शिवलिंग पर क्या चढ़ाएं, क्या नहीं: जल चढ़ाने के नियम

शिवलिंग पर जल ताँबे या पीतल के लोटे से धीरे-धीरे पतली धार में, 'ॐ नमः शिवाय' बोलते हुए चढ़ाया जाता है। जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा, आक, भस्म और सफ़ेद फूल शिव को प्रिय हैं; तुलसी, केतकी, हल्दी, सिंदूर और टूटे चावल नहीं चढ़ाते, और परिक्रमा आधी की जाती है।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखन: · वेद पण्डित, लेखकअद्यतन · 5 मिनट का पाठ
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शिव को सबसे सरल देवता कहा जाता है, जो एक लोटा जल और एक बेलपत्र से भी प्रसन्न हो जाते हैं। फिर भी शिवलिंग पर जल चढ़ाने के नियम हैं: जल धीरे-धीरे, पतली धार में, "ॐ नमः शिवाय" बोलते हुए चढ़ाएँ; बेलपत्र चिकनी तरफ़ से रखें; तुलसी, केतकी, हल्दी और सिंदूर न चढ़ाएँ; और परिक्रमा पूरी नहीं, आधी करें। नीचे हर बात का कारण और व्यावहारिक तरीका दिया गया है।

जल चढ़ाने की विधि

  1. स्नान करके साफ़ कपड़े पहनें। ताँबे या पीतल का लोटा लें; स्टील भी चलेगा। प्लास्टिक की बोतल से सीधे जल न उड़ेलें।
  2. लोटे में साफ़ जल भरें, थोड़ा गंगाजल मिलाएँ। चाहें तो कुछ अक्षत या एक-दो सफ़ेद फूल डाल लें।
  3. बहुत से पुरोहित सलाह देते हैं कि जल चढ़ाते समय आपका मुख उत्तर दिशा की ओर हो। मंदिर की बनावट के हिसाब से यह हमेशा संभव न हो तो चिंता न करें।
  4. खड़े होकर नहीं, थोड़ा झुककर या बैठकर, लोटा शिवलिंग के पास रखते हुए जल धीरे-धीरे पतली धार में गिराएँ। ज़ोर से उड़ेलने पर छींटे पड़ते हैं, जो अच्छा नहीं माना जाता।
  5. जल चढ़ाते हुए "ॐ नमः शिवाय" का जाप करते रहें।
  6. जल के बाद, अगर हो तो कच्चा दूध और फिर से थोड़ा जल चढ़ाएँ, ताकि शिवलिंग पर दूध चिपका न रहे।
  7. फिर चंदन, अक्षत, बेलपत्र और फूल चढ़ाएँ, और दीपक-धूप दिखाकर प्रणाम करें।

सावन के सोमवार, प्रदोष और शिवरात्रि पर जल चढ़ाने का विशेष महत्व है। सोमवार के व्रत की कथा, जिसमें एक साहूकार के पुत्र को शिव-पार्वती की कृपा से जीवन मिलता है, सोमवार व्रत कथा में है, और सावन भर के नियम सावन मास के नियम में।

बेलपत्र कैसे चढ़ाएं

  • तीन पत्तियों वाला बेलपत्र लें, जो कटा-फटा या कीड़ा लगा न हो। पाँच या सात पत्तियों वाला बेलपत्र मिले तो उसे और शुभ माना जाता है।
  • बेलपत्र की चिकनी सतह शिवलिंग की ओर रहे, यानी उल्टा करके रखें; डंठल अपनी ओर।
  • डंठल का मोटा गाँठ वाला सिरा (जिसे वज्र कहते हैं) तोड़कर हटा दें।
  • चढ़ाने से पहले बेलपत्र धो लें। चाहें तो चंदन से उस पर "ॐ" या "राम" लिखें।
  • परंपरा में चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी, अमावस्या, संक्रांति और सोमवार को बेलपत्र तोड़ना मना है। इसलिए एक दिन पहले तोड़कर रख लें।
  • बेलपत्र कभी बासी नहीं माना जाता। नया न मिले तो पहले चढ़ाया हुआ बेलपत्र धोकर दोबारा चढ़ा सकते हैं।

