रुद्राभिषेक का अर्थ है रुद्र रूप शिव का अभिषेक, यानी शिवलिंग को किसी पवित्र द्रव्य से स्नान कराते हुए वैदिक रुद्र मंत्रों का पाठ करना। उत्तर भारत में इसके लिए शुक्ल यजुर्वेद की रुद्राष्टाध्यायी (आठ अध्यायों का रुद्री पाठ) पढ़ी जाती है, जबकि दक्षिण भारत में कृष्ण यजुर्वेद का श्री रुद्रम (नमकम-चमकम) प्रचलित है। सामान्य जलाभिषेक कोई भी कर सकता है; रुद्राभिषेक आमतौर पर वेदपाठी पुरोहित कराते हैं।
रुद्राभिषेक क्या है
शिव को "अभिषेक प्रिय" कहा गया है। साधारण पूजा में हम जल चढ़ाते हैं; रुद्राभिषेक में वही अभिषेक लगातार, धार बाँधकर, मंत्रों की लय के साथ होता है। पुरोहित पाठ करते हैं और यजमान (पूजा कराने वाला) तांबे के पात्र या शृंगी से शिवलिंग पर धार गिराता रहता है।
पाठ की संख्या के हिसाब से रुद्राभिषेक के बड़े रूप भी हैं:
- रुद्री / रूपक: रुद्राष्टाध्यायी का एक पाठ
- एकादशिनी: 11 पाठ (कई जगह इसे ही "रुद्री" कहते हैं)
- लघु रुद्र: 11 एकादशिनी, यानी 121 पाठ
- महारुद्र: 11 लघु रुद्र
- अतिरुद्र: 11 महारुद्र, जो बड़े मंदिरों और तीर्थों में कई पुरोहित मिलकर करते हैं
घर के लिए एक या ग्यारह पाठ वाला रुद्राभिषेक सबसे आम है, जिसमें पुरोहित के हिसाब से डेढ़ से तीन घंटे लगते हैं।
प्रकार: किस द्रव्य से अभिषेक
परंपरा में अलग-अलग द्रव्यों से अभिषेक को अलग-अलग कामनाओं से जोड़ा गया है। ये मान्यताएँ हैं, कोई गारंटी नहीं; श्रद्धा से किया कोई भी अभिषेक शिव को स्वीकार है।
| द्रव्य | परंपरा में जुड़ी कामना |
|---|---|
| शुद्ध जल / गंगाजल | मन की शांति, वर्षा, सामान्य कल्याण |
| कच्चा दूध | परिवार की सुख-शांति, संतान से जुड़ी कामना |
| दही | भवन, वाहन और संपत्ति से जुड़ी कामना |
| घी | वंश वृद्धि और घर में स्थिरता |
| शहद | वाणी की मधुरता, धन |
| पंचामृत | सभी कामनाओं के लिए, सबसे प्रचलित |
| गन्ने का रस | लक्ष्मी कृपा, व्यापार में उन्नति |
| कुशोदक (कुश मिला जल) | कष्ट निवारण |
पंचामृत बनाने का सही अनुपात पंचामृत कैसे बनाएं में देखें।
सामग्री
- शिवलिंग (घर का, मंदिर का, या मिट्टी का पार्थिव शिवलिंग), बड़ी थाली या जलहरी
- तांबे का कलश, लोटा या शृंगी (अभिषेक पात्र)
- चुना हुआ अभिषेक द्रव्य: पर्याप्त मात्रा में (दूध, गन्ने का रस आदि), साथ में गंगाजल और शुद्ध जल
- बेलपत्र (108 हों तो उत्तम), धतूरा, आक, शमी, सफ़ेद फूल, फूल माला
- सफ़ेद चंदन, भस्म, अक्षत, रोली, मौली, जनेऊ
- गणेश पूजन और कलश स्थापना की सामग्री: सुपारी, पान के पत्ते, नारियल, आम के पत्ते
- धूप, दीप, घी, कपूर, रुई की बत्तियाँ
- भोग: फल, मिठाई, पंचमेवा
- पुरोहित की दक्षिणा और वस्त्र (अपनी सामर्थ्य से)
मंदिरों में रुद्राभिषेक कराना हो तो सामग्री और दक्षिणा की व्यवस्था अक्सर मंदिर स्वयं बताता है; बुकिंग के नियम और शुल्क हर मंदिर में अलग और समय-समय पर बदलते रहते हैं, इसलिए पहले मंदिर कार्यालय से पता कर लें।
विधि
- शुद्धि और आसन: यजमान स्नान करके धुले वस्त्र पहनें, पूर्व या उत्तर मुख होकर बैठें। आचमन और पवित्रीकरण होता है।
