पंचामृत कैसे बनाएं और चरणामृत से अंतर

पंचामृत दूध, दही, घी, शहद और शक्कर (मिश्री) को मिलाकर बनता है और भगवान के अभिषेक व प्रसाद में इस्तेमाल होता है। चरणामृत वह जल है जिससे भगवान के चरण धोए जाते हैं, आम तौर पर तुलसी मिला हुआ; दोनों को दाहिने हाथ से थोड़ी मात्रा में श्रद्धा से ग्रहण किया जाता है।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखन: · वेद पण्डित, लेखकअद्यतन · 5 मिनट का पाठ
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पंचामृत का अर्थ है पाँच अमृत: दूध, दही, घी, शहद और शक्कर। इन पाँचों को मिलाकर भगवान का अभिषेक किया जाता है और फिर वही प्रसाद के रूप में बाँटा जाता है। सत्यनारायण कथा, जन्माष्टमी, शिवरात्रि का रुद्राभिषेक, लड्डू गोपाल का रोज़ का स्नान, हर जगह पंचामृत चाहिए। इसे बनाना आसान है, बस अनुपात और शुद्धता का ध्यान रखना होता है।

पंचामृत की पाँच चीज़ें

सामग्रीकिस रूप में लेंपरंपरागत भाव
दूधगाय का, ताज़ापवित्रता, पोषण
दहीगाय के दूध का, बहुत खट्टा न होसमृद्धि
घीशुद्ध देसी घीतेज, शक्ति
शहदशुद्ध शहदमधुरता, मीठी वाणी
शक्करमिश्री, बूरा या खांडआनंद, मिठास

इसके अलावा ज़्यादातर घरों में गंगाजल और तुलसी दल भी मिलाया जाता है (विष्णु-कृष्ण की पूजा में)। कुछ घरों में प्रसाद बाँटते समय मखाने, कटे मेवे या केले के टुकड़े भी डाल देते हैं, ख़ासकर सत्यनारायण कथा में। यह चलन है, पर मूल पंचामृत पाँच चीज़ों का ही है और अभिषेक इन्हीं से होता है।

कोई चीज़ न हो तो

  • गाय का दूध न मिले तो जो शुद्ध दूध घर में है वही लें।
  • शहद न हो तो बाकी चार से पंचामृत बना लें; भाव की कमी नहीं मानी जाती।
  • मिश्री न हो तो साधारण चीनी या बूरा चल जाता है।
  • घी बहुत थोड़ा ही डालें, वरना ऊपर तैरता रहेगा और स्वाद भारी हो जाएगा।

पंचामृत बनाने की विधि

पंचामृत का कोई एक तय अनुपात शास्त्रों में नहीं है; अलग-अलग ग्रंथ और परिवार अलग मात्रा मानते हैं। घर की पूजा के लिए (लगभग 6 से 8 लोगों का प्रसाद) यह अनुपात अच्छा रहता है:

  • दूध: 1 कप
  • दही: 3 से 4 बड़े चम्मच
  • घी: 1 छोटा चम्मच
  • शहद: 1 छोटा चम्मच
  • मिश्री या बूरा: 1 बड़ा चम्मच
  • तुलसी दल: 4 से 5 पत्ते, गंगाजल: कुछ बूँदें
  1. हाथ धोकर साफ़ बर्तन लें। चाँदी, पीतल, स्टील या मिट्टी का बर्तन ठीक है। तांबे में दूध-दही न रखें, परंपरा में इसे वर्जित माना गया है।
  2. सबसे पहले दही को चम्मच से अच्छी तरह फेंट लें ताकि गुठलियाँ न रहें।
  3. अब दूध धीरे-धीरे मिलाएँ। अभिषेक के लिए कई लोग कच्चा दूध लेते हैं; प्रसाद के रूप में पीना हो तो उबालकर ठंडा किया दूध बेहतर है।
  4. मिश्री या बूरा डालकर घुलने तक चलाएँ।
  5. शहद और घी डालें और एक बार फिर मिलाएँ।
  6. आख़िर में गंगाजल की कुछ बूँदें और तुलसी दल डाल दें।
  7. पूजा तक ढककर रखें और उसी दिन इस्तेमाल करें; पंचामृत बचाकर अगले दिन न रखें।

अभिषेक के बाद जो पंचामृत नीचे थाली या पात्र में इकट्ठा होता है, उसे साफ़ बर्तन में छानकर प्रसाद के रूप में बाँटें।

बड़ी पूजा या कथा के लिए

अगर कथा में 30 से 40 लोग आने वाले हैं तो ऊपर की मात्रा को चार-पाँच गुना कर लें: लगभग 1 लीटर दूध, 250 ग्राम दही, 3 से 4 छोटे चम्मच घी, उतना ही शहद और 4 से 5 बड़े चम्मच मिश्री। सबको एक-दो चम्मच ही मिलता है, इसलिए इससे ज़्यादा बनाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। अभिषेक के लिए अलग से छोटी कटोरी में पंचामृत रख लें और बाँटने वाला अलग बर्तन में, ताकि मात्रा का हिसाब बना रहे।

आम ग़लतियाँ

  • बहुत खट्टा दही डाल देना, जिससे दूध फट जाता है। ताज़ा, मीठा दही लें।
  • गरम दूध में दही मिलाना। दूध कमरे के तापमान पर हो।
  • पंचामृत सुबह बनाकर शाम की पूजा तक धूप में खुला छोड़ देना। ढककर ठंडी जगह रखें।
  • शिवलिंग के अभिषेक वाले पंचामृत में तुलसी डाल देना।