क्या चढ़ाएं

सामग्रीकैसे और क्यों
जल, गंगाजलसबसे मूल अर्पण; शिव को "अभिषेक प्रिय" कहा गया है
कच्चा दूधसोमवार और सावन में; बाद में जल से धो दें
दही, घी, शहद, शक्करपंचामृत अभिषेक में, विशेष दिनों पर
गन्ने का रसरुद्राभिषेक में, परंपरा से समृद्धि की कामना के लिए
बेलपत्र, शमी पत्रशिव पूजा का सबसे प्रिय पत्र; शमी शनिवार और सावन में विशेष
धतूरा, आक (मदार) के फूल, भांगशिव के वैरागी रूप से जुड़े; थोड़ी मात्रा में
सफ़ेद फूल, कनेर, कमलसफ़ेद रंग शिव को प्रिय माना गया
सफ़ेद चंदन, भस्मत्रिपुंड के रूप में
साबुत अक्षत, जनेऊ, मौलीचावल टूटे न हों
बेर, मौसमी फल, मिश्रीभोग के रूप में; महाशिवरात्रि पर बेर विशेष

क्या नहीं: तुलसी, केतकी, हल्दी, सिंदूर

  • तुलसी: तुलसी विष्णु को प्रिय हैं, और कथा के अनुसार वृंदा (तुलसी) के पति जालंधर का वध शिव ने किया था, इसलिए शिवलिंग पर तुलसी नहीं चढ़ाते। यह कथा तुलसी विवाह कथा में है।
  • केतकी (केवड़ा) का फूल: लिंगोद्भव की कथा में ब्रह्मा जी के झूठ की गवाही केतकी ने दी थी, इसलिए शिव ने उसे अपनी पूजा से बाहर कर दिया।
  • हल्दी: हल्दी को सौंदर्य और श्रृंगार की वस्तु माना जाता है, और शिवलिंग पुरुष तत्व का प्रतीक है। जलहरी (जो शक्ति का स्थान है) पर कई लोग हल्दी चढ़ाते हैं, शिवलिंग पर नहीं।
  • सिंदूर, कुमकुम: ये सुहाग के प्रतीक हैं, जबकि शिव वैरागी हैं। इनकी जगह चंदन या भस्म लगाएँ।
  • टूटे चावल: अक्षत का अर्थ ही "जो टूटा न हो" है।
  • शंख से जल: शंखचूड़ असुर के वध की कथा के कारण शिव पूजा में शंख से जल नहीं चढ़ाया जाता।

इन नियमों का पालन श्रद्धा से करें, डर से नहीं। अनजाने में हुई भूल के लिए शिव से क्षमा माँग लेना काफ़ी है।

आधी परिक्रमा क्यों

शिवलिंग की परिक्रमा पूरी नहीं, आधी की जाती है। जलहरी से जल बहकर जिस नाली से निकलता है, उसे सोमसूत्र या निर्मली कहते हैं। शिव पर चढ़ा जल पवित्र माना जाता है और उसे लाँघना वर्जित है। इसलिए बाईं ओर से शुरू करके सोमसूत्र तक जाएँ, वहाँ से उल्टे लौटकर दूसरी ओर से फिर सोमसूत्र तक आएँ। इस तरह यह आधे चंद्रमा जैसी परिक्रमा बनती है।

मंदिर में ध्यान रखने की बातें

  • शिव मंदिर में प्रवेश करते ही पहले नंदी के दर्शन करें। कई जगह लोग नंदी के कान में अपनी मनोकामना धीरे से कहते हैं, यह लोक-परंपरा है।
  • भीड़ हो तो लाइन में रहें, जल जल्दी-जल्दी न उड़ेलें, और पीछे वालों के लिए जगह छोड़ें।
  • चढ़ाया हुआ बेलपत्र, फूल या प्रसाद शिवलिंग से उठाकर घर न लाएँ; पुजारी जो प्रसाद दें, वही लें।
  • पॉलीथीन में भरा दूध सीधे न उड़ेलें; लोटे में डालकर चढ़ाएँ और थोड़ी मात्रा में चढ़ाएँ। बचा दूध किसी ज़रूरतमंद या गौशाला को दे सकते हैं।