- संकल्प: हाथ में जल, अक्षत, फूल लेकर नाम, गोत्र, स्थान, तिथि और कामना बोलकर संकल्प।
- गणेश पूजन, कलश स्थापना: पहले गणेश जी, फिर कलश और कई बार नवग्रह की पूजा।
- शिवलिंग पूजन: शिव का ध्यान, आवाहन और षोडशोपचार या पंचोपचार पूजा।
- अभिषेक: पुरोहित रुद्राष्टाध्यायी का पाठ आरंभ करते हैं और यजमान लगातार पतली धार में द्रव्य चढ़ाता है। धार बीच में टूटे नहीं, इसलिए घर के दो लोग बारी-बारी से पात्र भर सकते हैं।
- शुद्ध जल स्नान: द्रव्य अभिषेक के बाद गंगाजल और शुद्ध जल से स्नान।
- श्रृंगार: चंदन, भस्म, बेलपत्र (एक-एक करके "ॐ नमः शिवाय" के साथ), फूल, माला से शिवलिंग का श्रृंगार।
- भोग, आरती, क्षमा प्रार्थना: भोग लगाकर आरती, पुष्पांजलि, और भूल-चूक के लिए क्षमा प्रार्थना।
- प्रसाद: अभिषेक का जल और द्रव्य चरणामृत की तरह थोड़ा-थोड़ा सब को दें, बाकी किसी पौधे या बहते जल में।
अगर पुरोहित उपलब्ध न हों तो घर में सरल रूप से भी कर सकते हैं: जल या दूध की धार चढ़ाते हुए 108 बार "ॐ नमः शिवाय" या महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें। मंत्र का अर्थ और जाप विधि महामृत्युंजय मंत्र वाले लेख में है, और शिवलिंग पर क्या चढ़ाएं-क्या नहीं, यह शिवलिंग पर क्या चढ़ाएं में।
शिववास देखना
मान्यता है कि शिव हर तिथि पर अलग स्थान पर "वास" करते हैं, और कामना वाला रुद्राभिषेक उसी दिन करना चाहिए जब शिव का वास शुभ स्थान पर हो। इसे देखने का पारंपरिक सूत्र यह है:
(तिथि संख्या × 2 + 5) ÷ 7, फिर शेष देखें। तिथि संख्या शुक्ल प्रतिपदा से गिनी जाती है: शुक्ल पक्ष में 1 से 15, कृष्ण पक्ष में 16 से 30 (कृष्ण प्रतिपदा = 16, अमावस्या = 30)।
| शेष | शिव का वास | रुद्राभिषेक के लिए |
|---|---|---|
| 1 | कैलाश पर | शुभ |
| 2 | गौरी के साथ | शुभ |
| 3 | वृषभ (नंदी) पर | शुभ |
| 4 | सभा में | अनुकूल नहीं माना जाता |
| 5 | भोजन में | अनुकूल नहीं माना जाता |
| 6 | क्रीड़ा में | अनुकूल नहीं माना जाता |
| 0 | श्मशान में | अनुकूल नहीं माना जाता |
उदाहरण: शुक्ल पंचमी के लिए (5 × 2 + 5) = 15, और 15 ÷ 7 का शेष 1 है, यानी शिव कैलाश पर हैं, दिन शुभ है। शुक्ल अष्टमी के लिए (8 × 2 + 5) = 21, शेष 0, यानी श्मशान वास। इस हिसाब से शुक्ल पक्ष की द्वितीया, पंचमी, षष्ठी, नवमी, द्वादशी, त्रयोदशी और कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा, चतुर्थी, पंचमी, अष्टमी, एकादशी, द्वादशी शुभ आती हैं। आज कौन सी तिथि है, यह आज के पंचांग में देखें।
ध्यान दें, शिववास सिर्फ़ कामना वाले अनुष्ठान के लिए देखा जाता है। निष्काम भाव की पूजा, रोज़ का जलाभिषेक, और नीचे दिए विशेष दिनों पर इसकी ज़रूरत नहीं मानी जाती।
कब कराएं
- सावन का पूरा महीना, ख़ासकर सावन के सोमवार: रुद्राभिषेक का सबसे लोकप्रिय समय।
- महाशिवरात्रि और हर महीने की मासिक शिवरात्रि।
- प्रदोष व्रत के दिन, शाम के प्रदोष काल में।
- ज्योतिर्लिंग और प्रमुख शिव तीर्थों पर, जहाँ शिववास देखने की परंपरा नहीं है।
- जन्मदिन, गृह प्रवेश, नया व्यापार शुरू करने या किसी संकट के समय, शिववास देखकर।

