पंचामृत का अर्थ है पाँच अमृत: दूध, दही, घी, शहद और शक्कर। इन पाँचों को मिलाकर भगवान का अभिषेक किया जाता है और फिर वही प्रसाद के रूप में बाँटा जाता है। सत्यनारायण कथा, जन्माष्टमी, शिवरात्रि का रुद्राभिषेक, लड्डू गोपाल का रोज़ का स्नान, हर जगह पंचामृत चाहिए। इसे बनाना आसान है, बस अनुपात और शुद्धता का ध्यान रखना होता है।
पंचामृत की पाँच चीज़ें
| सामग्री | किस रूप में लें | परंपरागत भाव |
|---|---|---|
| दूध | गाय का, ताज़ा | पवित्रता, पोषण |
| दही | गाय के दूध का, बहुत खट्टा न हो | समृद्धि |
| घी | शुद्ध देसी घी | तेज, शक्ति |
| शहद | शुद्ध शहद | मधुरता, मीठी वाणी |
| शक्कर | मिश्री, बूरा या खांड | आनंद, मिठास |
इसके अलावा ज़्यादातर घरों में गंगाजल और तुलसी दल भी मिलाया जाता है (विष्णु-कृष्ण की पूजा में)। कुछ घरों में प्रसाद बाँटते समय मखाने, कटे मेवे या केले के टुकड़े भी डाल देते हैं, ख़ासकर सत्यनारायण कथा में। यह चलन है, पर मूल पंचामृत पाँच चीज़ों का ही है और अभिषेक इन्हीं से होता है।
कोई चीज़ न हो तो
- गाय का दूध न मिले तो जो शुद्ध दूध घर में है वही लें।
- शहद न हो तो बाकी चार से पंचामृत बना लें; भाव की कमी नहीं मानी जाती।
- मिश्री न हो तो साधारण चीनी या बूरा चल जाता है।
- घी बहुत थोड़ा ही डालें, वरना ऊपर तैरता रहेगा और स्वाद भारी हो जाएगा।
पंचामृत बनाने की विधि
पंचामृत का कोई एक तय अनुपात शास्त्रों में नहीं है; अलग-अलग ग्रंथ और परिवार अलग मात्रा मानते हैं। घर की पूजा के लिए (लगभग 6 से 8 लोगों का प्रसाद) यह अनुपात अच्छा रहता है:
- दूध: 1 कप
- दही: 3 से 4 बड़े चम्मच
- घी: 1 छोटा चम्मच
- शहद: 1 छोटा चम्मच
- मिश्री या बूरा: 1 बड़ा चम्मच
- तुलसी दल: 4 से 5 पत्ते, गंगाजल: कुछ बूँदें
- हाथ धोकर साफ़ बर्तन लें। चाँदी, पीतल, स्टील या मिट्टी का बर्तन ठीक है। तांबे में दूध-दही न रखें, परंपरा में इसे वर्जित माना गया है।
- सबसे पहले दही को चम्मच से अच्छी तरह फेंट लें ताकि गुठलियाँ न रहें।
- अब दूध धीरे-धीरे मिलाएँ। अभिषेक के लिए कई लोग कच्चा दूध लेते हैं; प्रसाद के रूप में पीना हो तो उबालकर ठंडा किया दूध बेहतर है।
- मिश्री या बूरा डालकर घुलने तक चलाएँ।
- शहद और घी डालें और एक बार फिर मिलाएँ।
- आख़िर में गंगाजल की कुछ बूँदें और तुलसी दल डाल दें।
- पूजा तक ढककर रखें और उसी दिन इस्तेमाल करें; पंचामृत बचाकर अगले दिन न रखें।
अभिषेक के बाद जो पंचामृत नीचे थाली या पात्र में इकट्ठा होता है, उसे साफ़ बर्तन में छानकर प्रसाद के रूप में बाँटें।
बड़ी पूजा या कथा के लिए
अगर कथा में 30 से 40 लोग आने वाले हैं तो ऊपर की मात्रा को चार-पाँच गुना कर लें: लगभग 1 लीटर दूध, 250 ग्राम दही, 3 से 4 छोटे चम्मच घी, उतना ही शहद और 4 से 5 बड़े चम्मच मिश्री। सबको एक-दो चम्मच ही मिलता है, इसलिए इससे ज़्यादा बनाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। अभिषेक के लिए अलग से छोटी कटोरी में पंचामृत रख लें और बाँटने वाला अलग बर्तन में, ताकि मात्रा का हिसाब बना रहे।