घर में शिवलिंग के नियम

  • घर में शिवलिंग छोटा रखें; आमतौर पर अँगूठे के आकार से बड़ा न हो।
  • एक ही शिवलिंग रखें, और उसे जलहरी में स्थापित करें ताकि अभिषेक का जल बाहर निकल सके।
  • नर्मदा नदी से निकले नर्मदेश्वर (बाणलिंग) को स्वयंभू माना जाता है, इनकी अलग से प्राण प्रतिष्ठा ज़रूरी नहीं समझी जाती। धातु या स्फटिक के शिवलिंग की प्रतिष्ठा पुरोहित से करा लें।
  • रोज़ कम से कम जल अवश्य चढ़ाएँ। शिवलिंग को कभी सूखा या धूल भरा न छोड़ें।
  • शिवलिंग के साथ शिव परिवार (पार्वती, गणेश, कार्तिकेय, नंदी) की छोटी मूर्तियाँ या तस्वीर रखना अच्छा माना जाता है।
  • सुबह-शाम शिव चालीसा या "ॐ नमः शिवाय" का जाप घर के वातावरण को शांत रखता है।

महाशिवरात्रि की पूरी रात की पूजा कैसे करें, यह महाशिवरात्रि पूजा विधि में है, और विशेष कामना के लिए अभिषेक के प्रकार रुद्राभिषेक विधि में।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शिवलिंग पर जल कैसे चढ़ाना चाहिए?

ताँबे या पीतल के लोटे से, धीरे-धीरे पतली धार में, 'ॐ नमः शिवाय' बोलते हुए। जल ज़ोर से न उड़ेलें और छींटे न पड़ें।

शिवलिंग पर तुलसी क्यों नहीं चढ़ाते?

तुलसी विष्णु को प्रिय हैं और कथा के अनुसार वृंदा के पति जालंधर का वध शिव ने किया था, इसलिए शिव पूजा में तुलसी वर्जित मानी जाती है।

बेलपत्र किस तरफ़ से चढ़ाएं?

बेलपत्र की चिकनी सतह शिवलिंग की ओर रहे और डंठल अपनी ओर। तीन पत्तियों वाला साबुत बेलपत्र लें और डंठल का मोटा सिरा हटा दें।

शिवलिंग की परिक्रमा आधी क्यों करते हैं?

जलहरी से निकलने वाले जल की नाली (सोमसूत्र) को लाँघना वर्जित है। इसलिए वहाँ तक जाकर लौट आते हैं।

क्या शिवलिंग पर हल्दी और सिंदूर चढ़ा सकते हैं?

परंपरा में नहीं। ये श्रृंगार और सुहाग की वस्तुएँ हैं, इसलिए शिवलिंग पर चंदन या भस्म लगाई जाती है।

क्या पुराना बेलपत्र दोबारा चढ़ा सकते हैं?

हाँ, बेलपत्र बासी नहीं माना जाता। नया न मिले तो पहले चढ़ाया बेलपत्र धोकर फिर चढ़ा सकते हैं।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखक के बारे में

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा

वेद पण्डित, लेखक

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा जी वेद पण्डित और लेखक हैं। अनेक वर्षों से वे दुर्गा देवी की आराधना का अध्ययन और आचरण करते आ रहे हैं। पूजा विधि, मंत्रों और स्तोत्रों को सामान्य भक्तों के लिए सरलता से समझाना उनका लक्ष्य है। वे “श्री दुर्गा नित्याराधना” ग्रंथ के लेखक हैं। इस साइट के लेख उनकी रचनाएँ हैं, या उनके ग्रंथों पर आधारित हैं।

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