और केले के पत्तों का मंडप
सत्यनारायण पूजा की पहचान केले का मंडप है। केला विष्णु जी को प्रिय माना जाता है और बृहस्पति से भी जुड़ा है, इसलिए यह पीले रंग वाली पूजा है।
- पूजा की जगह पूर्व या उत्तर की ओर चुनें, ताकि आप पूर्व मुख होकर बैठ सकें।
- ज़मीन पोंछकर चौकी रखें और उस पर पीला कपड़ा बिछाएँ।
- चौकी के चारों कोनों पर केले के तने बाँध दें या पत्ते खड़े कर दें। ऊपर से पत्ते मिलाकर छोटी छतरी जैसी बनावट हो जाती है।
- चौकी के बीच में भगवान की तस्वीर, उसके सामने अक्षत की ढेरी पर कलश, और बाईं ओर सुपारी के रूप में गणेश जी रखें।
- मंडप पर आम के पत्तों की बंदनवार और फूलों की माला लगा दें। बच्चों को रंगोली बनाने दें, घर में अपनापन आता है।
पूजा का क्रम
पंडित जी आएँ या आप खुद करें, क्रम लगभग यही रहता है:
- स्नान और संकल्प: दिन में व्रत रखा हो तो अच्छा, नहीं तो कम से कम पूजा तक कुछ भारी न खाएँ। हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर अपना नाम, गोत्र और पूजा का उद्देश्य बोलें।
- गणेश पूजन: सुपारी वाले गणेश जी को रोली, अक्षत, दूर्वा और मिठाई चढ़ाएँ।
- कलश पूजन: कलश में जल, सिक्का, सुपारी डालें, ऊपर आम के पत्ते और नारियल रखें, मौली बाँधें।
- नवग्रह (वैकल्पिक): कई पंडित नवग्रह का संक्षिप्त पूजन भी कराते हैं। घर पर खुद कर रहे हों तो छोड़ सकते हैं।
- सत्यनारायण भगवान का पूजन: शालिग्राम या तस्वीर को पंचामृत से स्नान (तस्वीर हो तो छींटे), फिर शुद्ध जल, चंदन, जनेऊ, पीले फूल, तुलसी दल, धूप-दीप।
- भोग: पंजीरी, पंचामृत, केले और फल पर तुलसी पत्ता रखकर भोग लगाएँ।
- कथा: पाँच अध्याय की कथा सुनें। हर अध्याय के बाद शंख बजाने या जयकारा लगाने की रीत कई घरों में है।
- आरती: कपूर और घी के दीपक से सत्यनारायण जी की आरती “जय लक्ष्मी रमणा” गाएँ।
- हवन (वैकल्पिक): गृह प्रवेश जैसे मौकों पर छोटा हवन भी होता है।
- प्रसाद: सबको पंचामृत और पंजीरी दें, फिर व्रती भोजन करे।
कथा में साधु वैश्य, लीलावती-कलावती, राजा तुंगध्वज और लकड़हारे के प्रसंग आते हैं, जिनका सार यही है कि प्रसाद का अनादर न करें और वचन देकर पूजा टालें नहीं। पूरी कथा श्री सत्यनारायण व्रत कथा पृष्ठ पर पढ़ें।
पंजीरी और पंचामृत
पंजीरी
उत्तर प्रदेश, बिहार और दिल्ली में गेहूँ के आटे की पंजीरी सबसे आम है। कढ़ाई में देसी घी गरम करें, आटा धीमी आँच पर सुनहरा और खुशबूदार होने तक भूनें, ठंडा होने पर बूरा या पिसी चीनी मिलाएँ। ऊपर से कटे मेवे, थोड़ी इलायची और मखाने डाल सकते हैं। कई परिवार “सवा” का नियम मानते हैं, यानी सवा पाव, सवा किलो या सवा पाँच किलो प्रसाद। राजस्थान और मध्य प्रदेश के कुछ घरों में पिसे धनिये की पंजीरी बनती है, जो व्रत में भी चल जाती है।
पंचामृत
दूध, दही, घी, शहद और शक्कर, ये पाँच चीज़ें मिलाकर पंचामृत बनता है। दूध सबसे ज़्यादा रखें, बाकी थोड़ा-थोड़ा। इसमें तुलसी के पत्ते और कटे केले डालने की रीत भी है। बनाने के सही अनुपात और चरणामृत से इसका अंतर पंचामृत कैसे बनाएं लेख में विस्तार से है।
बिना पंडित के घर पर
पंडित जी न मिलें या आप खुद करना चाहें, तो भी सत्यनारायण पूजा पूरी श्रद्धा से हो सकती है। कथा का मूल संदेश ही यह है कि भगवान भाव के भूखे हैं, धन के नहीं। कुछ बातें ध्यान रखें:
- घर का कोई बड़ा व्यक्ति संकल्प ले और कथा पढ़े, बाकी लोग हाथ में अक्षत-फूल लेकर सुनें।
- मंत्र न आते हों तो “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या “ॐ सत्यनारायणाय नमः” बोलकर हर चीज़ चढ़ाएँ।
- कथा बीच में छोड़कर न उठें, फ़ोन दूर रखें।
- प्रसाद सबसे पहले मेहमानों और पड़ोसियों को दें। कथा सुनने बुलाए गए लोग प्रसाद लिए बिना न जाएँ, यह खास ध्यान रखें।
- जो दक्षिणा पंडित जी को देते, वह किसी ज़रूरतमंद या मंदिर में दे दें।
पूजा के बाद बचे केले के पत्ते और फूल किसी पौधे की जड़ में या बहते पानी के बजाय मिट्टी में दबा दें, ताकि नदी गंदी न हो।