आम ग़लतियाँ
- बहुत खट्टा दही डाल देना, जिससे दूध फट जाता है। ताज़ा, मीठा दही लें।
- गरम दूध में दही मिलाना। दूध कमरे के तापमान पर हो।
- पंचामृत सुबह बनाकर शाम की पूजा तक धूप में खुला छोड़ देना। ढककर ठंडी जगह रखें।
- शिवलिंग के अभिषेक वाले पंचामृत में तुलसी डाल देना।
किस पूजा में पंचामृत
- सत्यनारायण पूजा: शालिग्राम या सत्यनारायण भगवान का पंचामृत से स्नान और फिर प्रसाद। पूरी सामग्री सत्यनारायण पूजा सामग्री और विधि में।
- जन्माष्टमी: आधी रात को लड्डू गोपाल का पंचामृत अभिषेक; तिथि कृष्ण जन्माष्टमी पृष्ठ पर।
- रुद्राभिषेक और शिवरात्रि: शिवलिंग पर दूध, दही, घी, शहद, शक्कर अलग-अलग भी चढ़ाए जाते हैं और मिलाकर भी। शिव जी के पंचामृत में तुलसी नहीं डालते। विधि रुद्राभिषेक लेख में।
- लड्डू गोपाल की रोज़ सेवा: कई घरों में रोज़ सुबह थोड़े पंचामृत से स्नान कराते हैं; नियम लड्डू गोपाल की सेवा में।
- गणेश चतुर्थी, नवरात्रि, दीवाली लक्ष्मी पूजन और गृह प्रवेश की पूजा में भी षोडशोपचार के "स्नान" चरण में पंचामृत चढ़ता है।
चरणामृत क्या है
चरणामृत का अर्थ है "चरणों का अमृत"। यह वह जल है जिससे भगवान के चरण धोए जाते हैं या मूर्ति को शुद्ध जल से स्नान कराया जाता है। मंदिरों में इसमें तुलसी दल, कभी-कभी कपूर या केसर मिलाकर तांबे के पात्र में रखा जाता है और दर्शन के बाद हथेली में दिया जाता है।
| बात | पंचामृत | चरणामृत |
|---|---|---|
| क्या है | दूध, दही, घी, शहद, शक्कर का मिश्रण | भगवान के स्नान या चरण धोने का जल |
| मुख्य उपयोग | अभिषेक, फिर प्रसाद | स्नान के बाद प्रसाद रूप में |
| पात्र | चाँदी, पीतल, स्टील; तांबा नहीं | अक्सर तांबे का पात्र |
| तुलसी | विष्णु पूजा में हाँ, शिव पूजा में नहीं | लगभग हमेशा |
चरणामृत लेते समय यह श्लोक बोला जाता है:
अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्। विष्णोः पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते॥
यह भक्ति का श्लोक है, इसे दवा की तरह न समझें; इसका भाव है कि भगवान के चरणों से जुड़ा जल ग्रहण करके मन पवित्र होता है।
ग्रहण करने का नियम
- दाहिने हाथ की हथेली को कटोरी जैसा बनाएँ और उसके नीचे बायाँ हाथ रखें, ताकि एक बूँद भी ज़मीन पर न गिरे।
- थोड़ी मात्रा लें, एक या दो चम्मच काफ़ी है। यह प्रसाद है, शरबत नहीं।
- ग्रहण करने से पहले मन में भगवान को प्रणाम करें।
- बाद में हाथ सिर पर फेरने को लेकर घरों में अलग-अलग मान्यता है; कई लोग हाथ जोड़कर प्रणाम कर लेते हैं। अपने परिवार की रीत मानें।
- पंचामृत और चरणामृत को कभी पैरों के पास, ज़मीन पर या जूठे बर्तन में न रखें।
- बचा हुआ पंचामृत तुलसी या किसी पौधे की जड़ में डाल दें, नाली में नहीं।