किस पूजा में पंचामृत

  • सत्यनारायण पूजा: शालिग्राम या सत्यनारायण भगवान का पंचामृत से स्नान और फिर प्रसाद। पूरी सामग्री सत्यनारायण पूजा सामग्री और विधि में।
  • जन्माष्टमी: आधी रात को लड्डू गोपाल का पंचामृत अभिषेक; तिथि कृष्ण जन्माष्टमी पृष्ठ पर।
  • रुद्राभिषेक और शिवरात्रि: शिवलिंग पर दूध, दही, घी, शहद, शक्कर अलग-अलग भी चढ़ाए जाते हैं और मिलाकर भी। शिव जी के पंचामृत में तुलसी नहीं डालते। विधि रुद्राभिषेक लेख में।
  • लड्डू गोपाल की रोज़ सेवा: कई घरों में रोज़ सुबह थोड़े पंचामृत से स्नान कराते हैं; नियम लड्डू गोपाल की सेवा में।
  • गणेश चतुर्थी, नवरात्रि, दीवाली लक्ष्मी पूजन और गृह प्रवेश की पूजा में भी षोडशोपचार के "स्नान" चरण में पंचामृत चढ़ता है।

चरणामृत क्या है

चरणामृत का अर्थ है "चरणों का अमृत"। यह वह जल है जिससे भगवान के चरण धोए जाते हैं या मूर्ति को शुद्ध जल से स्नान कराया जाता है। मंदिरों में इसमें तुलसी दल, कभी-कभी कपूर या केसर मिलाकर तांबे के पात्र में रखा जाता है और दर्शन के बाद हथेली में दिया जाता है।

बातपंचामृतचरणामृत
क्या हैदूध, दही, घी, शहद, शक्कर का मिश्रणभगवान के स्नान या चरण धोने का जल
मुख्य उपयोगअभिषेक, फिर प्रसादस्नान के बाद प्रसाद रूप में
पात्रचाँदी, पीतल, स्टील; तांबा नहींअक्सर तांबे का पात्र
तुलसीविष्णु पूजा में हाँ, शिव पूजा में नहींलगभग हमेशा

चरणामृत लेते समय यह श्लोक बोला जाता है:

अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्। विष्णोः पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते॥

यह भक्ति का श्लोक है, इसे दवा की तरह न समझें; इसका भाव है कि भगवान के चरणों से जुड़ा जल ग्रहण करके मन पवित्र होता है।

ग्रहण करने का नियम

  • दाहिने हाथ की हथेली को कटोरी जैसा बनाएँ और उसके नीचे बायाँ हाथ रखें, ताकि एक बूँद भी ज़मीन पर न गिरे।
  • थोड़ी मात्रा लें, एक या दो चम्मच काफ़ी है। यह प्रसाद है, शरबत नहीं।
  • ग्रहण करने से पहले मन में भगवान को प्रणाम करें।
  • बाद में हाथ सिर पर फेरने को लेकर घरों में अलग-अलग मान्यता है; कई लोग हाथ जोड़कर प्रणाम कर लेते हैं। अपने परिवार की रीत मानें।
  • पंचामृत और चरणामृत को कभी पैरों के पास, ज़मीन पर या जूठे बर्तन में न रखें।
  • बचा हुआ पंचामृत तुलसी या किसी पौधे की जड़ में डाल दें, नाली में नहीं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पंचामृत में कौन सी पाँच चीज़ें होती हैं?

दूध, दही, घी, शहद और शक्कर (मिश्री या बूरा)। विष्णु-कृष्ण पूजा में इसमें तुलसी दल और गंगाजल भी मिलाया जाता है।

पंचामृत और चरणामृत में क्या अंतर है?

पंचामृत पाँच चीज़ों का मिश्रण है जिससे अभिषेक होता है, जबकि चरणामृत भगवान के स्नान या चरण धोने का जल है, जिसमें आम तौर पर तुलसी मिलाई जाती है।

क्या पंचामृत तांबे के बर्तन में बना सकते हैं?

नहीं, परंपरा में दूध और दही को तांबे में रखना वर्जित माना गया है। पंचामृत के लिए चाँदी, पीतल, स्टील या मिट्टी का बर्तन लें।

क्या शिव जी के पंचामृत में तुलसी डालते हैं?

नहीं, शिव पूजा में तुलसी नहीं चढ़ाई जाती, इसलिए शिव जी के पंचामृत में तुलसी नहीं डालते।

पंचामृत कितने समय तक रख सकते हैं?

पंचामृत उसी दिन इस्तेमाल करें। बचा हुआ हो तो प्रसाद के रूप में बाँट दें या पौधों की जड़ में डाल दें।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखक के बारे में

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा

वेद पण्डित, लेखक

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा जी वेद पण्डित और लेखक हैं। अनेक वर्षों से वे दुर्गा देवी की आराधना का अध्ययन और आचरण करते आ रहे हैं। पूजा विधि, मंत्रों और स्तोत्रों को सामान्य भक्तों के लिए सरलता से समझाना उनका लक्ष्य है। वे “श्री दुर्गा नित्याराधना” ग्रंथ के लेखक हैं। इस साइट के लेख उनकी रचनाएँ हैं, या उनके ग्रंथों पर आधारित हैं।

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